महाराजा अग्रसेन प्रतिमा विवाद पर हाईकोर्ट का सख्त संदेश: चौराहे को पूजा स्थल नहीं बनाया जा सकता, ट्रैफिक बाधित हुआ तो कार्रवाई
जयपुर, 5 मार्च। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने सीकर जिले के नीम का थाना में रामलीला मैदान के पास सड़क के चौराहे पर स्थापित महाराजा अग्रसेन की प्रतिमा को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) का निस्तारण करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि प्रतिमा की स्थापना सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से की गई है, लेकिन इस आधार पर उस स्थान को धार्मिक गतिविधियों या कार्यक्रमों के लिए उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि किसी भी स्थिति में ट्रैफिक बाधित नहीं होना चाहिए।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस शुभा मेहता की खंडपीठ ने कहा कि आस्था जन कल्याण सेवा समिति, नीम का थाना के अध्यक्ष जुगल किशोर मिस्त्री, राजेंद्र कुमार और सुमन समोटा की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह मामला सामने आया।
याचिका में कहा गया था कि स्थानीय समुदाय के कुछ लोगों ने रातोंरात चबूतरा बनाकर रामलीला मैदान के पास सड़क के चौराहे पर महाराजा अग्रसेन की प्रतिमा स्थापित कर दी। इसके बाद उस स्थान का उपयोग पूजा-पाठ और धार्मिक गतिविधियों के लिए होने लगा, जिससे इलाके के व्यस्त मार्ग पर रोजाना ट्रैफिक प्रभावित होने लगा।
अदालत ने प्रतिमा स्थापना को वैध माना
मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति शुभा मेहता की खंडपीठ ने की। अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि महाराजा अग्रसेन की प्रतिमा जयपुर संभागीय आयुक्त द्वारा 30 जनवरी 2026 को दी गई अनुमति के बाद स्थापित की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से यह स्पष्ट नहीं होता कि अनुमति की किसी शर्त का उल्लंघन हुआ है। इसलिए प्रतिमा की स्थापना को अवैध नहीं माना जा सकता।
चौराहे को धार्मिक आयोजन का स्थल बनाने पर रोक
हालांकि हाईकोर्ट ने इस मामले में बेहद स्पष्ट और सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि सड़क चौराहे पर प्रतिमा स्थापित होने का अर्थ यह नहीं है कि वहां पूजा-पाठ, धार्मिक समारोह, उत्सव या किसी प्रकार का कार्यक्रम आयोजित किया जाए।
खंडपीठ ने कहा कि चौराहा सार्वजनिक मार्ग का हिस्सा है और वहां से रोजाना बड़ी संख्या में वाहन गुजरते हैं। ऐसे में वहां भीड़ जमा करना या कार्यक्रम आयोजित करना न केवल यातायात व्यवस्था को प्रभावित करेगा बल्कि आम लोगों के अधिकारों का भी उल्लंघन होगा।
केवल श्रद्धांजलि दे सकते हैं, कार्यक्रम नहीं
अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों की प्रतिमा में आस्था है, वे वहां जाकर फूल-माला अर्पित कर श्रद्धांजलि दे सकते हैं, लेकिन किसी भी प्रकार का आयोजन या सभा कर सड़क पर कब्जा नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा कि सड़क का चौराहा अपनी मूल स्थिति में बना रहना चाहिए और वहां यातायात में किसी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिए। यदि किसी कार्यक्रम से ट्रैफिक प्रभावित होता है तो यह कानून और सार्वजनिक व्यवस्था दोनों के खिलाफ होगा।
फोटो के जरिए रखे तथ्य
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कुछ तस्वीरें भी प्रस्तुत की गई थीं, जिनमें दिखाया गया कि प्रतिमा के आसपास लोग एकत्र होकर धार्मिक गतिविधियां कर रहे हैं। याचिका में कहा गया था कि इससे इलाके के प्रमुख मार्ग पर रोजाना जाम की स्थिति बन रही है और आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
संतुलन का संदेश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि आस्था और धार्मिक भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन इसके नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण या यातायात बाधित करना स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि सार्वजनिक मार्गों पर कानून और व्यवस्था सर्वोपरि है और किसी भी गतिविधि से आम जनता की सुविधा प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
PIL का निस्तारण
इन टिप्पणियों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट ने इस जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि प्रतिमा स्थापित रहने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन उस स्थान को धार्मिक कार्यक्रमों के केंद्र में बदलने की अनुमति नहीं दी जाएगी।