जयपुर। प्रदेश के सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों और लगातार सामने आ रहे हादसों को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की धीमी कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराज़गी जताई है।
गुरूवार को मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जुलाई से अब तक स्कूल भवनों की मरम्मत को लेकर सरकार की रफ्तार बेहद धीमी है और 8 माह में केवल चार स्कूलों में ही काम शुरू हुआ है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े होते हैं।
जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने मामले में सख्त रुख अपनाते हुए राज्य के मुख्य सचिव को 19 मार्च को शपथ पत्र (हलफनामा) पेश करने का आदेश दिया है।
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से पूछा है कि कोर्ट के पूर्व आदेशों की पालना में अब तक क्या कार्रवाई की गई है और जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत के लिए सरकार ने क्या ठोस कदम उठाए हैं।
गौरतलब हैं कि राजस्थान हाईकोर्ट पिछले साल झालावाड़ में हुए स्कूल हादसे के बाद स्वप्रेरित प्रसंज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दायर की थी.
हाल ही में राज्य सरकार ने बजट में स्कूलो की मरम्मत के लिए बजट में घोषणाए भी की हैं. लेकिन जमीनी स्तर के हालात को लेकर हाईकोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई हैं.
अदालत ने जताई कड़ी नाराज़गी
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि प्रदेश में जुलाई से लगातार स्कूल भवनों से जुड़े हादसे सामने आ रहे हैं। कई सरकारी स्कूलों की इमारतें जर्जर हालत में हैं, जिनमें पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।
अदालत ने कहा कि झालावाड़ हादसे के बाद उम्मीद थी कि राज्य सरकार तुरंत सक्रिय होकर स्कूल भवनों की मरम्मत और सुरक्षा की दिशा में ठोस कदम उठाएगी, लेकिन वास्तविकता यह है कि महीनों बीत जाने के बावजूद काम बेहद धीमी गति से चल रहा है।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जुलाई से लेकर अब तक केवल चार स्कूलों में ही मरम्मत का काम शुरू हुआ है, जबकि बड़ी संख्या में स्कूल भवन जर्जर स्थिति में हैं।
बजट लैप्स होने पर भी धीमी गति
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि मार्च महीने में इस कार्य के लिए स्वीकृत बजट लैप्स होने की स्थिति में है, लेकिन इसके बावजूद सरकार अभी तक केवल टेंडर प्रक्रिया में ही उलझी हुई है।
अदालत ने कहा कि यदि समय रहते काम शुरू नहीं हुआ तो बजट समाप्त हो जाएगा और स्कूलों की स्थिति जस की तस बनी रहेगी।
खंडपीठ ने सरकार से पूछा कि आखिर वह करना क्या चाह रही है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि स्कूल सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल ही नहीं हैं।
चार्टर्ड इंजीनियर से स्कूलों की जांच का सुझाव
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि क्यों न स्कूल भवनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए चार्टर्ड इंजीनियर नियुक्त कर दिए जाएं।
अदालत ने कहा कि यदि ऐसा किया जाए तो 1 जुलाई से केवल उन्हीं स्कूलों का संचालन किया जाए जिन्हें चार्टर्ड इंजीनियर सुरक्षित घोषित करें। जिन स्कूलों की इमारतें असुरक्षित पाई जाएं, उनमें पहले मरम्मत का काम कराया जाए और तब तक वहां पढ़ाई बंद रखी जाए।
अदालत का कहना था कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है और यदि स्कूल भवन सुरक्षित नहीं हैं तो वहां कक्षाएं चलाना खतरे से खाली नहीं है।
सरकार ने बजट की समस्या बताई
अदालत के इस सुझाव पर राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि ऐसा आदेश नहीं दिया जाए क्योंकि बजट से संबंधित समस्याएं हैं।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत के लिए वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण है और इसके लिए समय की आवश्यकता है।
लेकिन सरकार की इस दलील से अदालत संतुष्ट नहीं हुई।
“बजट सरकार की समस्या, अदालत की नहीं”
सरकार की ओर से बजट का हवाला दिए जाने पर अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि बजट की समस्या सरकार की हो सकती है, अदालत की नहीं।
खंडपीठ ने कहा कि अदालत का काम यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर उचित कार्रवाई हो। यदि स्कूल भवन जर्जर हैं और वहां हादसे हो रहे हैं तो सरकार को तत्काल प्रभाव से कदम उठाने होंगे।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि उसके आदेशों की पालना होना अनिवार्य है और सरकार को इसके लिए आवश्यक प्रावधान करने होंगे।
प्रमुख शासन सचिव की रिपोर्ट भी नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि पहले प्रमुख शासन सचिव को इस मामले में रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा गया था।
लेकिन महाधिवक्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उन्हें भी अभी तक संबंधित विभाग से कोई रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है।
इस पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह बेहद गंभीर स्थिति है कि अदालत के निर्देश के बावजूद संबंधित अधिकारी रिपोर्ट तक पेश नहीं कर रहे हैं।
मुख्य सचिव को देना होगा जवाब
इसके बाद खंडपीठ ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे स्वयं इस मामले में हलफनामा पेश करें।
अदालत ने कहा कि मुख्य सचिव शपथ पत्र के माध्यम से यह बताएंगे कि अदालत के पूर्व आदेशों की पालना में अब तक क्या कार्रवाई की गई है और प्रदेश के जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत के लिए सरकार की क्या योजना है।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 19 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में इस मामले में विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की जाए।
बच्चों की सुरक्षा पर चिंता
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रदेश के कई जिलों में स्कूल भवनों के जर्जर होने के कारण हादसे हो चुके हैं। भरतपुर और बूंदी के सरकारी स्कूलों में भी ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या गंभीर है।
अदालत ने कहा कि यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में और बड़े हादसे हो सकते हैं।
सरकार को दी चेतावनी
खंडपीठ ने राज्य सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि इस मामले को हल्के में नहीं लिया जाए।
अदालत ने कहा कि यह केवल प्रशासनिक मामला नहीं है, बल्कि हजारों बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ विषय है।
यदि सरकार समय पर कार्रवाई नहीं करती है तो अदालत को सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं।
अगली सुनवाई 19 मार्च को
हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च तय की है। उस दिन मुख्य सचिव को शपथ पत्र के साथ अदालत के सामने उपस्थित होकर यह बताना होगा कि अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत कब तक पूरी की जाएगी।