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आबकारी नीति बनाना और उसमें बदलाव करना राज्य सरकार का नीतिगत अधिकार, अदालतों का हस्तक्षेप सीमित: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court Upholds State Excise Policy, Dismisses Multiple Petitions Challenging Liquor License Rules

शराब दुकानों को लेकर राज्य की लाइसेंस नीति को चुनौती देने वाली दर्जनों याचिकाएं खारिज, कोर्ट ने कहा-शराब व्यापार पर सरकार का विशेष अधिकार

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य की आबकारी नीति (Excise Policy) और शराब दुकानों के लाइसेंस से जुड़े मामलों में दायर बड़ी संख्या में याचिकाओं पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि आबकारी नीति बनाना और उसमें बदलाव करना राज्य सरकार का नीतिगत अधिकार है, जिसमें अदालत केवल सीमित परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकती है।

डॉ. जस्टिस पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने राज्य के विभिन्न जिलों—जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर, उदयपुर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चित्तौड़गढ़ और नागौर सहित कई जिलों के दुकान संचालकों द्वारा दायर कई दर्जन याचिकाओं पर संयुक्त रूप से सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

अदालत के समक्ष इन सभी मामलों में राज्य सरकार की आबकारी नीति, शराब दुकानों के आवंटन और लाइसेंस प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को चुनौती दी गई थी।

बड़ी संख्या में दायर हुई थीं याचिकाएं

हाईकोर्ट के समक्ष यह मामला कई अलग-अलग याचिकाओं के रूप में आया था, जिन्हें बाद में एक साथ सुनवाई के लिए जोड़ा गया।

इन याचिकाओं में बाड़मेर की जमना, जोधपुर के राम पंचमाला, उदयपुर की झिलमिल मेवाड़ा, निर्मला देवी चौधरी सहित कई अन्य लोगों ने राज्य सरकार, आबकारी आयुक्त और संबंधित जिलों के आबकारी अधिकारियों को पक्षकार बनाते हुए याचिका दायर की थी।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि राज्य सरकार द्वारा शराब दुकानों के लाइसेंस और नीलामी से जुड़ी प्रक्रिया में कई ऐसी शर्तें रखी गई हैं, जो मनमानी और भेदभावपूर्ण हैं।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में कहा गया कि राज्य सरकार की नई आबकारी नीति के कारण छोटे लाइसेंस धारकों और स्थानीय व्यापारियों को नुकसान हो रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि शराब दुकानों के लाइसेंस आवंटन की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है, कई जगहों पर नीलामी और आवंटन में असमानता बरती जा रही है और नीति में किए गए बदलाव से छोटे कारोबारियों के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो गया है।

कुछ याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि सरकार की नीति से स्थानीय लोगों के हितों की अनदेखी हो रही है और इससे रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।

राज्य सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता महावीर बिश्नोई अदालत में कहा कि आबकारी नीति पूरी तरह राज्य सरकार का नीतिगत निर्णय है और इसे सार्वजनिक राजस्व तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बनाया जाता है।

सरकार ने तर्क दिया कि आबकारी नीति बनाना सरकार का अधिकार है और नीति में बदलाव समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार किया जा सकता है।

सरकार ने यह भी कहा कि अदालतें सामान्यतः नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करतीं। सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि शराब दुकानों के लाइसेंस और नीलामी की प्रक्रिया नियमों के तहत पारदर्शी तरीके से की जाती है।

हाईकोर्ट का फैसला

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार को आबकारी नीति बनाने और उसमें संशोधन करने का अधिकार है।

कोर्ट ने कहा कि जब तक किसी नीति में स्पष्ट रूप से संवैधानिक या कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन साबित न हो, तब तक न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि शराब का व्यापार एक नियंत्रित (regulated) व्यापार है और इसमें सरकार को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं।

नीतिगत मामलों में अदालत का सीमित हस्तक्षेप

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि नीतिगत मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होता है।

कोर्ट ने कहा कि अदालत केवल यह देख सकती है कि किसी नीति में मनमानी तो नहीं है और संविधान या कानून का उल्लंघन तो नहीं है, या निर्णय प्रक्रिया पूरी तरह अनुचित या भेदभावपूर्ण तो नहीं है।

यदि ऐसा कुछ साबित नहीं होता है, तो अदालत नीतिगत निर्णयों को बदलने का आदेश नहीं दे सकती।

सरकार का विशेष अधिकार

फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि शराब का व्यापार सामान्य व्यापार की तरह नहीं माना जाता।

संविधान और कानून के तहत राज्य सरकार को शराब के उत्पादन, बिक्री और वितरण को नियंत्रित करने का विशेष अधिकार प्राप्त है।

इसलिए सरकार यह तय कर सकती है कि:

  • कितनी शराब दुकानें होंगी
  • लाइसेंस किसे दिया जाएगा
  • नीलामी या आवंटन की प्रक्रिया क्या होगी

सभी याचिकाएं खारिज

सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि राज्य सरकार की आबकारी नीति अवैध या असंवैधानिक है।

इसी आधार पर अदालत ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

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