77 दिन छुट्टी बढ़ाने पर BSF जवान को निकाला था नौकरी से, 22 साल बाद हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी को किया रद्द, सजा को बदला अनिवार्य सेवानिवृत्ति में
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सीमा सुरक्षा बल (BSF) के एक जवान को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि छुट्टी बढ़ाने का मामला अनुशासनहीनता तो है, लेकिन इसके लिए सीधे नौकरी से बर्खास्त करना अत्यधिक कठोर सजा है।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को दी जाने वाली सजा “misconduct की गंभीरता के अनुरूप” होनी चाहिए और यदि सजा अपराध के मुकाबले अत्यधिक कठोर हो, तो न्यायालय उसे संशोधित कर सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने 22 साल पुराने मामले में जवान की बर्खास्तगी को संशोधित करते हुए उसे कम्पल्सरी रिटायरमेंट (अनिवार्य सेवानिवृत्ति) में बदल दिया है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता अजमेर निवासी पवन प्रजापति और सेना की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जवान को पेंशन के लिए आवश्यक सेवा अवधि तक काल्पनिक (notional) सेवा निरंतरता दी जाए, लेकिन उसे उस अवधि का वेतन और भत्ते नहीं मिलेंगे।
1995 में BSF में भर्ती हुआ था जवान
पवन प्रजापति वर्ष 1995 में सीमा सुरक्षा बल में कांस्टेबल (जनरल ड्यूटी) के पद पर नियुक्त किया गया था।
अक्टूबर 2003 में उन्हें 27 अक्टूबर से 4 नवंबर 2003 तक आठ दिन की छुट्टी मंजूर की गई थी और उन्हें 5 नवंबर को ड्यूटी पर लौटना था।
लेकिन पवन प्रजापति तय तारीख पर ड्यूटी पर वापस नहीं लौट सके। उन्होंने बाद में बताया कि उनकी मां को अचानक दिल की गंभीर बीमारी हो गई थी, जिसके कारण उन्हें घर पर रुकना पड़ा।
हालांकि वह 20 जनवरी 2004 को खुद ही वापस ड्यूटी पर लौट आए, लेकिन तब तक उनकी अनुपस्थिति 77 दिन की हो चुकी थी।
विभागीय कार्रवाई और बर्खास्तगी
जवान की 77 दिन की अनुपस्थिति को गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए BSF ने उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की।
मामले की सुनवाई Summary Security Force Court (SSFC) में हुई और 8 मार्च 2004 को आदेश जारी कर पवन प्रजापति को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
इसके खिलाफ उन्होंने विभाग में अपील दायर की, लेकिन 31 अगस्त 2004 को अपीलीय प्राधिकरण ने भी उनकी अपील खारिज कर दी।
महत्वपूर्ण बात यह थी कि दोनों आदेश बेहद संक्षिप्त और बिना कारण बताए (non-speaking) तरीके से पारित किए गए थे। इसके बाद जवान ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
एकलपीठ ने दी थी राहत
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 2023 में महत्वपूर्ण आदेश दिया था।
सिंगल बेंच ने बर्खास्तगी और अपील के आदेश को रद्द करते हुए पवन प्रजापति को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया, क्योंकि आदेश “स्पीकिंग ऑर्डर” नहीं थे।
लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि उन्हें बर्खास्तगी से लेकर पुनर्बहाली तक का वेतन नहीं मिलेगा।
साथ ही मामले को दोबारा विचार के लिए विभागीय प्राधिकरण Summary Security Force Court (SSFC) के पास भेज दिया था। इस आदेश से दोनों पक्ष असंतुष्ट हो गए और उन्होंने खंडपीठ में अपील दायर की।
दोनों पक्ष पहुंचे खंडपीठ में
एकलपीठ के आदेश से दोनों पक्ष असंतुष्ट हो गए और उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ में विशेष अपील दायर की।
पवन प्रजापति ने अदालत से कहा कि लगभग 19 साल बाद मामला फिर से SSFC को भेजना न्यायसंगत नहीं है और उन्हें उस अवधि का वेतन भी मिलना चाहिए।
वहीं केंद्र सरकार और सेना ने कहा कि एकलपीठ ने विभागीय कार्रवाई में अनावश्यक हस्तक्षेप किया है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि राजस्थान हाईकोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार ही नहीं है।
याचिकाकर्ता जवान की मांग: पूरा वेतन
जवान की ओर से अधिवक्ता Sunil Samdaria, Arihant Samdaria और Ashish Kumar ने पैरवी करते हुए अदालत से कहा कि एकलपीठ ने भले ही उन्हें सेवा में बहाल करने का आदेश दिया, लेकिन बैक वेज (पिछला वेतन) न देना और मामला दोबारा विभाग को भेजना गलत है।
उनके वकीलों ने दलील दी कि लगभग 19 साल बाद मामले को फिर से विभाग के पास भेजना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे विवाद और लंबा खिंचेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि अपील आदेश उन्हें अजमेर में मिला था, इसलिए राजस्थान हाईकोर्ट को इस मामले की सुनवाई का अधिकार है।
केंद्र सरकार और BSF का पक्ष
दूसरी ओर केंद्र सरकार और BSF की ओर से अदालत में कहा गया कि सिंगल बेंच ने विभागीय कार्रवाई में अनावश्यक हस्तक्षेप किया है।
सरकार की ओर से कहा गया कि विभागीय जांच पूरी तरह नियमों के अनुसार की गई थी और जवान को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया गया था।
सरकार ने यह भी कहा कि अदालत को अनुशासनात्मक मामलों में बहुत सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा -जवान दोषी था
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और पूरे रिकॉर्ड की जांच के बाद हाईकोर्ट ने माना कि मामले में याचिकाकर्ता पवन प्रजापति ने मंजूर छुट्टी से अधिक समय तक ड्यूटी जॉइन नहीं की और वह 77 दिनों तक अनुपस्थित रहे।
हाईकोर्ट ने कहा कि पवन प्रजापति ने मंजूर छुट्टी से अधिक समय तक अनुपस्थिति रखी थी और विभागीय जांच में उन्हें दोषी पाया गया था।
इसलिए अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को पूरी तरह गलत नहीं कहा जा सकता।
लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में सीधे नौकरी से बर्खास्त करना अत्यधिक कठोर सजा है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि विभागीय जांच में उन्हें अपना पक्ष रखने और गवाहों से जिरह करने का अवसर दिया गया था।
इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि जांच प्रक्रिया में कोई गंभीर कानूनी खामी थी।
लेकिन बर्खास्तगी को माना अत्यधिक कठोर
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में जवान को सीधे नौकरी से निकाल देना अत्यधिक कठोर सजा है।
अदालत ने कहा कि यह मामला डेजर्शन (सेना छोड़कर भाग जाना) का नहीं था, क्योंकि जवान बाद में स्वयं ड्यूटी पर लौट आया था।
साथ ही रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि उसके सेवा रिकॉर्ड में एक अच्छी प्रविष्टि भी थी और उसकी मां की गंभीर बीमारी का कारण भी बताया गया था।
ऐसी परिस्थितियों में अदालत ने माना कि सजा अपराध के अनुपात में नहीं थी।
“सजा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए”
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि अनुशासनात्मक मामलों में सजा का निर्धारण करते समय अपराध की गंभीरता और परिस्थितियों दोनों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि पवन प्रजापति डेजर्टर (बल छोड़कर भागने वाला) नहीं थे, क्योंकि उन्होंने स्वयं ड्यूटी जॉइन की थी।
साथ ही रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि उनके सेवा रिकॉर्ड में एक अच्छी प्रविष्टि भी थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि बर्खास्तगी की सजा “shockingly disproportionate”, यानी अपराध की गंभीरता के मुकाबले अत्यधिक कठोर है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सजा इतनी कठोर हो कि न्यायिक विवेक को झकझोर दे, तो अदालत उसे संशोधित कर सकती है।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
इन सभी तथ्यों को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जवान के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई सही थी, लेकिन बर्खास्तगी की सजा उचित नहीं थी।
इसलिए अदालत ने बर्खास्तगी की सजा को बदलकर अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) कर दिया।
साथ ही अदालत ने आदेश दिया कि जवान को पेंशन के लिए आवश्यक सेवा अवधि पूरी मानते हुए काल्पनिक सेवा निरंतरता दी जाए, लेकिन उसे उस अवधि का वेतन या भत्ता नहीं मिलेगा।
हाईकोर्ट ने विभाग को छह सप्ताह के भीतर आवश्यक आदेश जारी करने के निर्देश दिए।
RAJASTHAN HIGH COURT BENCH AT JAIPUR
D.B. Special Appeal Writ No. 873/2023
Pawan Prajapati Versus Union of India
THE ACTING CHIEF JUSTICE MR. SANJEEV PRAKASH & SHARMA JUSTICE SANGEETA SHARMA
Date of pronouncement : 27/02/2026