जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि माता-पिता के तलाक का किसी पुत्र के आश्रित होने के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि मृत सरकारी कर्मचारी का बेटा नियमों के अनुसार आश्रित की श्रेणी में आता है, तो केवल इस आधार पर उसे अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह अपने माता-पिता के तलाक के बाद अपनी मां के साथ रह रहा था।
हाईकोर्ट ने पारिवारिक परिस्थितियों जैसे तलाक को आधार बनाकर किसी पात्र आश्रित को उसके अधिकार से वंचित करने को अनुचित बताते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया है।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दिए फैसले में एकलपीठ के फैसले पर मुहर लगा दी है।
पिता की मृत्यु और तलाक
बांसवाड़ा स्थित माही बाजाज सागर परियोजना में याचिकाकर्ता आशीष सक्सेना के पिता अशोक सक्सेना कर्मचारी के तौर पर कार्यरत थे। याचिकाकर्ता के पिता की मृत्यु वर्ष 2006 में हो गई थी।
पिता की मृत्यु के बाद बेटे ने निर्धारित समय सीमा के भीतर अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन कर दिया था। विभाग ने उससे उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate) लाने के लिए कहा।
याचिकाकर्ता ने अदालत से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र भी प्राप्त कर लिया, लेकिन इसके बावजूद विभाग ने उसकी नियुक्ति पर कोई निर्णय नहीं लिया।इस पर उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
एकलपीठ ने 2017 में याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए उसके मामले पर सकारात्मक निर्णय लेने के आदेश दिए थे।
एकलपीठ के इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की खंडपीठ में विशेष अपील दायर की।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उसने अपने पिता की मृत्यु के लगभग एक महीने के भीतर ही 6 नवंबर 2006 को आवेदन प्रस्तुत कर दिया था। इसके बावजूद विभाग ने उसके आवेदन पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया और उससे उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के लिए कहा गया।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि राजस्थान अनुकंपा नियुक्ति नियम, 1996 के अनुसार मृत सरकारी कर्मचारी का पुत्र “आश्रित” की श्रेणी में स्पष्ट रूप से शामिल है। इसलिए उसे अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार मिलना चाहिए।
उसने यह भी कहा कि उसके माता-पिता के बीच तलाक हो जाने के बावजूद वह अपने पिता का वैध पुत्र है और यह तथ्य उसके आश्रित होने के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि विभाग ने उससे उत्तराधिकार प्रमाण पत्र मांगकर अनावश्यक देरी की, जबकि यह विवादित तथ्य नहीं था कि वह मृत कर्मचारी का बेटा है।
याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि उसने समय पर आवेदन किया था और उस समय वह नियुक्ति के लिए पात्र भी था। बाद में यदि मामला अदालत में लंबित रहा या प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी हुई, तो इसका दोष उसके सिर नहीं मढ़ा जा सकता।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने एकलपीठ के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के माता-पिता का तलाक हो चुका था और वह अपनी मां के साथ रह रहा था, इसलिए उसे मृत सरकारी कर्मचारी पर आश्रित नहीं माना जा सकता।
राज्य का तर्क था कि ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को मृत सरकारी कर्मचारी पर आश्रित नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह अपने पिता के साथ नहीं रह रहा था। इसलिए उसे अनुकंपा नियुक्ति का लाभ नहीं दिया जा सकता।
राज्य सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि अब याचिकाकर्ता की उम्र लगभग 39 वर्ष हो चुकी है। सरकार का कहना था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य तत्काल आर्थिक सहायता देना होता है, इसलिए इतने लंबे समय बाद नियुक्ति देना उचित नहीं होगा।
इसके अतिरिक्त राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि मृत कर्मचारी की दूसरी पत्नी को पहले ही विधवा कोटे के तहत नौकरी दी जा चुकी है।
ऐसे में परिवार को पहले ही सरकारी सहायता मिल चुकी है और इस आधार पर भी याचिकाकर्ता को अनुकंपा नियुक्ति देना उचित नहीं होगा।
सरकार ने यह भी कहा कि विभाग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी और इसलिए एकलपीठ द्वारा दिया गया आदेश सही नहीं है।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि नियमों के अनुसार मृत सरकारी कर्मचारी का पुत्र स्पष्ट रूप से आश्रित की श्रेणी में शामिल है।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस कारण से कि माता-पिता के बीच तलाक हो गया था, पुत्र का अपने पिता के साथ संबंध समाप्त नहीं हो जाता और न ही उसका आश्रित होने का अधिकार खत्म होता है।
इसलिए इस आधार पर याचिकाकर्ता को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना कानून की दृष्टि में उचित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता मृत सरकारी कर्मचारी का वैध पुत्र है। ऐसी स्थिति में उससे उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने की मांग करना भी अनुचित था।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया जिसमें कहा गया था कि मृत कर्मचारी की दूसरी पत्नी को पहले ही नौकरी मिल चुकी है। अदालत ने कहा कि दूसरी पत्नी को विधवा कोटे के तहत नियमित नियुक्ति दी गई थी, जबकि याचिकाकर्ता ने अनुकंपा नियुक्ति योजना के तहत अलग से आवेदन किया था।
इसलिए दूसरी पत्नी को मिली नौकरी के आधार पर याचिकाकर्ता के स्वतंत्र अधिकार को समाप्त नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने पिता की मृत्यु के लगभग एक महीने के भीतर ही अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन कर दिया था और उस समय वह नियुक्ति के लिए पात्र भी था।
हाईकोर्ट ने कहा कि विभाग द्वारा अनावश्यक आपत्तियां उठाकर और प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी करके याचिकाकर्ता के वैध दावे को लंबे समय तक लंबित रखा गया। यदि मामला अदालत में लंबित रहने या प्रशासनिक प्रक्रिया में देरी के कारण समय बीत गया, तो इसका दोष याचिकाकर्ता पर नहीं डाला जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि देरी के आधार पर किसी पात्र व्यक्ति को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित करना न्यायसंगत नहीं होगा, खासकर तब जब उसने समय पर आवेदन कर दिया था और सभी आवश्यक शर्तों को पूरा किया था।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद एकलपीठ के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही राज्य सरकार द्वारा दायर विशेष अपील (Special Appeal Writ) को खारिज (dismiss) कर दिया।