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नवोदय विद्यालय समिति सरकारी विभाग नहीं और इसके कर्मचारी भी ‘सरकारी सेवक’ की परिभाषा में नहीं आते

Rajasthan High Court Rules Navodaya Vidyalaya Samiti Employees Not Entitled to Pay Protection or Pension Benefits

राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : स्वायत्त संस्थानों के कर्मचारियों को नहीं मिलेगा वेतन संरक्षण और पेंशन का स्वतः अधिकार

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक ऐतिहासिक और सख्त फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि स्वायत्त संस्थानों (Autonomous Bodies) में कार्यरत कर्मचारियों को राज्य सरकार की सेवा में चयनित होने के बाद पूर्व सेवा के आधार पर वेतन संरक्षण (Pay Protection) और पेंशन लाभ का स्वतः अधिकार नहीं मिलेगा।

जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकलपीठ ने राज्य सरकार की याचिका को स्वीकार करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए दो टूक कहा कि

“स्वायत्त निकायों के कर्मचारी ‘सरकारी सेवक’ की परिभाषा में नहीं आते। केवल सरकारी अनुदान मिलने से संस्था सरकारी विभाग नहीं बन जाती।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्थान सेवा नियम (RSR) के नियम 26 के तहत वेतन संरक्षण का लाभ केवल उन्हीं कर्मचारियों को मिल सकता है, जो पहले से राज्य या केंद्र सरकार की नियमित सेवा में रहे हों।

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें अधिकरण ने नवोदय विद्यालय समिति में पूर्व सेवा देने वाले एक प्रधानाध्यापक को वेतन संरक्षण और पेंशन का लाभ देने का निर्देश दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने असंवैधानिक और नियमों के विपरीत बताया।

पूरा मामला क्या था?

इस मामले में प्रतिवादी अर्जुन लाल बुनकर पहले नवोदय विद्यालय समिति (Navodaya Vidyalaya Samiti) के तहत नवोदय स्कूल में शिक्षक थे।

बाद में राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की परीक्षा पास कर वे राज्य सेवा में प्रधानाध्यापक बने।

उन्होंने नवोदय में दी गई अपनी पूर्व सेवा को जोड़कर वेतन संरक्षण और पेंशन का लाभ मांगा। अधिकरण ने उनके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन राज्य सरकार ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।

राज्य सरकार की दलीलें

राज्य सरकार की ओर से यह रिट याचिका दायर की गई थी, जिसमें राजस्थान सिविल सेवा अपीलीय अधिकरण के 07 अप्रैल 2010 के आदेश को चुनौती दी गई।

अधिकरण ने प्रतिवादी शिक्षक को नवोदय विद्यालय समिति में दी गई पूर्व सेवा के आधार पर वेतन संरक्षण और पेंशन का लाभ देने का निर्देश दिया था।

राज्य सरकार का मुख्य तर्क था कि नवोदय विद्यालय समिति (Navodaya Vidyalaya Samiti) एक सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत स्वायत्त संस्था है और यह सीधे केंद्र सरकार का विभाग नहीं है।

सरकार ने कहा कि नवोदय विद्यालय समिति एक स्वतंत्र, स्वशासी निकाय (Autonomous Body) है और इसके कर्मचारी “सरकारी सेवक” की श्रेणी में नहीं आते।

सरकार ने कहा कि केवल सरकारी अनुदान प्राप्त करना या सरकारी नियंत्रण होना किसी संस्था को सरकारी विभाग नहीं बना देता।

राज्य सरकार ने राजस्थान सेवा नियम (RSR) के नियम 26 का हवाला देते हुए कहा कि वेतन संरक्षण का लाभ केवल उन कर्मचारियों को मिल सकता है, जो पहले से राज्य या केंद्र सरकार की नियमित सेवा में रहे हों और जिनकी सेवा संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत बनाए गए नियमों से नियंत्रित होती हो।

स्वायत्त संस्था के कर्मचारी इस परिभाषा में नहीं आते।

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि राजस्थान सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1971 के अनुसार “सरकारी सेवक” वह व्यक्ति है: जिसकी नियुक्ति सरकार द्वारा की गई हो, जिसकी सेवा शर्तें अनुच्छेद 309 के तहत बने नियमों से नियंत्रित हों, जिसका वेतन राज्य की समेकित निधि (Consolidated Fund) से दिया जाता हो।

सरकार ने कहा कि नवोदय विद्यालय समिति के कर्मचारी इन शर्तों को पूरा नहीं करते।

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के State of Maharashtra & Ors. v. Bhagwan & Ors., 2022 SCC OnLine SC 1315 फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि सोसायटी अधिनियम के तहत पंजीकृत संस्था एक स्वतंत्र निकाय है।

मात्र सरकारी वित्तपोषण या शासी निकाय में सरकारी प्रतिनिधित्व होने से कर्मचारी सरकारी कर्मचारी नहीं बन जाते।

राज्य सरकार ने 1 सितंबर 2025 को जारी परिपत्र का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि राज्य पीएसयू, स्वायत्त निकाय, स्थानीय निकाय, पंचायती राज संस्थानों के कर्मचारियों को राज्य सेवा में चयन के बाद वेतन संरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा।

राज्य सरकार का आरोप था कि अधिकरण ने प्रतिवादी की पूर्व सेवा की प्रकृति का समुचित परीक्षण किए बिना ही लाभ प्रदान कर दिया, जो कानून के विपरीत है।

प्रतिवादी शिक्षक की दलीलें

प्रतिवादी शिक्षक अर्जुन लाल बुनकर की ओर से अधिकरण के आदेश का समर्थन किया गया और हाईकोर्ट में उसका बचाव किया गया।

अधिवक्ता ने नवोदय विद्यालय समिति को “भारत सरकार की संस्था” बताते हुए कहा कि नवोदय विद्यालय समिति पूर्णतः केंद्र सरकार द्वारा वित्तपोषित है और इसका प्रशासनिक नियंत्रण भी केंद्र सरकार के पास है। यह एक “Government of India Institution” है।

इसलिए इसकी सेवा को सरकारी सेवा के समान माना जाना चाहिए।

प्रतिवादी ने नियम 26 के उस प्रावधान का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति भारत सरकार या अन्य राज्य सरकार की संस्था में नियमित सेवा में रहा हो और राज्य सेवा में उच्च पद पर नियुक्त हो, तो उसके वेतन का संरक्षण किया जा सकता है।

प्रतिवादी का कहना था कि नवोदय विद्यालय समिति “भारत सरकार की संस्था” है, इसलिए वे इस प्रावधान के पात्र हैं।

प्रतिवादी की ओर से कुछ फैसलों का भी हवाला दिया गया, जिनमें कथित रूप से समान परिस्थितियों में वेतन संरक्षण दिया गया था।

उन्होंने यह भी कहा कि अन्य मामलों में केंद्रीय विद्यालय (Kendriya Vidyalaya) के कर्मचारियों को लाभ दिया गया है।

प्रतिवादी ने 2015, 2017 और 2020 की अधिसूचनाओं एवं कार्यालय ज्ञापनों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके आधार पर वेतन निर्धारण और पेंशन का लाभ मिलना चाहिए।

प्रतिवादी का यह भी तर्क था कि जब समान प्रकृति की संस्थाओं के कर्मचारियों को लाभ दिया गया है, तो उन्हें वंचित करना अनुचित और भेदभावपूर्ण होगा।

हाईकोर्ट का फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह माना कि स्वायत्त संस्था सरकारी विभाग नहीं है और उसके कर्मचारी “सरकारी सेवक” नहीं माने जा सकते।

हाईकोर्ट ने कहा कि वेतन संरक्षण का दावा केवल नियमों के स्पष्ट प्रावधान पर आधारित हो सकता है।

अदालत ने पाया कि अधिकरण ने पूर्व सेवा की प्रकृति का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया और नियमों की गलत व्याख्या की।

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की रिट याचिका स्वीकार करते हुए अधिकरण का आदेश निरस्त कर दिया और स्पष्ट किया कि स्वायत्त संस्था के कर्मचारी को पूर्व सेवा के आधार पर वेतन संरक्षण और पेंशन का कोई विधिक अधिकार नहीं है।

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