जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज (ICDS) से जुड़े एक महत्वपूर्ण और लंबे समय से चल रहे सप्लाई विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थ (Arbitrator) द्वारा दिया गया अवॉर्ड पूरी तरह वैध है और इसे लागू किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने मुरलीवाला एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के पक्ष में दिए गए मध्यस्थ (Arbitrator) के अवॉर्ड को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कंपनी को करोड़ों रुपये की राशि ब्याज सहित चुकानी होगी।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने Director, Integrated Child Development Services की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला ICDS योजना के तहत महिलाओं और बच्चों को पोषाहार उपलब्ध कराने के लिए हुए एक सरकारी टेंडर से जुड़ा है।
मामले की शुरुआत वर्ष 2010 में हुई, जब राजस्थान सरकार के ICDS विभाग ने महिलाओं और बच्चों के लिए पोषाहार सामग्री जैसे पंजीरी (सत्तू), हलवा प्रीमिक्स और उपमा प्रीमिक्स की आपूर्ति के लिए टेंडर जारी किया।
इस टेंडर के तहत M/s मुरलीवाला एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड को उदयपुर, जोधपुर, पाली सहित कई जिलों में सप्लाई का ठेका दिया गया। दोनों पक्षों के बीच 20 अक्टूबर 2010 को अनुबंध हुआ, जिसे बाद में मार्च 2012 तक बढ़ाया गया।
लेकिन वर्ष 2012 में विभाग को सप्लाई की गुणवत्ता और सेवाओं को लेकर शिकायतें मिलीं।
इसके आधार पर सरकार ने 18 जून 2012 को कंपनी के खिलाफ करीब 9.53 करोड़ रुपये की रिकवरी नोटिस जारी कर दी। हालांकि, पहले से देय राशि को समायोजित करने के बाद करीब 1.22 करोड़ रुपये की वसूली तय की गई।
मध्यस्थता (Arbitration) और बड़ा अवॉर्ड
कंपनी ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने रिटायर्ड जस्टिस पानाचंद जैन को एकल मध्यस्थ नियुक्त किया।
मध्यस्थ ने दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेजों का विश्लेषण करने के बाद 31 जुलाई 2015 को कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया। इस अवॉर्ड के तहत कंपनी को 18.75 करोड़ रुपये के साथ 12% वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया गया
आर्बिट्रेटर ने अपने फैसले में कहा कि सरकार ने बिना नोटिस दिए अनुबंध समाप्त किया और कंपनी को सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया।
आर्बिट्रेटर ने सैंपल जांच प्रक्रिया में भी नियमों का पालन नहीं होने को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना।
राज्य सरकार ने इस अवॉर्ड को कमर्शियल कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी अवॉर्ड को सही ठहराया गया। इसके बाद सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
सरकार की दलीलें और कोर्ट की प्रतिक्रिया
राज्य सरकार ने इस अवॉर्ड को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की और कहा कि अनुबंध में कोई वैध आर्बिट्रेशन क्लॉज नहीं था और ब्याज देने का कोई प्रावधान नहीं था।
लेकिन हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि अनुबंध में स्पष्ट रूप से Clause 17 मौजूद था, जिसमें मध्यस्थता का प्रावधान था, जिस पर सरकार ने पहले कभी आपत्ति नहीं उठाई।
कोर्ट ने कहा कि अंतिम चरण में ऐसी दलीलें देना स्वीकार्य नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना लिखित आधार के केवल मौखिक तर्कों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
ब्याज को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि Arbitration Act, 1996 के तहत आर्बिट्रेटर को ब्याज देने का अधिकार है और आर्बिट्रेटर ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर ब्याज तय किया।
- मध्यस्थ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और कानून की धाराओं का हवाला देते हुए ब्याज देने का स्पष्ट आधार बताया है।
- Arbitration and Conciliation Act, 1996 की धारा 31(7) के तहत मध्यस्थ को ब्याज देने का अधिकार है।
ब्याज दर तय करना मध्यस्थ के विवेक पर निर्भर करता है, जो इस मामले में उचित पाया गया। कोर्ट ने 12% ब्याज दर को न्यायसंगत माना।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जब तक अवॉर्ड में स्पष्ट अवैधता न हो, तब तक अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए आर्बिट्रेटर के अवॉर्ड को पूरी तरह वैध बताया।
साथ ही कंपनी को ब्याज सहित पूरी राशि का भुगतान किया जाए।
यह मामला ICDS योजना के तहत पोषाहार आपूर्ति से जुड़ा है, जिसमें राज्य सरकार और निजी कंपनी के बीच हुए अनुबंध, उसके उल्लंघन और उसके बाद हुए मध्यस्थता विवाद पर यह फैसला आया है।