आयकर विभाग का ARL Infratech Limited की प्रॉपर्टी अटैचमेंट आदेश रद्द, कहा-बिना ठोस आधार के ऐसी कार्रवाई अनुचित
जयपुर, 6 मार्च। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने आयकर विभाग द्वारा जारी एक महत्वपूर्ण प्रोविजनल अटैचमेंट (अस्थायी कुर्की) आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि करदाताओं की संपत्ति को कुर्क करने जैसी कठोर कार्रवाई केवल ठोस आधार और कानूनी शर्तों की पूर्ति के बाद ही की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 281B के तहत संपत्ति अटैचमेंट की शक्ति बहुत कठोर (Draconian) है, इसलिए इसका उपयोग अत्यंत सावधानी और उचित कारणों के साथ ही किया जाना चाहिए।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने ARL Infratech Limited द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने आयकर विभाग के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें कंपनी की संपत्ति को अस्थायी रूप से कुर्क कर दिया गया था।
क्या है पूरा मामला
मामला जयपुर स्थित ARL Infratech Limited से जुड़ा है, जो भवन निर्माण सामग्री जैसे सीमेंट शीट, सीमेंट पाइप, AAC ब्लॉक, मेटल शीट और क्वार्ट्ज स्लैब के निर्माण का व्यवसाय करती है।
कंपनी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर आयकर विभाग के 1 जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कंपनी की एक औद्योगिक संपत्ति को प्रोविजनल अटैचमेंट के तहत कुर्क कर दिया गया था।
रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी नियमित रूप से आयकर का भुगतान करती रही है और वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2026-27 के बीच लगभग 45.43 करोड़ रुपये का आयकर जमा किया है।
कंपनी का औद्योगिक प्लॉट बगरू एक्सटेंशन फेज-II, जयपुर में स्थित है और वह बैंक से लिए गए ऋण के कारण पहले से ही गिरवी रखा गया था। इस संपत्ति का मूल्य लगभग 31.58 करोड़ रुपये बताया गया।
आयकर विभाग की कार्रवाई
आयकर विभाग ने कंपनी के परिसरों पर आयकर अधिनियम की धारा 132/133A के तहत सर्च और सर्वे की कार्रवाई की थी।
जांच के बाद एक मूल्यांकन आदेश जारी किया गया, जिसमें 4,40,120 रुपये की अतिरिक्त आय का उल्लेख किया गया, लेकिन उस आधार पर कोई टैक्स डिमांड नहीं बनाई गई।
इसके बावजूद आयकर अधिकारियों ने भविष्य में संभावित टैक्स देनदारी की आशंका के आधार पर लगभग 1.30 करोड़ रुपये की संभावित मांग का अनुमान लगाया और धारा 281B के तहत कंपनी की संपत्ति को अस्थायी रूप से अटैच कर दिया।
कंपनी ने अदालत में दलील दी कि यह कार्रवाई न केवल अनुचित है, बल्कि CBDT की गाइडलाइंस और आयकर कानून की भावना के भी विपरीत है।
कंपनी का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि यदि आयकर विभाग को किसी कर मांग का संदेह भी था, तो नियमों के अनुसार कंपनी से विवादित मांग का केवल 20 प्रतिशत तक जमा कराने की अपेक्षा की जा सकती थी।
कंपनी का तर्क था कि जहां अधिकतम जमा राशि लगभग 26 लाख रुपये बनती थी, वहां विभाग ने कई करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति को कुर्क कर दिया, जो पूरी तरह से असंगत और अनुचित है।
कंपनी ने यह भी कहा कि वह एक नियमित करदाता है और पहले भी समय पर टैक्स जमा करती रही है, इसलिए यह मान लेना कि कंपनी भविष्य में कर का भुगतान नहीं करेगी, सिर्फ अनुमान पर आधारित कार्रवाई है।
हाईकोर्ट का फैसला
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि किसी करदाता की संपत्ति को अटैच करना एक गंभीर और कठोर कदम है, जिसे सिर्फ असाधारण परिस्थितियों में ही अपनाया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Radha Krishan Industries बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रकार की कार्रवाई से पहले अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वास्तव में राजस्व की सुरक्षा के लिए यह कदम आवश्यक है।
कोर्ट ने कहा कि केवल आशंका के आधार पर यह मान लेना कि करदाता भविष्य में टैक्स का भुगतान नहीं करेगा, उचित नहीं है।
नियमित करदाताओं के लिए राहत
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यदि कोई कंपनी या व्यक्ति लंबे समय से नियमित रूप से टैक्स जमा कर रहा है, तो उसके खिलाफ ऐसी कठोर कार्रवाई करने से पहले अधिकारियों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि संपत्ति अटैच करने जैसी कार्रवाई से न केवल व्यवसाय प्रभावित होता है, बल्कि बैंक और वित्तीय संस्थानों के बीच कंपनी की साख भी प्रभावित हो सकती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की कार्रवाई से ईमानदार करदाताओं की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए कानून का उपयोग संतुलित और न्यायसंगत तरीके से होना चाहिए।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने आयकर विभाग के 1 जनवरी 2026 के अटैचमेंट आदेश को रद्द कर दिया।
हालांकि अदालत ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह एहतियात के तौर पर संभावित कर मांग का 20 प्रतिशत हिस्सा एक सप्ताह के भीतर जमा करे।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में यह साबित होता है कि कर मांग गलत थी या कम होनी चाहिए थी, तो जमा की गई राशि ब्याज सहित कंपनी को वापस की जाएगी।
कर वसूली के नाम पर मनमानी कार्रवाई स्वीकार नहीं की जाएगी और अधिकारियों को कानून की सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्रवाई करनी होगी।