ग्राम न्यायालय के आदेश के खिलाफ रिवीजन सुनने पर सत्र न्यायालय को फटकार, मामला अपील के रूप में दोबारा सुनने के दिए आदेश
Reportable Judgement, जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने ग्राम न्यायालयों (Gram Nyayalaya) के आदेशों को चुनौती देने की प्रक्रिया को लेकर रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि ग्राम न्यायालय के आदेश के खिलाफ रिवीजन याचिका दाखिल नहीं की जा सकती, बल्कि कानून के अनुसार केवल अपील का ही रास्ता उपलब्ध है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कानून में किसी आदेश के खिलाफ अपील का प्रावधान किया गया है, तो उस स्थिति में रिवीजन याचिका दायर करना न केवल प्रक्रिया के खिलाफ है, बल्कि यह न्यायिक अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन भी है।
यह महत्वपूर्ण आदेश जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता संतोक सिंह खालसा की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
सत्र अदालत पर टिप्पणी, कहा न्यायिक अनुशासन जरूरी
हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायिक व्यवस्था में अनुशासन बनाए रखना बेहद आवश्यक है।
यदि अदालतें कानून द्वारा निर्धारित अधिकार क्षेत्र का पालन नहीं करेंगी, तो न्यायिक व्यवस्था में भ्रम और असंगति पैदा हो सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि ऐसी प्रथा जारी रही तो लोग कानून में निर्धारित प्रक्रिया को छोड़कर अपनी सुविधा के अनुसार अदालतों का चयन करने लगेंगे, जिससे न्यायिक व्यवस्था प्रभावित होगी।
क्या था मामला
मामला बीकानेर निवासी संतोक सिंह खालसा से जुड़ा है। उनके खिलाफ ग्राम न्यायालय, कोलायत के न्यायाधिकारी ने 21 अप्रैल 2018 को एक आपराधिक शिकायत में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 468, 471 और 120-B के तहत संज्ञान लेते हुए गिरफ्तारी वारंट जारी किया था।
इस आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बीकानेर के समक्ष क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की।
डीजे कोर्ट ने मामले को एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के विशेष न्यायाधीश-सह-अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत में ट्रांसफर कर दिया।
अदालत ने सुनवाई के बाद रिवीजन याचिका खारिज करते हुए ग्राम न्यायालय के आदेश को सही ठहराया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने बताया कानून का सही रास्ता
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की धारा 33 का विस्तृत विश्लेषण किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह धारा ग्राम न्यायालयों के आदेशों के खिलाफ अपील की पूरी व्यवस्था निर्धारित करती है।
कानून के अनुसार—
- ग्राम न्यायालय के निर्णय, आदेश या सजा के खिलाफ अपील सत्र न्यायालय में की जा सकती है।
- यह अपील 30 दिन के भीतर दायर करनी होती है।
- सत्र न्यायालय का फैसला अंतिम होगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस पूरी व्यवस्था में कहीं भी रिवीजन का प्रावधान नहीं है। इसलिए रिवीजन याचिका दाखिल करना कानून के अनुरूप नहीं है।
अपील और रिवीजन में क्या अंतर
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में अपील और रिवीजन के बीच महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अपील एक वैधानिक अधिकार है, जिसे कानून द्वारा स्पष्ट रूप से प्रदान किया जाता है।
इसके विपरीत रिवीजन कोई अधिकार नहीं बल्कि अदालत की विवेकाधीन शक्ति होती है, जिसका उपयोग केवल विशेष परिस्थितियों में किया जाता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अपील में अदालत मामले के तथ्य और कानून दोनों की पूरी तरह से समीक्षा कर सकती है, जबकि रिवीजन में अदालत का अधिकार क्षेत्र सीमित होता है।
कानून के तय रास्ते से नहीं हट सकते न्यायालय
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अदालतों को कानून द्वारा निर्धारित अधिकार क्षेत्र के भीतर ही कार्य करना चाहिए।
यदि किसी कानून में किसी आदेश को चुनौती देने के लिए विशेष प्रक्रिया तय की गई है, तो उसी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में निर्धारित व्यवस्था को छोड़कर किसी अन्य प्रक्रिया को अपनाना न्यायिक अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण माना जाएगा।
सुनवाई करने का अधिकार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में सत्र न्यायालय ने रिवीजन याचिका की प्रारंभिक जांच किए बिना ही उसे स्वीकार कर लिया और उस पर फैसला भी दे दिया।
अदालत के अनुसार, किसी भी अदालत का पहला कर्तव्य यह होता है कि वह यह जांच करे कि उसके पास मामले की सुनवाई करने का अधिकार है या नहीं।
यदि अधिकार क्षेत्र ही नहीं है, तो मामले की सुनवाई करना कानून के विपरीत माना जाएगा।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय द्वारा पारित आदेश को अधिकार क्षेत्र की त्रुटि बताते हुए रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि मामले को सत्र न्यायालय के पास वापस भेजा जाए और इसे ग्राम न्यायालय अधिनियम की धारा 33 के तहत आपराधिक अपील के रूप में दर्ज किया जाए।
इसके बाद दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देकर मामले का नए सिरे से निर्णय किया जाएगा।
गिरफ्तारी वारंट पर भी दी राहत
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि ग्राम न्यायालय ने निजी शिकायत पर संज्ञान लेते समय शुरुआती चरण में ही आरोपी के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया था, जबकि ऐसे मामलों में सामान्यतः पहले समन जारी किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के इंदर मोहन गोस्वामी बनाम उत्तराखंड राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि शिकायत मामलों में शुरुआत में गिरफ्तारी वारंट जारी करना उचित नहीं माना जाता।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि जब तक सत्र न्यायालय में अपील का निर्णय नहीं हो जाता, तब तक याचिकाकर्ता के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंट स्थगित रहेगा।