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पार्ट–3 | वर्ष 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट के ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले

Rajasthan High Court’s Landmark Judgments of 2025: Part 3 Highlights Constitutional and Social Justice Rulings

जयपुर। वर्ष 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों की पार्ट–3 श्रृंखला में उन महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल निर्णयों को शामिल किया जा रहा है, जिन्होंने प्रशासनिक मनमानी पर अंकुश लगाया, नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा की और यह संदेश दिया कि कानून केवल नियमों का संकलन नहीं, बल्कि न्याय का सजीव माध्यम है।

इस श्रृंखला के पार्ट–1 और पार्ट–2 में प्रकाशित ऐतिहासिक एवं रिपोर्टेबल जजमेंट आप पूर्व में दिए गए लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं।

पार्ट–3 | वर्ष 2025 के ऐतिहासिक फैसले

1 Rajasthan Highcourt की जयपुर पीठ ने चेक से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति ने समय-सीमा पार (time-barred) ऋण के लिए लिखित रूप से चेक जारी किया है, तो वह भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 25(3) के तहत वैध व प्रवर्तनीय देनदारी (legally enforceable debt) मानी जाएगी।

जस्टिस प्रमिल कुमार माथुर की एकलपीठ ने रतिराम यादव व 5 अन्य आपराधिक निगरानी याचिकाओं का निस्तारण करते हुए यह फैसला दिया है।

2 Rajasthan Highcourt ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि गंभीर चोट या हत्या के प्रयास के मामलों में केवल एक्स-रे रिपोर्ट पर आधारित मेडिकल ज्यूरिस्ट की राय पर्याप्त नहीं मानी जा सकती. Highcourt ने कहा कि ऐसे मामलों में एक्स-रे तैयार करने वाले रेडियोलॉजिस्ट की गवाही आवश्यक है ताकि चोट की गंभीरता का सही निर्धारण हो सके.

जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने यह आदेश पाली जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित 12 मार्च 2025 के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया हैं.

4 राजस्थान हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि करुणा आधारित नियुक्ति (Compassionate Appointment) के लिए परिवार का ‘सड़क पर आ जाना’ या ‘भिखारी जैसी हालत’ में होना आवश्यक नहीं है।

जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि- “करुणा को अंकगणित के खेल में नहीं बदला जा सकता।”

5 Rajasthan High court की जयपुर पीठ ने पॉक्सो के मामले में एक महत्वपूर्ण बड़ा फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि दुष्कर्म और Pocso Act जैसे मामलों में केवल डीएनए रिपोर्ट को आधार बनाकर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि अभियोजन जांच, गवाहों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के माध्यम से यह सिद्ध न कर दे कि अपराध वास्तव में हुआ है।

Justice Anoop Kumar Dhand की एकलपीठ ने अपने इस फैसले में राज्य सरकार की ओर से दायर क्रिमिनल लीव टू अपील को खारिज करते हुए DNA रिपोर्ट होने के बावजूद Pocso Act मामले में ट्रायल कोर्ट का आरोपी को बरी करने के फैसले को सही ठहराया है।

6 राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दिव्यांगता के आधार पर MBBS में प्रवेश से वंचित की गई एक छात्रा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की कार्रवाई को मनमाना, अवैध और संविधान के विपरीत करार दिया है।

DR. JUSTICE NUPUR BHATI की एकलपीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया है कि NEET-UG 2025 के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा मान्यता प्राप्त केंद्र द्वारा जारी विकलांगता प्रमाणपत्र को राज्य सरकार चुनौती नहीं दे सकती।

7 राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए 1 फरवरी 2026 से संपूर्ण राजस्थान में सभी मेडिकल रिपोर्टों को अनिवार्य रूप से MedLEaPR (Medico Legal Examination and Post-Mortem Reporting Software) के जरिए ही डिजिटल रूप से तैयार करने का आदेश दिया है।

जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ ने श्रीगंगानगर जिले के बहुचर्चित भाई द्वारा भाई की हत्या मामले में दायर जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी है।

8 राजस्थान हाईकोर्ट ने हाईकोर्ट सहित प्रदेश की अन्य न्यायिक सेवाओं के कर्मचारियों के प्रमोशन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने कर्मचारियों की पदोन्नति के मामले में फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि “एसीपी केवल एक वित्तीय लाभ है, इसे वास्तविक पदोन्नति नहीं माना जा सकता।”

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने यह आदेश जय सिंह व अन्य बनाम राजस्थान हाईकोर्ट के मामले में दिया है.

9 राजस्थान हाईकोर्ट ने पर्यावरण कानूनों के क्रियान्वयन को लेकर एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल प्रशासनिक आदेशों या दिशानिर्देशों के आधार पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति (Environmental Compensation) की वसूली नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूलने के लिए विधिवत नियम और उप-विधान (Rules & Regulations) अधिसूचित नहीं किए जाते, तब तक राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को यह अधिकार प्राप्त नहीं है।

जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकल पीठ ने टाटा ब्रिक्स कंपनी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

10 Rajasthan Highcourt की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आदेश में यह स्पष्ट किया है कि जब किसी अपराध के लिए न्यूनतम सज़ा सात वर्ष से कम निर्धारित है, तो उसे “हेनियस अपराध” (Heinous Offence) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। Rajasthan Highcourt ने कहा कि इसलिए, ऐसे मामलों में किशोर आरोपियों को वयस्क की तरह ट्रायल के लिए नहीं भेजा जा सकता।

Justice Anoop Kumar Dhand की एकलपीठ ने अजमेर की पॉक्सो अदालत संख्या-2 के आदेश को निरस्त करते हुए यह फैसला सुनाया।

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