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किसी भी प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक आदेश में स्पष्ट कारण दर्ज होना अनिवार्य: राजस्थान हाईकोर्ट

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ओपन एयर कैंप में कैदी का ट्रांसफर नही करने का राज्य कमेटी का एक लाइन का आदेश रद्द, तीन माह में आवेदन पर दोबारा कारणयुक्त आदेश जारी करने के निर्देश

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जेल प्रशासन और राज्य स्तरीय ओपन एयर कैंप कमेटी के फैसलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक आदेश में स्पष्ट कारण दर्ज होना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई निर्णय बिना कारण के या केवल औपचारिक टिप्पणी के आधार पर दिया जाता है, तो वह कानून की नजर में मनमाना और असंवैधानिक माना जाएगा।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही उदयपुर केंद्रीय जेल में बंद कैदी और याचिकाकर्ता निर्मल दूदानी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

याचिकाकर्ता कैदी के उदयपुर केंद्रीय कारागार से ओपन एयर कैंप में ट्रांसफर के आवेदन को राज्य स्तरीय कमेटी ने बिना कारण बताए खारिज कर दिया था।

हाईकोर्ट ने पाया कि कमेटी का आदेश केवल एक पंक्ति का था और उसमें कोई ठोस कारण दर्ज नहीं किया गया था।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने कमेटी के आदेश को रद्द करते हुए राज्य सरकार और जेल प्रशासन को आदेश दिया कि वे कैदी के आवेदन पर राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप नियम, 1972 के अनुसार पुनः विचार करें और तीन महीने के भीतर विस्तृत व कारणयुक्त आदेश पारित करें।

क्या है पूरा मामला

यह मामला निर्मल दूदानी नामक कैदी से जुड़ा है, जो वर्तमान में केंद्रीय कारागार उदयपुर में सजा काट रहा है। याचिका उसकी पत्नी अनीता दूदानी के माध्यम से राजस्थान हाईकोर्ट में दायर की गई थी।

रिकॉर्ड के अनुसार, उदयपुर स्थित एनडीपीएस मामलों की विशेष अदालत ने 23 मई 2025 को सेशंस केस नंबर 192/2017 में निर्मल दूदानी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/15 के तहत दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

इस फैसले के खिलाफ आरोपी ने राजस्थान हाईकोर्ट में क्रिमिनल अपील नंबर 1647/2025 दायर की है, जो अभी विचाराधीन है।

सजा के बाद कैदी ने जेल प्रशासन से अनुरोध किया कि उसे राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप नियम, 1972 के तहत ओपन एयर कैंप में स्थानांतरित किया जाए, ताकि वह सुधारात्मक कार्यक्रमों का लाभ ले सके।

याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि ओपन एयर कैंप योजना का उद्देश्य कैदियों के पुनर्वास और सुधार को बढ़ावा देना है।

याचिका में कहा गया कि निर्मल दूदानी का जेल में आचरण संतोषजनक रहा है और वह नियमों के तहत ओपन एयर कैंप के लिए आवेदन करने का पात्र है।

याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य स्तरीय कमेटी का फैसला भेदभावपूर्ण और मनमाना है। इसी प्रकार के मामलों में दोषी ठहराए गए अन्य कैदियों को ओपन एयर कैंप भेजा गया है।

याचिका में अधिवक्ता ने उदाहरण देते हुए बताया कि मोहनलाल, जो एनडीपीएस मामले में दोषी था, उसे वर्ष 2019 में सांगानेर ओपन एयर कैंप, जयपुर भेजा गया।

इसी आदेश में एक अन्य दोषी मांगीलाल को भी ओपन एयर कैंप स्थानांतरित किया गया था।

याचिकाकर्ता का कहना था कि जब समान परिस्थितियों में अन्य कैदियों को यह सुविधा दी गई है, तो निर्मल दूदानी के साथ अलग व्यवहार करना अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि कैदी को एनडीपीएस एक्ट जैसे गंभीर अपराध में दोषी ठहराया गया है।

सरकार की दलील थी कि आरोपी को कुल 20 वर्ष की सजा सुनाई गई है और उसने अभी तक लगभग 8 वर्ष की सजा ही पूरी की है।

इन तथ्यों को देखते हुए राज्य स्तरीय ओपन एयर कैंप कमेटी ने उसके आवेदन को आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय लिया।

सरकार का कहना था कि ओपन एयर कैंप में स्थानांतरण एक विशेष सुविधा है, जिसे प्रत्येक कैदी को स्वाभाविक अधिकार के रूप में नहीं दिया जा सकता। यह निर्णय संबंधित प्राधिकरण की विवेकाधीन शक्ति पर निर्भर करता है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि कमेटी का पूरा आदेश केवल एक पंक्ति का है, जिसमें यह लिखा गया कि कैदी के मामले को ओपन एयर कैंप के लिए आगे नहीं भेजा जाएगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा आदेश प्रशासनिक कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ है।

हाईकोर्ट ने कहा—

“हर प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक आदेश में कारण दर्ज होना आवश्यक है। कारण यह दर्शाते हैं कि निर्णय लेने वाली प्राधिकरण ने तथ्यों और कानून पर गंभीरता से विचार किया है।”

अदालत ने आगे कहा कि स्पीकिंग ऑर्डर (कारणयुक्त आदेश) पारदर्शी शासन की मूल आवश्यकता है। यदि किसी आदेश में कारण नहीं होते तो प्रभावित व्यक्ति यह समझ ही नहीं पाता कि उसके साथ ऐसा निर्णय क्यों लिया गया।

विवेकाधीन शक्ति का मतलब मनमानी नहीं

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि विवेकाधीन शक्ति का अर्थ यह नहीं है कि प्राधिकरण बिना किसी आधार के निर्णय ले सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि विवेकाधीन शक्ति मनमानी के विपरीत होती है। इसका प्रयोग निष्पक्षता, पारदर्शिता और न्यायसंगत आधार पर किया जाना चाहिए।

निर्णय लेते समय केवल प्रासंगिक तथ्यों को ही ध्यान में रखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि जब कानून किसी प्राधिकरण को विवेकाधीन शक्ति देता है, तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह उस शक्ति का उपयोग जिम्मेदारी और सावधानी के साथ करे।

ओपन एयर कैंप योजना पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ओपन एयर कैंप योजना का उद्देश्य केवल कैदियों को जेल से बाहर रखना नहीं है, बल्कि उन्हें समाज में पुनर्वास के लिए तैयार करना है।

इस योजना के तहत कैदियों को खुला वातावरण मिलता है और श्रम व रोजगार के अवसर मिलते हैं, जिससे समाज में पुनः शामिल होने की तैयारी होती है।

इसलिए किसी कैदी के आवेदन पर निर्णय लेते समय प्राधिकरण को कई कारकों पर विचार करना चाहिए, जैसे—जेल में कैदी का आचरण, अपराध की प्रकृति, नियमों में निर्धारित पात्रता और सुरक्षा से जुड़े पहलू। इन सभी पहलुओं का संतुलित मूल्यांकन करने के बाद ही निर्णय लिया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

सभी दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य स्तरीय कमेटी का आदेश मनमाना और गैर-तर्कसंगत है।

हाईकोर्ट ने कहा कि बिना कारण दिए गए प्रशासनिक आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।

हाईकोर्ट ने 7 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द करते हुए राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मामले पर दोबारा विचार करते हुए याचिकाकर्ता कैदी के आवेदन पर विस्तृत और कारणयुक्त आदेश जारी करें।

हाईकोर्ट ने यह संपूर्ण प्रक्रिया तीन महीने के भीतर पूरी करने का आदेश दिया है।

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