मूल दस्तावेज पेश कराने के लिए गवाह को पुनः बुलाने की मांग खारिज, कोर्ट ने कहा-Order 18 Rule 17 CPC का उपयोग केवल अदालत की आवश्यकता के लिए
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि गवाह को दोबारा बुलाने (Recall) का अधिकार किसी पक्षकार का स्वाभाविक अधिकार नहीं है, बल्कि यह अदालत का विवेकाधीन अधिकार है, जिसका प्रयोग केवल विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि Order 18 Rule 17 CPC का उद्देश्य पक्षकारों को अपने मामले की कमियों को पूरा करने का अवसर देना नहीं है।
जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकल पीठ ने श्यामलाल की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए माना कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।
मामला क्या है..
यह पूरा मामला अजमेर जिले के किशनगढ़ स्थित एक संपत्ति से जुड़ा है।
वादी पक्ष ने वर्ष 2012 में ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट, 1882 की धारा 106 के तहत किरायेदारी समाप्त करते हुए प्रतिवादी किरायेदार को बेदखल करने का मुकदमा (Ejectment Suit) दायर किया था।
वादी का कहना था कि वह विवादित संपत्ति का मालिक है और प्रतिवादी वहां किरायेदार के रूप में रह रहा था, जिसने किराया चुकाने में चूक की।
इसके बाद 22 फरवरी 2012 को नोटिस जारी कर किरायेदारी समाप्त की गई और अदालत में बेदखली का मुकदमा दायर किया गया।
किरायेदार का खंडन
प्रतिवादी किरायेदार ने नोटिस के जवाब में इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि राजस्थान रेंट कंट्रोल एक्ट, 2001 लागू होने के बाद ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट के तहत ऐसी कार्यवाही बनाए रखने योग्य नहीं है।
इसके अलावा उसने यह भी तर्क दिया कि विवादित संपत्ति का विवरण स्पष्ट नहीं है और वह किराया चूकने का दोषी नहीं है।
मुकदमे में नया मोड़
मुकदमे की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया। मूल वादी ने 20 दिसंबर 2024 को एक रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से यह संपत्ति अक्षय जैन को बेच दी।
इसके बाद अक्षय जैन ने Order 22 Rule 10 CPC के तहत आवेदन देकर स्वयं को वादी के रूप में प्रतिस्थापित (Substitution) करने का अनुरोध किया।
ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद 25 अगस्त 2025 को यह आवेदन स्वीकार कर लिया और अक्षय जैन को नए वादी के रूप में शामिल कर लिया।
प्रतिवादी किरायेदार की आपत्ति
प्रतिवादी किरायेदार श्यामलाल ने इस आदेश का विरोध करते हुए अदालत में कई आपत्तियां उठाईं।
उसका कहना था कि जिस सेल डीड के आधार पर अक्षय जैन को वादी बनाया गया है, उसका मूल दस्तावेज अदालत में पेश नहीं किया गया है।
किरायेदार प्रतिवादी ने अदालत से मांग की कि नए वादी को मूल रजिस्टर्ड सेल डीड के साथ अदालत में पेश होने का निर्देश दिया जाए।
उसे दस्तावेज के संबंध में जिरह (Cross Examination) का अवसर दिया जाए।
इसी उद्देश्य से उसने Order 18 Rule 17 CPC के तहत आवेदन देकर गवाह को दोबारा बुलाने की मांग की।
ट्रायल कोर्ट का निर्णय
ट्रायल कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद 20 जनवरी 2026 को यह आवेदन खारिज कर दिया।
अदालत का मानना था कि यह आवेदन मुकदमे की कार्यवाही को अनावश्यक रूप से लंबा करने के उद्देश्य से दाखिल किया गया है।
इसके बाद प्रतिवादी ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता किरायेदार श्यामलाल की ओर से अदालत में दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने उनके आवेदन को खारिज करते समय महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर विचार नहीं किया।
अधिवक्ता ने कहा कि जिस सेल डीड (Sale Deed) के आधार पर अक्षय जैन को वादी के रूप में बदला गया है, वह अभी तक विधिवत रूप से साक्ष्य के रूप में पेश नहीं की गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क रखा गया कि किसी भी व्यक्ति को मुकदमे में वादी के रूप में जारी रखने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि उसने वास्तव में विवादित संपत्ति में वैध अधिकार प्राप्त किया है।
केवल सेल डीड की एक प्रति दाखिल कर देने से यह साबित नहीं हो जाता कि संपत्ति का स्वामित्व वैध रूप से हस्तांतरित हो गया है।
इसलिए अदालत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि संबंधित दस्तावेज का मूल रूप अदालत में प्रस्तुत किया जाए और उसकी विधिक जांच की जाए।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि कथित सेल डीड दस्तावेज को भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार प्रमाणित नहीं किया गया है।
अधिवक्ता ने कहा कि अगर अदालत बिना मूल दस्तावेज के ही किसी व्यक्ति को मुकदमे में वादी के रूप में जारी रहने की अनुमति देती है, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा आवेदन को खारिज करना विधि के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
प्रतिवादी नए मकान मालिक का पक्ष
प्रतिवादी पक्ष की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ता द्वारा दाखिल किया गया आवेदन केवल मुकदमे की कार्यवाही में देरी करने के उद्देश्य से किया गया है।
प्रतिवादी के वकील ने अदालत को बताया कि मूल वादी द्वारा विवादित संपत्ति को 20 दिसंबर 2024 की रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से अक्षय जैन को बेच दिया गया था।
इसके बाद नए खरीदार ने Order 22 Rule 10 CPC के तहत अदालत में आवेदन देकर स्वयं को वादी के रूप में प्रतिस्थापित करने का अनुरोध किया था।
इस आवेदन के साथ सेल डीड की प्रमाणित प्रति भी अदालत में प्रस्तुत की गई थी।
प्रतिवादी पक्ष ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने इस आदेश को पहले भी चुनौती दी थी और Section 151 CPC के तहत एक आवेदन दायर किया था, जिसमें कहा गया था कि नया वादी मुकदमा जारी नहीं रख सकता। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने उस आवेदन को भी 27 अक्टूबर 2025 को खारिज कर दिया था।
प्रतिवादी की ओर से कहा गया कि जब प्रतिस्थापन का आदेश पहले ही पारित हो चुका है और उसे चुनौती देने के प्रयास भी विफल हो चुके हैं, तो अब Order 18 Rule 17 CPC के तहत गवाह को दोबारा बुलाने की मांग करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
अधिवक्ता ने कहा कि Order 18 Rule 17 CPC का उद्देश्य गवाह को दोबारा बुलाकर पक्षकारों को अतिरिक्त साक्ष्य पेश करने का अवसर देना नहीं है। यह प्रावधान केवल तब लागू होता है जब अदालत स्वयं किसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए गवाह से प्रश्न पूछना आवश्यक समझे।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में Order 18 Rule 17 CPC की व्याख्या करते हुए कहा कि यह प्रावधान अदालत को यह शक्ति देता है कि वह आवश्यकता पड़ने पर किसी गवाह को दोबारा बुला सकती है।
लेकिन यह अधिकार मुख्य रूप से अदालत के लिए है, न कि पक्षकारों के लिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान साक्ष्य में स्पष्टता लाने या किसी संदेह को दूर करने के लिए है।
इसका उपयोग मुकदमे में कमियां भरने या नए साक्ष्य लाने के लिए नहीं किया जा सकता और गवाह को दोबारा बुलाने का अधिकार सामान्य नियम नहीं बल्कि अपवाद है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Shubhkaran Singh vs Abhay Raj Singh का हवाला देते हुए कहा कि यह शक्ति बहुत सावधानी और सीमित परिस्थितियों में ही प्रयोग की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश कानून के अनुरूप है और Order 18 Rule 17 CPC के तहत प्रतिवादी की मांग स्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए रिट याचिका खारिज कर दी।