जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में अपील के अधिकार और सजा से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा हैं कि यदि किसी आरोपी को दोषसिद्धि के बाद प्रोबेशन (परिवीक्षा) का लाभ दिया गया है, तो केवल सजा से असंतोष के आधार पर निजी शिकायतकर्ता को अपील करने का अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील का अधिकार पूरी तरह वैधानिक है और इसे कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही प्रयोग किया जा सकता है।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह फैसला सुमित्रा की ओर से दायर याचिका पर दिया हैं.
याचिका में में एडिशनल सेशन कोर्ट बेगु के आदेश को चुनौती दी गयी है जिसमें सेशन कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को निरस्त करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए भेज दिया था।
राजस्थान हाईकोर्ट ने Additional Sessions Court, Begu के आदेश को अवैध बताते हुए ट्रायल कोर्ट ACJM, Rawatbhata के मूल आदेश को पुनः प्रभावी कर दिया।
ये हैं मामला
मामले की शुरुआत वर्ष 2021 में हुई, जब चित्तौड़गढ़ जिले के रावतभाटा थाना क्षेत्र में शिकायतकर्ता ने सुमित्रा के खिलाफ मारपीट, रास्ता रोकने, गाली-गलौज और घर में घुसने जैसी धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने आरोप-पत्र प्रस्तुत किया और मामला एसीजेएम कोर्ट, रावतभाटा में ट्रायल किया गया.
रिकॉर्ड के अनुसार अभियोजन पक्ष को कई अवसर दिए जाने के बावजूद वह एक भी गवाह पेश नहीं कर सका। लंबे समय तक सुनवाई लंबित रहने और अभियोजन की ओर से साक्ष्य प्रस्तुत न होने की स्थिति में आरोपी ने स्वेच्छा से अपराध स्वीकार कर लिया।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के बयान की स्वेच्छा से पुष्टि करने के बाद उसे दोषी ठहराया, लेकिन उसके खिलाफ किसी पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड का अभाव, मामले की प्रकृति तथा सुधार की संभावना को देखते हुए प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत परिवीक्षा का लाभ प्रदान किया और केवल नाममात्र 400 रूपयें का जुर्माना लगाया।
शिकायतकर्ता की अपील
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ शिकायतकर्ता केवल सजा से असंतुष्ट था। उसने यह कहते हुए सत्र न्यायालय में अपील दायर की कि आरोपी को दी गई सजा पर्याप्त नहीं है।
सत्र न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और मामले को पुनः ट्रायल के लिए भेजते हुए अभियोजन साक्ष्य दर्ज करने का आदेश दे दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि शिकायतकर्ता की अपील कानूनन स्वीकार्य ही नहीं थी, क्योंकि दंड बढ़ाने की मांग करने का अधिकार केवल राज्य सरकार को है, न कि निजी शिकायतकर्ता को।
साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया प्रोबेशन का आदेश पूरी तरह वैध और न्यायोचित था तथा इसे बिना किसी कानूनी आधार के निरस्त किया गया।
अधिवक्ता ने कहा कि सत्र न्यायालय द्वारा शिकायतकर्ता की अपील स्वीकार करना कानूनन गलत था, क्योंकि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के प्रावधान के अनुसार निजी शिकायतकर्ता को केवल सजा से असंतोष के आधार पर अपील करने का अधिकार नहीं है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए आरोपी की स्वैच्छिक स्वीकारोक्ति, उसके खिलाफ पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड का अभाव तथा सुधार की संभावना को देखते हुए प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत परिवीक्षा का लाभ दिया था, जो पूरी तरह वैधानिक और न्यायोचित था।
यह भी तर्क दिया गया कि अभियोजन पक्ष को कई अवसर मिलने के बावजूद वह साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा, इसलिए केवल शिकायतकर्ता की असंतुष्टि के कारण मामले को दोबारा ट्रायल के लिए भेजना आरोपी के साथ अन्याय है और न्यायिक प्रक्रिया की अंतिमता के सिद्धांत के विपरीत है।
प्रतिवादी पक्ष का जवाब
मामले में प्रतिवादी शिकायतकर्ता ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा अत्यंत हल्की थी और मामले की गंभीरता को देखते हुए कठोर दंड आवश्यक था।
शिकायतकर्ता का मत था कि पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने का अवसर मिलना चाहिए था और पुनः ट्रायल से सत्य सामने आ सकता है।
इसी आधार पर सत्र न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए भेजा था।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने दोनो पक्षों की बहस सुनने के बाद पाया कि मामले में अपील कानूनन स्वीकार्य नहीं थी, क्योंकि शिकायतकर्ता को केवल सजा बढ़ाने की मांग के लिए अपील करने का अधिकार नहीं है और ऐसा अधिकार विधि के अनुसार केवल राज्य सरकार को प्राप्त है।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि आपराधिक मामलों में अपील का अधिकार पूरी तरह विधि द्वारा नियंत्रित होता है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 372 के प्रावधान के अनुसार पीड़ित या शिकायतकर्ता केवल तीन परिस्थितियों में अपील कर सकता है—यदि आरोपी बरी हो जाए, कम गंभीर अपराध में दोषी ठहराया जाए या अपर्याप्त मुआवजा दिया गया हो।
सजा बढ़ाने की मांग के लिए निजी शिकायतकर्ता को सामान्य अपील का अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब आरोपी दोषसिद्ध हो चुका था और उसे केवल प्रोबेशन का लाभ दिया गया था, तब यह मामला उन परिस्थितियों में नहीं आता जिनमें शिकायतकर्ता अपील कर सकता है।
कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार सत्र न्यायालय द्वारा अपील स्वीकार करना ही मूल रूप से अधिकार क्षेत्र से बाहर का कदम था।
हाईकेर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रोबेशन का लाभ देना न्यायालय की वैधानिक विवेकाधीन शक्ति है और इसमें हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब आदेश अवैध, मनमाना या स्पष्ट रूप से गलत पाया जाए।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी की आयु, आपराधिक इतिहास का अभाव, अभियोजन की ओर से साक्ष्य प्रस्तुत न होना तथा सुधार की संभावना जैसे सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद निर्णय दिया था।
पुनः ट्रायल का आदेश अनुचित
हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय द्वारा मामले को पुनः ट्रायल के लिए भेजने पर भी गंभीर आपत्ति जताई।
अदालत ने कहा कि जब अभियोजन को पहले ही पर्याप्त अवसर दिए जा चुके थे और वह साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा, तब केवल सजा से असंतोष के आधार पर पुनः ट्रायल का आदेश देना न्यायसंगत नहीं है।
इससे आरोपी को अनावश्यक रूप से दूसरी बार मुकदमे का सामना करना पड़ता है और न्यायिक प्रक्रिया की अंतिमता का सिद्धांत प्रभावित होता है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलीय अदालत का हस्तक्षेप सुधारात्मक होना चाहिए, न कि दंडात्मक। यदि किसी आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या गंभीर अनियमितता नहीं है, तो केवल असंतोष के आधार पर पूरे मामले को फिर से खोलना उचित नहीं माना जा सकता।
ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल
सभी तथ्यों और कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने सत्र न्यायालय के 19 दिसंबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट का 21 मार्च 2024 का आदेश पुनः बहाल कर दिया।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि आरोपी केवल सत्र न्यायालय के आदेश के कारण हिरासत में है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो।