जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अदालत द्वारा की गई टिप्पणियों को लेकर स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी न्यायिक मंच को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध बिना सुनवाई के कठोर, प्रतिकूल या कलंकित करने वाली टिप्पणियां करे।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दो टूक शब्दों में कहा कि ऐसी टिप्पणियां न केवल न्यायिक मर्यादा के विपरीत हैं, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का भी गंभीर उल्लंघन हैं।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने जैसलमेर में पदस्थापित पुलिस अधिकारी याचिकाकर्ता राजूराम चौधरी, जो वर्तमान में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (विशेष जांच इकाई, महिला अपराध) के पद पर कार्यरत हैं, की याचिका पर आदेश दिया है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी ने राजुराम चौधरी की ओर से पैरवी करते हुए निचली अदालतों द्वारा उनके विरुद्ध की गई टिप्पणियों को हटाने (Expunction) की मांग की थी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता राजूराम चौधरी की याचिका स्वीकार करते हुए सत्र न्यायालय के 28 जुलाई 2022 और मजिस्ट्रेट अदालत के 1 मार्च 2025 के आदेशों में की गई सभी प्रतिकूल, कठोर और कलंकित टिप्पणियों को हटाने का आदेश दिया है।
कहां से शुरू हुआ विवाद
मामले की शुरुआत एक आपराधिक मामले के दर्ज होने से हुई, जिसमें पुलिस ने नियमानुसार जांच कर धारा 173 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत अपनी रिपोर्ट सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश की।
जांच रिपोर्ट से असंतुष्ट होकर परिवादिया ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के समक्ष धारा 190 CrPC के अंतर्गत आवेदन पेश कर अतिरिक्त आरोपियों को तलब करने की मांग की।
मजिस्ट्रेट ने 4 मई 2022 को यह आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अतिरिक्त आरोपियों को तलब करना उचित नहीं है।
सत्र न्यायालय का आदेश और विवादित टिप्पणियां
मजिस्ट्रेट के आदेश से असंतुष्ट होकर परिवादिया ने सत्र न्यायालय, जोधपुर में निगरानी (Revision) याचिका दायर की।
जोधपुर सत्र न्यायालय ने 28 जुलाई 2022 को मजिस्ट्रेट का आदेश निरस्त करते हुए प्रकरण को पुनर्विचार हेतु वापस भेज दिया।
इसी आदेश में सत्र न्यायालय ने अनुसंधान अधिकारी राजूराम चौधरी के खिलाफ कई गंभीर टिप्पणियां कीं।
अदालत ने अपने आदेश में यह तक कहा कि जांच अधिकारी ने साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया और संभव है कि किसी दुर्भावना या षड्यंत्र के चलते गलत धाराओं में आरोप पत्र पेश किया गया।
यदि पुनर्विचार में जांच में अनियमितता या षड्यंत्र सामने आए तो जांच अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई की जाए।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ये टिप्पणियां न तो निगरानी याचिका के निस्तारण के लिए आवश्यक थीं और न ही अदालत के सीमित अधिकार क्षेत्र में आती थीं।
मजिस्ट्रेट का दूसरा आदेश: और अधिक कठोर
सत्र न्यायालय के आदेश के बाद मामला पुनः मजिस्ट्रेट कोर्ट में पहुंचा, जहां मजिस्ट्रेट ने 1 मार्च 2025 को नया आदेश पारित करते हुए न केवल पूर्व टिप्पणियों को दोहराया, बल्कि जांच अधिकारी पर और भी कठोर शब्दों में आरोप लगाए।
मजिस्ट्रेट ने कहा कि दुष्कर्म जैसे संवेदनशील मामले में जांच अधिकारी ने विधि के प्रावधानों की “पूर्ण अवहेलना” की और यह कृत्य उनके कर्तव्यों के प्रति “घोर लापरवाही” का द्योतक है।
मजिस्ट्रेट कोर्ट ने आदेश की प्रति पुलिस महानिदेशक, राजस्थान को भेजकर जांच अधिकारी के विरुद्ध उचित कार्रवाई का आदेश दिया।
याचिका में दलील
हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका में पुलिस अधिकारी राजूराम चौधरी ने कोर्ट में कहा कि निचली अदालतों ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर टिप्पणियां कीं।
धारा 190 और 397 CrPC के तहत अदालतों का कार्य केवल यह देखना है कि संज्ञान या पुनर्विचार का आदेश विधिसम्मत है या नहीं।
जांच अधिकारी की निष्पक्षता, दुर्भावना या लापरवाही पर अंतिम निष्कर्ष निकालना इस स्तर पर न तो आवश्यक था और न ही वैधानिक।
बिना नोटिस और सुनवाई के की गई टिप्पणियां उनके सेवा जीवन, पदोन्नति और प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से पेश उप महाधिवक्ता ने निचली अदालतों के आदेशों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अदालतों का उद्देश्य निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना था।
सरकार ने कहा कि परिवादिया के अधिकारों की रक्षा के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग किया गया और अदालतों को जांच की गुणवत्ता पर टिप्पणी करने का अधिकार है।
हाईकोर्ट की विस्तृत टिप्पणियां
जस्टिस फरजंद अली ने अपने रिपोर्टेबल फैसले में निचली अदालतों को लेकर विस्तृत कानूनी टिप्पणियां कीं।
अधिकार क्षेत्र की सीमा
हाईकोर्ट ने कहा कि संज्ञान, पुनरीक्षण या रिमांड के स्तर पर अदालतों को संयम (Judicial Restraint) बरतना चाहिए। इस स्तर पर ऐसे निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते, जो जांच की निष्पक्षता पर अंतिम राय बना दें और संबंधित अधिकारी की सेवा या प्रतिष्ठा को प्रभावित करें।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि
जब तक मामला तय करने के लिए अनिवार्य न हो, तब तक किसी व्यक्ति के विरुद्ध कठोर या कलंकित टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए।
प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत
हाईकोर्ट ने दोहराया कि बिना सुने किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यदि किसी आदेश के नागरिक या सेवा संबंधी दुष्परिणाम हों, तो संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
सेवा और करियर पर प्रभाव
हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालतों की टिप्पणियां याचिकाकर्ता के सेवा रिकॉर्ड को प्रभावित कर सकती थीं और भविष्य की पदोन्नति एवं करियर पर गंभीर असर डाल सकती थीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि इससे याचिकाकर्ता की सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता था।
उद्देश्य साधा जा सकता था, पर तरीका गलत था
हाईकोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि मामला गंभीर आरोपों से जुड़ा है और निष्पक्ष जांच आवश्यक है, लेकिन यह उद्देश्य व्यापक और कठोर टिप्पणियों के बिना भी हासिल किया जा सकता था।