जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने देशभर के विश्वविद्यालयों और हजारों कॉलेजों के लिए संबद्धता फीस पर GST लागू होने के मामले में एक बड़ी राह आसान करते हुए बड़ी राहत दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय द्वारा कॉलेजों को दी जाने वाली संबद्धता (Affiliation) कोई व्यावसायिक सेवा नहीं है, बल्कि शिक्षा से जुड़ा एक वैधानिक और नियामक कार्य है। इसलिए इस पर GST (वस्तु एवं सेवा कर) लागू नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित ने राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय (RTU), कोटा द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए जीएसटी द्वारा 26 दिसंबर 2023 को जारी शो कॉज नोटिस और उससे संबंधित कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाते हुए विश्वविद्यालय को बड़ी राहत दी।
क्या था पूरा विवाद
राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय (RTU) ने केंद्रीय जीएसटी विभाग द्वारा जारी उस नोटिस को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि विश्वविद्यालय द्वारा अपने संबद्ध कॉलेजों से ली जाने वाली अफिलिएशन फीस (Affiliation Fee) पर GST देय है।
GST विभाग का तर्क था कि विश्वविद्यालय कॉलेजों को संबद्धता प्रदान करता है और इसके बदले शुल्क लेता है। इसलिए यह गतिविधि “सेवा (Service)” की श्रेणी में आती है और इस पर 18 प्रतिशत GST लगाया जा सकता है।
इसके आधार पर विभाग ने विश्वविद्यालय से वर्ष 2017-18 से 2022-23 तक के लिए GST, ब्याज और पेनल्टी की मांग की थी।
याचिकाकर्ता विश्वविद्यालय की दलीलें
राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय (RTU) की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि विश्वविद्यालय द्वारा अपने संबद्ध कॉलेजों से ली जाने वाली अफिलिएशन फीस (Affiliation Fee) किसी भी प्रकार से व्यापारिक या व्यावसायिक गतिविधि नहीं है। यह शुल्क विश्वविद्यालय को अपने वैधानिक और नियामक कार्यों को पूरा करने के लिए लिया जाता है, इसलिए इस पर GST लगाना कानून के विपरीत है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय की स्थापना राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय अधिनियम, 2006 के तहत की गई है और यह एक राज्य द्वारा स्थापित वैधानिक विश्वविद्यालय है।
तर्क दिया गया कि विश्वविद्यालय का मुख्य उद्देश्य तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना और उससे जुड़े शैक्षणिक मानकों को बनाए रखना है।
विश्वविद्यालय ने अदालत को बताया कि उसके अधीन 140 से अधिक कॉलेज संबद्ध हैं और इन कॉलेजों में 40 हजार से अधिक छात्र पढ़ाई करते हैं।
विश्वविद्यालय इन कॉलेजों के लिए पाठ्यक्रम तय करता है, परीक्षाएं आयोजित करता है, शैक्षणिक मानकों की निगरानी करता है और अंत में छात्रों को डिग्री प्रदान करता है।
याचिकाकर्ता ने कहा कि इन सभी कार्यों को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए विश्वविद्यालय संबद्ध कॉलेजों से अफिलिएशन फीस, निरीक्षण शुल्क, एनओसी शुल्क और अन्य प्रशासनिक शुल्क लेता है। यह शुल्क किसी सेवा के बदले नहीं बल्कि शैक्षणिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए एक वैधानिक शुल्क है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि GST अधिनियम, 2017 के तहत किसी गतिविधि पर टैक्स तभी लगाया जा सकता है जब वह “सप्लाई ऑफ सर्विस” के रूप में किसी व्यापार या व्यवसाय के दौरान दी गई हो।
लेकिन विश्वविद्यालय द्वारा दी जाने वाली संबद्धता को व्यापार या व्यवसाय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह पूरी तरह शैक्षणिक और नियामक कार्य है।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि शिक्षा क्षेत्र को सरकार ने पहले से ही टैक्स से छूट दी हुई है। Notification No. 12/2017-CT (Rate) के तहत शैक्षणिक संस्थानों द्वारा प्रदान की जाने वाली कई सेवाओं को GST से मुक्त रखा गया है।
विश्वविद्यालय का कहना था कि संबद्धता सेवा भी शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा है और इसे उसी श्रेणी में देखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि संबद्धता केवल कॉलेजों के लिए नहीं बल्कि छात्रों के हित में दी जाती है।
किसी भी कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र तभी विश्वविद्यालय की डिग्री प्राप्त कर सकते हैं जब वह कॉलेज विश्वविद्यालय से संबद्ध हो। इसलिए संबद्धता का वास्तविक लाभ छात्रों को मिलता है।
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विश्वविद्यालय ने यह भी बताया कि पहले की सर्विस टैक्स व्यवस्था में भी इस प्रकार की शैक्षणिक सेवाओं पर टैक्स नहीं लगाया जाता था। इसी कारण विश्वविद्यालय को यह सच्चा और ईमानदार विश्वास (Bona Fide Belief) था कि GST भी लागू नहीं होगा।
याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि विभाग द्वारा की गई जांच में विश्वविद्यालय ने पूरा सहयोग किया और मांगी गई सभी जानकारी उपलब्ध कराई।
इसके अलावा, विश्वविद्यालय ने विभाग की मांग पर 4,25,86,142 रुपये GST और 3,02,68,940 रुपये ब्याज भी जमा करा दिया था, जबकि उसने कोई टैक्स कॉलेजों से वसूल नहीं किया था।
विश्वविद्यालय ने यह भी तर्क दिया कि विभाग ने CGST अधिनियम की धारा 74 के तहत पेनल्टी लगाने की कार्रवाई शुरू की, जबकि इस धारा का उपयोग तभी किया जा सकता है जब कर चोरी, गलत जानकारी या तथ्यों को छिपाने का मामला हो।
लेकिन विश्वविद्यालय ने कोई जानकारी छिपाई नहीं और न ही कर चोरी का कोई इरादा था। इसलिए धारा 74 के तहत कार्रवाई करना गलत है।
याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया कि शो कॉज नोटिस और उससे संबंधित सभी कार्रवाई को रद्द किया जाए।
जीएसटी विभाग की ओर से दलीलें
केंद्र सरकार और जीएसटी विभाग की ओर से हाईकोर्ट में कहा गया कि विश्वविद्यालय द्वारा कॉलेजों को संबद्धता प्रदान करना एक औपचारिक और कानूनी प्रक्रिया है, जिसके बिना कोई भी कॉलेज छात्रों को प्रवेश नहीं दे सकता और न ही पाठ्यक्रम संचालित कर सकता है।
इसलिए संबद्धता एक ऐसी गतिविधि है जिसके बदले विश्वविद्यालय शुल्क लेता है और यह “सेवा प्रदान करने” की श्रेणी में आती है।
सरकार की ओर से कहा गया कि GST अधिनियम की धारा 2(102) के अनुसार “सेवा” का अर्थ है किसी भी प्रकार की गतिविधि जो वस्तु या धन के अलावा हो और जिसके बदले भुगतान लिया जाए।
इस परिभाषा के अनुसार विश्वविद्यालय द्वारा संबद्धता प्रदान करना भी एक सेवा है।
सरकार ने कहा कि संबद्धता के बिना कॉलेज छात्रों को प्रवेश नहीं दे सकते, इसलिए कॉलेजों के लिए यह एक आवश्यक सेवा है और विश्वविद्यालय इसके बदले शुल्क लेता है।
इसलिए यह गतिविधि Heading 9992 (Education Services) के अंतर्गत आती है और इस पर 18 प्रतिशत GST लागू होता है।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि Notification No. 12/2017 में जिन सेवाओं को टैक्स से छूट दी गई है, उनमें संबद्धता सेवा शामिल नहीं है।
इस नोटिफिकेशन में केवल छात्रों से संबंधित सेवाओं जैसे प्रवेश, परीक्षा और कुछ अन्य सेवाओं को छूट दी गई है।
सरकार ने यह भी कहा कि टैक्स छूट संबंधी प्रावधानों की व्याख्या बहुत सीमित तरीके से की जानी चाहिए।
यदि किसी सेवा को स्पष्ट रूप से छूट नहीं दी गई है, तो उसे टैक्स योग्य माना जाएगा।
प्रतिवादी पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि GST परिषद की चर्चाओं और विभागीय स्पष्टीकरण में यह स्पष्ट किया गया है कि विश्वविद्यालय द्वारा कॉलेजों को दी जाने वाली संबद्धता सेवा टैक्स से मुक्त नहीं है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि यदि विश्वविद्यालय की दलील को स्वीकार कर लिया जाए तो शिक्षा से जुड़ी कई अन्य गतिविधियां भी टैक्स से मुक्त हो जाएंगी, जिससे कर प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि यह तर्क देना सही नहीं है कि टैक्स का बोझ छात्रों पर पड़ेगा, क्योंकि टैक्स की देनदारी तय करते समय यह नहीं देखा जाता कि उसका आर्थिक प्रभाव किस पर पड़ेगा।
प्रतिवादी पक्ष ने अदालत से अनुरोध किया कि विश्वविद्यालय की याचिका को खारिज किया जाए और विभाग की कार्रवाई को वैध माना जाए।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय द्वारा कॉलेजों को दी जाने वाली संबद्धता शिक्षा व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि कोई भी कॉलेज तब तक छात्रों को प्रवेश नहीं दे सकता, न ही परीक्षा आयोजित कर सकता है और न ही डिग्री प्रदान कर सकता है, जब तक उसे विश्वविद्यालय से संबद्धता प्राप्त न हो।
इसलिए संबद्धता को शिक्षा प्रक्रिया से अलग नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह गतिविधि व्यावसायिक या व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं बल्कि शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए की जाती है।
कोर्ट ने कहा कि GST कानून के तहत किसी गतिविधि को टैक्स के दायरे में लाने के लिए यह जरूरी है कि वह गतिविधि व्यवसाय (Business) के अंतर्गत आती हो।
लेकिन विश्वविद्यालय द्वारा संबद्धता प्रदान करना शिक्षा से जुड़ा नियामक और वैधानिक कार्य है, इसलिए इसे व्यापारिक गतिविधि नहीं माना जा सकता।
4 माह में रिफंड करने के आदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आदेश दिया है कि विश्वविद्यालय द्वारा अफिलिएशन फीस पर पहले से जमा की गई जीएसटी की राशि चार महीने के भीतर वापस (रिफंड) की जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि निर्धारित अवधि में यह राशि वापस नहीं की जाती है, तो जीएसटी विभाग को भुगतान की तारीख से लेकर रिफंड की तारीख तक इस राशि पर प्रतिवर्ष 7% की दर से ब्याज भी देना होगा।