हाईकोर्ट ने कहा : खुली जेल में ट्रांसफर कोई कानूनी हक नहीं; विशेष या असाधारण परिस्थितियां साबित करनी होंगी, गंभीर अपराध के दोषियों के मामलों पर भी परिस्थितियों के आधार पर हो सकता है विचार।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ की तीन सदस्यीय Full Bench ने खुली जेलों में दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों के दोषियों को भेजने से जुड़े कानूनी बिंदु पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल की अध्यक्षता वाली इस फुल बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376 यानी दुष्कर्म या POCSO एक्ट के तहत दोषसिद्ध कैदियों को राजस्थान की ओपन एयर जेल (खुली जेल) में ट्रांसफर करने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।
हालांकि, राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे दोषियों को खुली जेल में भेजे जाने का कोई स्वतः या असीमित अधिकार भी प्राप्त नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह के प्रत्येक मामले में विशेष परिस्थितियों, अपराध की प्रकृति और गंभीरता, पीड़ित की आयु, जेल में आचरण, सुधार की संभावना तथा समाज में पुनर्वास की तैयारी का व्यक्तिगत आकलन करना होगा।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल की अध्यक्षता वाली इस बेंच में जस्टिस समीर जैन और जस्टिस प्रवीर भटनागर शामिल हैं।
फुल बेंच ने सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद इस बिंदु पर अपना फैसला 30 सितंबर 2026 को सुरक्षित रखा था।
यह फैसला राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप रूल्स, 1972 के नियम 3(d) में प्रयुक्त शब्द ‘Ordinarily’ यानी ‘सामान्यतः’ की व्याख्या से जुड़ा है।
हाईकोर्ट ने यह फैसला याचिकाकर्ता Gangaram S/o Shri Gulya Mali और Kailash S/o Shri Govindram @ Govinda की ओर से दायर डी.बी. क्रिमिनल रेफरेंस संख्या 1/2024 तथा इससे संबंधित दो रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया है।
इस कानूनी बिंदु पर राजस्थान हाईकोर्ट की अलग-अलग बेंचों ने अलग-अलग फैसले दिए थे, जिसके बाद परस्पर विरोधी निर्णयों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय फुल बेंच का गठन किया गया था।
क्या था पूरा मामला?
राजस्थान हाईकोर्ट की अलग-अलग खंडपीठों ने पूर्व में इस सवाल पर अलग-अलग विचार व्यक्त किए थे कि क्या आईपीसी की धारा 376 या POCSO एक्ट के तहत दोषसिद्ध कैदियों को ओपन एयर कैंप में भेजा जा सकता है।
एक पीठ का मानना था कि नियमों में प्रयुक्त शब्द ‘Ordinarily’ के कारण ऐसे कैदियों को विशेष परिस्थितियों में ओपन एयर कैंप में भेजने की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
वहीं, दूसरी पीठ ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए ऐसे दोषियों को खुली जेल के लिए सामान्यतः अपात्र मानने पर जोर दिया था।
जस्टिस अनूप कुमार धांध की एकलपीठ ने इन परस्पर विरोधी निर्णयों पर ध्यान देते हुए मामले को बड़ी पीठ के समक्ष भेजा था।
इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने 26 सितंबर 2026 को पूर्णपीठ का गठन किया, ताकि कानूनी स्थिति पर स्पष्टता लाई जा सके।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘Ordinarily’ का अर्थ ‘कभी नहीं’ नहीं
हाईकोर्ट की इस फुल बेंच ने स्पष्ट किया कि नियम 3 में प्रयुक्त शब्द ‘Ordinarily’ को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
इसका अर्थ है कि सामान्य परिस्थितियों में दुष्कर्म और POCSO के दोषियों को खुली जेल यानी ओपन एयर कैंप में भेजने की पात्रता नहीं होगी, लेकिन इसे हर परिस्थिति में लागू होने वाला पूर्ण प्रतिबंध नहीं माना जा सकता।
फुल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘Ordinarily’ का अर्थ सामान्यतः या अधिकांश मामलों में होता है, न कि अनिवार्य रूप से प्रत्येक मामले में।
कोर्ट ने कहा कि असाधारण परिस्थितियों में सामान्य नियम से अलग निर्णय लेने की गुंजाइश बनी रहती है, लेकिन इसके लिए ठोस कारण आवश्यक हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस शब्द को असीमित विवेकाधिकार के रूप में भी नहीं पढ़ा जा सकता। अपवाद वास्तव में अपवाद ही रहना चाहिए और संबंधित कैदी को अपनी विशेष या असाधारण परिस्थितियों का आधार प्रस्तुत करना होगा।
नियम 3(d) और नियम 4 की क्या है व्यवस्था?
राजस्थान प्रिजनर्स ओपन एयर कैंप रूल्स, 1972 का नियम 3 उन श्रेणियों के कैदियों का उल्लेख करता है, जिन्हें सामान्यतः ओपन एयर कैंप में भेजे जाने के लिए पात्र नहीं माना जाता।
इसके नियम 3(d) में आईपीसी की धारा 376 सहित कई गंभीर अपराधों में दोषसिद्ध कैदियों का जिक्र किया गया है।
वहीं, नियम 4 ओपन एयर कैंप में प्रवेश के लिए पात्रता की शर्तें निर्धारित करता है।
इनमें नियम 3 में अपात्रता वाली श्रेणियों में शामिल नहीं होना, जेल फैक्ट्री या जेल सेवा में निर्धारित कार्य नियमित रूप से करना तथा वास्तविक कारावास की सजा का एक-तिहाई हिस्सा रिमिशन सहित पूरा करना शामिल है।
फुल बेंच ने कहा कि नियम 3 और नियम 4 को एक साथ पढ़ना आवश्यक है। नियम 3(d) सामान्य अपात्रता का प्रावधान करता है, लेकिन उसमें ‘Ordinarily’ शब्द होने के कारण इसे हर मामले में पूर्ण और अपरिवर्तनीय रोक नहीं माना जा सकता।
खुली जेल में भेजना किसी कैदी का अधिकार नहीं
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया कि किसी कैदी को ओपन एयर कैंप में भेजने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं होना और उसे वहां भेजे जाने का अधिकार प्राप्त होना—दो अलग-अलग बातें हैं।
पीठ के अनुसार, धारा 376 या POCSO एक्ट के तहत दोषसिद्ध कैदी केवल इस आधार पर ओपन एयर कैंप में प्रवेश की मांग नहीं कर सकता कि नियमों में पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।
इसके विपरीत, सक्षम प्राधिकारी भी केवल संबंधित अपराध के आधार पर उसके आवेदन पर विचार करने से पूरी तरह इनकार नहीं कर सकता।
ऐसे मामलों में कैदी को विशेष या असाधारण परिस्थितियां प्रस्तुत करनी होंगी।
इसके बाद संबंधित प्राधिकारी को नियमों के तहत सभी जरूरी पहलुओं का मूल्यांकन करते हुए कारणयुक्त फैसला देना होगा।
अपराध की गंभीरता और पीड़ित की आयु भी होगी महत्वपूर्ण
फुल बेंच ने स्पष्ट किया कि ओपन एयर कैंप में ट्रांसफर पर विचार करते समय अपराध की प्रकृति और गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विशेष रूप से POCSO एक्ट के मामलों में पीड़ित की आयु और मामले के तथ्यों को महत्वपूर्ण कारक माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित सलाहकार समिति (Advisory Committee) को प्रत्येक मामले का व्यक्तिगत आकलन करना होगा।
समिति को अपराध की प्रकृति और गंभीरता, पीड़ित की आयु तथा मामले के विशिष्ट तथ्यों, जेल में कैदी के आचरण और अनुशासन, कैदी में सुधार की संभावना, संभावित जोखिम तथा समाज में पुनर्वास के लिए उसकी तैयारी सहित कई कानूनी बिंदुओं पर विचार करना होगा। इसके साथ ही, ओपन एयर कैंप में स्थानांतरण के लिए प्रस्तुत विशेष या असाधारण परिस्थितियों का भी मूल्यांकन करना होगा।
समिति को अपने निर्णय में यह दर्ज करना होगा कि कैदी को स्थानांतरित करने या उसका आवेदन अस्वीकार करने के पीछे क्या कारण हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी लिया आधार
पूर्णपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के Suhas Chakma बनाम Union of India मामले का हवाला देते हुए कहा कि इस फैसले में खुले सुधारात्मक संस्थानों में कैदियों के ट्रांसफर के लिए पात्रता मानदंडों को तर्कसंगत बनाने और कैदियों के सुधार तथा पुनर्वास की संभावनाओं पर ध्यान देने की आवश्यकता बताई गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, कैदियों के मामलों का व्यक्तिगत आकलन पारदर्शी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। अपराधों की प्रकृति और वर्गीकरण, सुधार की संभावना, संस्थागत आचरण तथा समाज में पुनर्वास की तैयारी जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। निर्णय स्वीकार करने या अस्वीकार करने के कारण भी दर्ज किए जाने चाहिए।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को अपने फैसले में शामिल करते हुए कहा कि खुली जेल की व्यवस्था का उद्देश्य केवल कैदियों को जेल से दूसरी जगह भेजना नहीं, बल्कि अच्छे आचरण, आत्म-अनुशासन, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक पुनर्वास को प्रोत्साहित करना भी है।
बच्चों और अन्य कैदियों की सुरक्षा सर्वोपरि
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कैदियों के खुली जेल में ट्रांसफर पर विचार करते समय वहां मौजूद अन्य कैदियों, विशेष रूप से बच्चों, की सुरक्षा को भी ध्यान में रखना होगा।
यदि सलाहकार समिति किसी कैदी को ओपन एयर कैंप के लिए उपयुक्त पाती है, तो वह अन्य कैदियों और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक शर्तें लगा सकती है।
यदि कैदी इन शर्तों का उल्लंघन करता है, तो उसका खुली जेल में ट्रांसफर रद्द किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुधार और पुनर्वास की संभावना को स्वीकार करते हुए सुरक्षा संबंधी चिंताओं को भी महत्वपूर्ण माना है।
कैदियों की गरिमा और सुधारात्मक न्याय व्यवस्था पर जोर
हाईकोर्ट की फुल बेंच ने यह भी कहा कि कारावास में रहने से किसी व्यक्ति की संवैधानिक गरिमा समाप्त नहीं हो जाती।
सुप्रीम कोर्ट के Sunil Batra बनाम Delhi Administration फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कैदी भी संवैधानिक अधिकारों के हकदार रहते हैं, हालांकि वैध कारावास के कारण उन पर कुछ प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।
जब कानून स्वयं सुधार और पुनर्वास की व्यवस्था प्रदान करता है, तो उसका संचालन गरिमा, निष्पक्षता और सुधारात्मक न्याय के उद्देश्यों के अनुरूप होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत गैर-मनमाने निर्णय की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह है कि संबंधित प्राधिकारी को प्रासंगिक तथ्यों पर विचार करना होगा और अप्रासंगिक आधारों से बचना होगा। हालांकि, अनुच्छेद 14 भी किसी कैदी को खुली जेल में प्रवेश का मौलिक अधिकार प्रदान नहीं करता।
तीन पूर्व फैसलों को सही कानून नहीं माना
फुल बेंच ने अपने फैसले के निष्कर्ष में कहा कि Rajendra @ Goru, Bhag Singh @ Bhagirath और Vipin @ Vinkesh @ Vika मामलों में दिए गए वे फैसले, जिनमें संबंधित दोषियों को अपराध की श्रेणी के आधार पर खुली जेल के लिए अपात्र मानने का दृष्टिकोण अपनाया गया था, सही कानून निर्धारित नहीं करते। इसलिए इन निर्णयों को निरस्त कर दिया गया।
पीठ ने संबंधित मामलों को उचित खंडपीठ के समक्ष भेजने का आदेश दिया, ताकि उन आवेदनों पर फुल बेंच के फैसले के कानूनी सिद्धांतों के अनुसार विचार किया जा सके।
फुल बेंच का अंतिम निष्कर्ष
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि धारा 376 आईपीसी या POCSO एक्ट के तहत दोषसिद्ध कैदियों को खुली जेल या ओपन एयर कैंप में भेजने पर न तो पूर्ण प्रतिबंध है और न ही उन्हें वहां ट्रांसफर का स्वतः अधिकार प्राप्त है।
ऐसे प्रत्येक मामले में संबंधित कैदी की परिस्थितियों, अपराध की गंभीरता, पीड़ित की आयु, जेल में आचरण, सुधार की संभावना और पुनर्वास की तैयारी का व्यक्तिगत मूल्यांकन करना होगा।
सलाहकार समिति को अपने फैसले के कारण दर्ज करने होंगे और आवश्यक होने पर अन्य कैदियों, विशेषकर बच्चों, की सुरक्षा के लिए शर्तें भी लगानी होंगी।
