हाईकोर्ट ने बेटियों के दर्द को बयां करते हुए समाज से पूछा – क्या हम वह वातावरण निर्मित कर पाएँगे जहाँ बेटी होना अपराध नहीं, सम्मान का प्रतीक होगा?
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और दिल दहला देने वाले मामले में कठोर रुख अपनाते हुए अपनी ही नाबालिग बेटी के साथ बार-बार दुष्कर्म करने वाले पिता की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जब एक पिता, जो अपने बच्चे का रक्षक और संरक्षक होता है, वही उसके साथ यौन हिंसा करता है तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि मानवता और सामाजिक नैतिकता पर सबसे बड़ा आघात है।
मुख्यपीठ में जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा ने आरोपी की आपराधिक अपील खारिज करते हुए पाली की पॉक्सो अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को सही ठहराया।
साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पीड़िता को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की योजना के तहत 7 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर का दर्द
जस्टिस विनीत कुमार माथुर ने इस बेहद संवेदनशील मामले में अपने फैसले में बेटियों के दर्द को सामने लाते हुए शब्दों में अपना दर्द बयां किया हैं.
“आज भी वातावरण में करुण पुकारों की प्रतिध्वनि सुनाई देती है;
इस समाज की अनेक बेटियाँ भीतर ही भीतर पीड़ा सहते हुए जीवन व्यतीत कर रही हैं।
समाचारों की सुर्खियाँ फिर किसी अस्मिता के रौंदे जाने की कथा कहेंगी
किसी मासूम के रक्त से समाज का माथा पुनः कलंकित होगा।
और वह अबोध प्रश्न फिर हवा में तैरता रहेगा
—‘मेरा अपराध क्या था? क्या केवल बेटी होना ही मेरा दोष है?’
जब सभ्यता के आवरण में छिपी दरिंदगी खुलेआम विचरती हो,
जब मानवता का चेहरा ओढ़े भेड़िए निर्भीक घूमते हों,
तब नारी के लिए जीवन का प्रत्येक कदम भय से घिर जाता है।
कब तक उसकी गरिमा यूँ ही तार-तार होती रहेगी?
कब वह समय आएगा जब इस समाज की राहें, गलियाँ और चौखटें सचमुच बेटियों के लिए सुरक्षित होंगी?
यह केवल एक पीड़िता की वेदना नहीं, बल्कि समूचे समाज की अंतरात्मा पर लगा प्रश्न है
—क्या हम वह वातावरण निर्मित कर पाएँगे जहाँ बेटी होना अपराध नहीं, सम्मान का प्रतीक होगा?”
मामला कैसे सामने आया
अदालत के समक्ष आए रिकॉर्ड के अनुसार मार्च 2023 को पाली जिले एक पुलिस थाने में पीड़िता के चचेरे भाई ने पुलिस स्टेशन पहुंचकर एक लिखित रिपोर्ट दी। रिपोर्ट में बताया गया कि उसकी चचेरी बहन घर से अचानक गायब हो गई है और वह करीब 14 वर्ष की नाबालिग है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि लड़की अपने साथ कोई सामान नहीं ले गई है और संभव है कि कोई अज्ञात व्यक्ति उसे बहला-फुसलाकर ले गया हो।
इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 363 के तहत अपहरण का मामला दर्ज कर जांच शुरू की। लेकिन जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, उन्होंने पूरे मामले को बेहद गंभीर और भयावह बना दिया।
डेढ़ साल से चल रहा था अत्याचार
जांच में खुलासा हुआ कि नाबालिग लड़की लंबे समय से अपने ही पिता द्वारा यौन शोषण का शिकार हो रही थी।
मामले की सुनवाई के दौरान पीड़िता ने अदालत को बताया कि उसकी मां उसे छोड़कर किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने लगी थी और इसके बाद वह अपने पिता के साथ अकेली रहती थी।
पीड़िता ने बताया कि उसका पिता शराब पीने का आदी था और पिछले करीब डेढ़ साल से उसके साथ बार-बार गलत काम कर रहा था।
पीड़िता ने पहले अपनी मां को फोन कर यह बात बताई थी, जिसके बाद उसकी मां उसे मुंबई ले गई। लेकिन कुछ समय बाद वह वापस अपने गांव लौट आई और उसके बाद फिर से उसके पिता ने उसके साथ यौन शोषण करना शुरू कर दिया।
यह स्थिति लंबे समय तक चलती रही क्योंकि पीड़िता डर और सामाजिक दबाव के कारण किसी को खुलकर कुछ बता नहीं पा रही थी।
सच सामने लाने के लिए बनाया वीडियो
एक दिन अपने पास के एक गांव में एक कार्यक्रम के दौरान पीड़िता की मुलाकात अपनी चचेरी बहन से हुई। वहां उसने पहली बार अपने साथ हो रहे अत्याचार के बारे में बताया।
शुरुआत में किसी को विश्वास नहीं हुआ कि एक पिता अपनी ही बेटी के साथ ऐसा कर सकता है।
इसके बाद उसे सलाह दी गई कि अगर कोई भरोसा नहीं करता तो घटना का वीडियो बना ले।
पीड़िता ने साहस दिखाते हुए मोबाइल फोन को खिड़की के पास रखकर वीडियो रिकॉर्ड कर लिया, जिसमें उसके पिता द्वारा उसके साथ की जा रही दरिंदगी कैद हो गई।
उसने यह वीडियो अपनी बड़ी बहन को भेजा और वहीं से पूरा मामला सामने आया।
बाद में यह वीडियो पुलिस के हाथ लगा और जांच का अहम साक्ष्य बन गया।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद
पाली की विशेष पॉक्सो अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद आरोपी को कई गंभीर धाराओं में दोषी पाया।
अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(3), 376(2)(F), 376(2)(J) और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(L)/6 के तहत दोषी ठहराते हुए प्राकृतिक जीवनकाल तक की उम्रकैद की सजा सुनाई।
हालांकि मामले में सह आरोपी मिथुन खान को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
नपुंसक होने का बहाना ओर हाईकोर्ट में चुनौती
ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपी पिता ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।
उसकी ओर से अदालत में कई दलीलें दी गईं।
बचाव पक्ष ने कहा कि पीड़िता के बयान में विरोधाभास हैं और ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया।
आरोपी की ओर से यह भी कहा गया कि वह चिकित्सकीय रूप से नपुंसक है, इसलिए उसके द्वारा दुष्कर्म करना संभव नहीं है।
इसके अलावा यह तर्क भी दिया गया कि पीड़िता और उसके रिश्तेदारों ने मिलकर उसे झूठे मामले में फंसा दिया है।
लेकिन हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को साक्ष्यों के आधार पर खारिज कर दिया।
वीडियो और गवाही ने बदल दिया केस
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पीड़िता द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो को देखा।
अदालत ने पाया कि वीडियो में आरोपी द्वारा नाबालिग के साथ यौन अपराध किया जा रहा है।
इसके आधार पर अदालत ने कहा कि आरोपी का यह दावा कि वह नपुंसक है, पूरी तरह निराधार है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मेडिकल राय के आधार पर अपराध से इनकार नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य घटना की पुष्टि कर रहे हों।
इस प्रकार वीडियो साक्ष्य ने पूरे मामले में निर्णायक भूमिका निभाई।
पीड़िता की गवाही पर भरोसा
हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता की गवाही स्पष्ट, सुसंगत और भरोसेमंद है।
अदालत ने यह भी कहा कि बचाव पक्ष पीड़िता के मुख्य आरोपों को जिरह के दौरान प्रभावी तरीके से चुनौती देने में विफल रहा।
कानून का सिद्धांत है कि यदि किसी महत्वपूर्ण तथ्य पर जिरह नहीं की जाती तो उसे स्वीकार माना जाता है।
इसलिए अदालत ने कहा कि पीड़िता की गवाही अपने आप में पर्याप्त है और इसके लिए अतिरिक्त पुष्टि की आवश्यकता नहीं है।
अदालत की कड़ी टिप्पणी
फैसले में अदालत ने बेहद कठोर और भावुक टिप्पणी करते हुए कहा कि जब पिता ही अपनी बेटी का शोषण करे तो यह अपराध सामान्य अपराधों से कहीं अधिक गंभीर हो जाता है।
अदालत ने कहा कि ऐसा अपराध परिवार के सबसे पवित्र रिश्ते को तोड़ देता है और पीड़िता के जीवन पर स्थायी घाव छोड़ देता है।
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालयों को कठोर सजा देकर समाज को स्पष्ट संदेश देना चाहिए कि बच्चों के साथ यौन अपराध करने वालों के लिए कोई नरमी नहीं होगी।
बेटियों की सुरक्षा पर अदालत की चिंता
फैसले में अदालत ने समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी रखा।
अदालत ने कहा कि आज भी समाज में कई बेटियां ऐसी पीड़ा झेल रही हैं जिसे वे किसी से कह नहीं पातीं।
जब समाज में मानवता का चेहरा ओढ़े दरिंदे खुलेआम घूमते हैं तो महिलाओं और बेटियों के लिए हर कदम डर से भरा होता है।
अदालत ने कहा कि यह केवल एक पीड़िता की कहानी नहीं बल्कि पूरे समाज की अंतरात्मा से जुड़ा सवाल है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया।
अदालत ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद हो तो उसी के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि बलात्कार मामलों में पीड़िता की गवाही अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।
पीड़िता को मिलेगा मुआवजा
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि न्याय केवल अपराधी को सजा देने तक सीमित नहीं होना चाहिए बल्कि पीड़िता के पुनर्वास की भी जिम्मेदारी है।
इसलिए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की योजना के तहत पीड़िता को 7 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए।
अदालत ने कहा कि यह मुआवजा पीड़िता के भविष्य और पुनर्वास में मदद करेगा।
अपील खारिज, सजा बरकरार
सभी साक्ष्यों और तर्कों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपी का अपराध संदेह से परे साबित हो चुका है।
इसलिए अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी।
समाज के लिए सख्त संदेश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बच्चों के साथ यौन अपराध समाज के सबसे जघन्य अपराधों में से हैं।
जब यह अपराध परिवार के भीतर ही हो, खासकर पिता द्वारा, तो इसकी गंभीरता कई गुना बढ़ जाती हैं।