राजस्थान हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से एक वरिष्ठ महिला अधिवक्ता को आखिरकार 15 साल बाद उनकी पेशेवर फीस मिल सकी
जयपुर। एक तरफ राजस्थान सरकार कई सामान्य मामलों में ही देश के बड़े वकीलों को प्रतिदिन सुनवाई के लाखों रुपये फीस दे रही है।
यहां तक कि राजस्थान में ही महाधिवक्ता से लेकर दो दर्जन अतिरिक्त महाधिवक्ता होने के बावजूद न केवल दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों से वकील राजस्थान में आकर सरकार के लिए पैरवी कर रहे हैं, वह भी लाखों की फीस लेकर।
दूसरी तरफ सरकार के एक विभाग ने ही एक वरिष्ठ महिला अधिवक्ता को 84 केसों में संपूर्ण पैरवी कर निस्तारण करने तक की कुल फीस 5000 रुपये तय की। यानी प्रति केस 59 रुपये मात्र।
ये फीस भी कोई केस निस्तारित होने के 1 या 2 माह में नहीं, बल्कि केसों का निपटारा होने के 15 साल बाद।
जी हां, आप न्याय की लड़ाई सिर्फ आम नागरिक ही नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था का अभिन्न अंग माने जाने वाले अधिवक्ताओं को भी कभी-कभी वर्षों तक लड़नी पड़ती है।
राजस्थान की वरिष्ठ अधिवक्ताओं में शामिल
राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ में ऐसा ही एक असाधारण और चौंकाने वाला मामला सामने आया, जहां एक महिला अधिवक्ता को अपनी कानूनी फीस के लिए पूरे 15 वर्ष तक संघर्ष करना पड़ा।
वह भी तब, जब राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में कड़ी टिप्पणियां करते हुए न केवल अधिकारियों को कोर्ट में तलब किया, बल्कि उन पर 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।
कोर्ट के सख्त रुख के बाद जाकर राज्य सरकार और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) को झुकना पड़ा और लंबित वकील की फीस का भुगतान करना पड़ा।
महिला अधिवक्ता मंजू जैन पिछले 39 वर्षों से राजस्थान हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रही हैं और उनके हितों के लिए लड़ाई भी एक अधिवक्ता सुनील समदड़िया ने लड़ी।
2010 में नियुक्ति, 2011 में 84 मामलों की पैरवी
मामले की शुरुआत वर्ष 2010 से होती है, जब जयपुर की वरिष्ठ अधिवक्ता मंजू जैन को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) की ओर से अधिवक्ता नियुक्त किया गया।
नियुक्ति आदेश के तहत उन्हें राजस्थान हाईकोर्ट, जयपुर पीठ सहित अन्य अदालतों में मिशन का प्रतिनिधित्व करना था।
नियुक्ति के पश्चात वर्ष 2011 में उन्होंने NRHM की ओर से 84 रिट याचिकाओं के एक बड़े समूह की प्रभावी रूप से पैरवी की। ये सभी मामले राजस्थान हाईकोर्ट में सुने गए और 20 सितंबर 2011 को इनका अंतिम निस्तारण हुआ।
हाईकोर्ट के फैसले से स्पष्ट था कि सभी 84 मामलों में अधिवक्ता ने मिशन की ओर से विधिवत उपस्थिति दर्ज कराई और तर्क प्रस्तुत किए।
4.25 लाख रुपये का बिल, लेकिन भुगतान शून्य
मामलों के निस्तारण के बाद अधिवक्ता मंजू जैन ने 17 अक्टूबर 2011 को अपनी कानूनी फीस का बिल विभाग को भेज दिया। यह बिल ₹4,25,000 का था, जो 84 मामलों की पैरवी के अनुरूप था।
सामान्य परिस्थितियों में यह भुगतान कुछ ही समय में हो जाना चाहिए था, लेकिन यहीं से शुरू हुआ वह संघर्ष, जो डेढ़ दशक तक चला।
बार-बार अनुरोध, पत्राचार और अधिकारियों से संपर्क के बावजूद न तो बिल का निस्तारण हुआ और न ही भुगतान।
अधिवक्ता को “एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय” के चक्कर काटने पड़े, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला।
14 साल बाद विभाग ने कहा 59 रुपये प्रति केस
बाद में सरकार और NRHM ने यह दलील दी कि वर्ष 2011 में ही यह निर्णय ले लिया गया था कि 84 मामलों को “एक ही मामला” मानते हुए शुल्क दिया जाएगा। इस तर्क के अनुसार अधिवक्ता को केवल ₹5,000 का भुगतान किया जाना था।
यानी प्रत्येक मुकदमे की पैरवी के लिए मात्र 59 रुपये की राशि। क्या आप यकीन कर सकते हैं कि एक वरिष्ठ महिला अधिवक्ता को विभाग ने प्रत्येक केस के लिए 59 रुपये की फीस तय की।
हैरानी की बात यह रही कि इस विवादित निर्णय के बावजूद वह ₹5,000 की राशि भी 14 वर्षों तक अधिवक्ता को नहीं दी गई। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
2019 में हाईकोर्ट की शरण
लगातार उपेक्षा और भुगतान न होने से विवश होकर अधिवक्ता मंजू जैन ने अंततः वर्ष 2019 में राजस्थान हाईकोर्ट में सिविल रिट याचिका दायर की।
याचिका में उन्होंने अपनी कानूनी फीस के भुगतान की मांग की और यह भी बताया कि कैसे वर्षों से सरकार उनकी मेहनत की अनदेखी कर रही है।
हाईकोर्ट ने याचिका पर नोटिस जारी किया, लेकिन इसके बाद भी राज्य सरकार और संबंधित विभागों का रवैया बेहद उदासीन बना रहा।
5 साल तक जवाब नहीं, हाईकोर्ट नाराज़
याचिका लंबित रहने के दौरान लगभग 5 वर्षों तक राज्य सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया गया। बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद जब जवाब पेश नहीं हुआ, तो हाईकोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया।
14 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस रवैये पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए टिप्पणी की कि यह “लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना रवैया” है।
हाईकोर्ट ने सरकार पर ₹5,000 का जुर्माना भी लगाया और स्पष्ट किया कि यह अंतिम अवसर है।
84 मामलों के बदले ₹5,000!
इसके बाद जब सरकार ने जवाब दाखिल किया, तो उसमें यह कहा गया कि अधिवक्ता द्वारा लड़े गए 84 मामलों को एक मानते हुए ₹5,000 देय थे। इस दलील ने राजस्थान हाईकोर्ट को और अधिक चौंका दिया।
हालात तब और गंभीर हो गए जब यह सामने आया कि यह ₹5,000 की राशि भी 6 नवंबर 2025 को, यानी लगभग 14 साल बाद, स्वीकृत की गई।
एक वरिष्ठ अधिवक्ता को 84 मामलों की पैरवी के बदले ₹5,000 देना राजस्थान हाईकोर्ट को अस्वीकार्य लगा।
हाईकोर्ट का सख्त रुख, अधिकारी तलब
सरकार के इस रुख से असंतुष्ट होकर हाईकोर्ट ने 13 नवंबर 2025 को बड़ा कदम उठाया और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के निदेशक को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने के निर्देश दिए।
इसके बाद 6 दिसंबर 2025 और पुनः 2 फरवरी 2026 को भी उच्च अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के आदेश दिए गए।
हाईकोर्ट की इस सख्ती ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब मामले को हल्के में नहीं लिया जाएगा।
15 साल बाद पूरा भुगतान
हाईकोर्ट के लगातार दबाव और सख्त निर्देशों के बाद अंततः 2 फरवरी 2026 को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ने अधिवक्ता मंजू जैन को उनका पूरा बकाया ₹4,25,000 का भुगतान कर दिया।
यह वही राशि थी, जिसका बिल उन्होंने वर्ष 2011 में प्रस्तुत किया था।
भुगतान के बाद अधिवक्ता की ओर से याचिका वापस लेने का अनुरोध किया गया, जिसे स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने यह मामला निस्तारित कर दिया और इस प्रकार 15 साल पुराने विवाद का निपटारा हुआ।
न्याय व्यवस्था के लिए बड़ा संदेश
यह मामला केवल एक अधिवक्ता के बकाया भुगतान का नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम के लिए एक कड़ा संदेश है।
अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से यह स्पष्ट किया कि अधिवक्ताओं की मेहनत और पेशेवर अधिकारों की अनदेखी किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है।