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अवैध खनन पकड़ा तो लीज कैसे दी? जोजरी-लूणी-बांडी नदी तंत्र में अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, राजस्थान सरकार को CBI जांच की चेतावनी; नदी की सीमा सीमित दिखाने पर भी जवाब तलब

Supreme Court Questions Rajasthan's Mining Leases, Warns of CBI Probe into Illegal Mining

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में जोजरी-लूणी-बांडी नदी तंत्र में अवैध खनन और खनन पट्टों को नियमित करने के मामले में राज्य सरकार को CBI जांच की सख्त चेतावनी दी है।

मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि जिन इलाकों में अवैध खनन पकड़ा गया, वहां बाद में खनन की लीज कैसे आवंटित कर दी गई?

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि अगर राज्य सरकार ने गड़बड़ियों को सुधारने के लिए जल्द ठोस कदम नहीं उठाए, तो मामले की जांच CBI को सौंपी जा सकती है।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। बेंच ने कहा कि अवैध खनन के मामले दर्ज करना ही काफी नहीं है। नदी के लगातार जुड़े हुए हिस्सों में खनन पट्टे देने से उसके प्राकृतिक प्रवाह पर असर पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से प्रदूषण रोकने और नदी तंत्र को बहाल करने के लिए कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) और जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) तकनीक की व्यवस्था के लिए ठोस वित्तीय प्रस्ताव भी मांगा है।

मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सक्सेना सहित अन्य अधिवक्ताओं ने पैरवी की.

सुप्रीम कोर्ट- अवैध खनन पकड़ा, फिर उन्हीं इलाकों में लीज क्यों दी?

सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने बताया कि अवैध खनन के मामलों में FIR दर्ज की गई हैं और सरकार जरूरी कदम उठा रही है। हालांकि, कोर्ट इस जवाब से संतुष्ट नहीं दिखा।

सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि जब अधिकारियों को अवैध खनन की जानकारी मिल गई थी, तो उन्हीं इलाकों में खनन पट्टों को नियमित करने या लीज देने की जरूरत क्यों पड़ी? बेंच ने स्पष्ट किया कि अवैध खनन की शिकायतों के बीच उन्हीं क्षेत्रों में खनन की अनुमति देने पर राज्य सरकार को जवाब देना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि:

“आपने खनन के लिए इलाके आवंटित किए और उनके पट्टे दे दिए। यह कैसी कार्रवाई है? आप कहते हैं कि FIR दर्ज की हैं। नदी के किनारे एक के बाद एक सटे हुए इलाकों में खनन पट्टे दिए जा रहे हैं। ऐसे में लगातार सटे हुए इलाकों में लीज देकर नदी का प्राकृतिक प्रवाह कैसे बनाए रखेंगे?”

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि राज्य सरकार अवैध खनन से जुड़े सवालों पर संतोषजनक जवाब नहीं देती और गड़बड़ियों को ठीक करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाती, तो मामले की जांच CBI को सौंपी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी। हालांकि, कोर्ट ने अभी CBI जांच का आदेश नहीं दिया है।

नदी की सीमा तय करने में भी गड़बड़ी पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने लूणी नदी की बाढ़ सीमा यानी हाई फ्लड लाइन तय करने के मामले में जल संसाधन विभाग के एक अधिकारी की ओर से जारी संचार पर भी नाराजगी जताई।

यह संचार सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश का हवाला देकर लूनी नदी की हाई फ्लड लाइन तय करने के लिए सूखे मौसम में नदी के बहाव को आधार बनाने से जुड़ा था।

जस्टिस मेहता ने सवाल किया कि जिस नदी में समय-समय पर बाढ़ आती है, उसकी सीमा केवल सामान्य या कम पानी वाले दिनों के बहाव के आधार पर कैसे तय की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने बालोतरा में लूनी नदी पर बने पुल की करीब 1,782 मीटर चौड़ाई और सरकारी रिकॉर्ड में नदी के बहाव की करीब आठ मीटर चौड़ाई दर्ज होने के अंतर का भी जिक्र किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई फ्लड लाइन तय करते समय नदी में बाढ़ की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। केवल सूखे मौसम के बहाव को आधार बनाकर नदी के वास्तविक फैलाव को सीमित नहीं किया जा सकता।

अधिकारियों की भूमिका पर सवाल, राज्य सरकार से जवाब तलब

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जल संसाधन विभाग के एक अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब नदी के प्रवाह क्षेत्र को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए थे, तो उसकी सीमा सीमित दिखाने वाला संचार सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश का हवाला देकर किस आधार पर जारी किया गया।

जस्टिस मेहता ने संबंधित अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई को लेकर राज्य सरकार से जवाब मांगा। वहीं, जस्टिस विक्रम नाथ ने अधिकारियों के रवैये पर नाराजगी जताते हुए टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि कोर्ट के निर्देशों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।

राज्य सरकार ने कहा कि संबंधित संचार में गलती हुई थी या नहीं, इसकी जांच की जाएगी। साथ ही, यह भी पता लगाया जाएगा कि गलती जानबूझकर की गई थी या नहीं।

नदी के दोनों विभागों के रिकॉर्ड में जो सीमा ज्यादा, वही होगी मान्य

सुप्रीम कोर्ट ने उच्चस्तरीय पर्यावरण निगरानी समिति की सिफारिश स्वीकार करते हुए नदी के पूरे दर्ज कॉरिडोर को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्व विभाग और जल संसाधन विभाग के रिकॉर्ड में नदी की जो सीमा ज्यादा चौड़ी दर्ज है, उसे आधार बनाया जाए।

इसका मकसद नदी के प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र को सुरक्षित रखना और उसकी सीमा को संकुचित कर अतिक्रमण या निर्माण की गुंजाइश रोकना है।

इससे पहले कोर्ट नदी के किनारे से 100 मीटर के दायरे में निर्माण और विकास गतिविधियों पर अंतरिम रोक लगा चुका है। यह रोक नदी की हाई फ्लड लाइन और जरूरी पर्यावरणीय बफर क्षेत्र का वैज्ञानिक निर्धारण होने तक लागू रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा फ्लड लाइनों के दोनों ओर 500 मीटर के दायरे में प्रदूषण फैलाने वाली और खतरनाक औद्योगिक गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगाया था।

प्रदूषण रोकने के लिए राज्य को भी देना होगा पैसा

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार से कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (CETP) स्थापित करने और उनमें जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD) तकनीक लागू करने के लिए ठोस वित्तीय प्रस्ताव पेश करने को कहा। इस व्यवस्था का मकसद औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार करना और पानी को दोबारा इस्तेमाल के योग्य बनाना है।

सु्प्रीम कोर्ट ने कहा कि नदी को प्रदूषण से मुक्त करने की पूरी जिम्मेदारी उद्योगों या स्थानीय निकायों पर नहीं डाली जा सकती। जब सरकारी अधिकारियों की ओर से नियामकीय जिम्मेदारियां निभाने में चूक हुई है, तो राज्य सरकार को भी समाधान के लिए आर्थिक योगदान देना होगा। उद्योगों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

प्रस्तावित व्यवस्था में ट्रीट किए गए पानी को दोबारा उद्योगों तक पहुंचाने के लिए पाइपलाइन तैयार करने की जरूरत भी शामिल है। कोर्ट ने राज्य सरकार से ऐसा व्यावहारिक प्रस्ताव मांगा है, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण के इंतजामों और उनके वित्तपोषण की स्पष्ट जानकारी हो।

’20 लाख लोगों की परेशानी से बड़ा नहीं उद्योगों का आर्थिक हित’

सुप्रीम कोर्ट ने जोजरी-लूणी-बांडी नदी तंत्र में प्रदूषण से प्रभावित करीब 20 लाख लोगों की स्थिति पर चिंता जताई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उद्योगों की आर्थिक व्यवहार्यता को लाखों लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले गंभीर असर से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:

“20 लाख लोगों को नर्क जैसी स्थिति में रहने के लिए मजबूर करना, कुछ हजार लोगों की आर्थिक व्यवहार्यता और आजीविका से तुलना नहीं की जा सकती।”

सुप्रीम ने स्पष्ट किया कि उद्योगों की आर्थिक जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी हो सकता है, लेकिन इसके लिए लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार को प्रदूषण रोकने और प्रभावित नदी तंत्र को बहाल करने के लिए प्रभावी कदम उठाने होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि राज्य सरकार प्रदूषण नियंत्रण और ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के लिए ठोस प्रस्ताव लेकर नहीं आती, तो सागानेर औद्योगिक क्षेत्र के मामले पर भी ध्यान दिया जाएगा।

राज्य के अपने हलफनामे के अनुसार, वहां करीब 80 प्रतिशत उद्योगों के पास अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) नहीं होने की बात सामने आई है।

27 नवंबर को फिर होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार को अगली सुनवाई तक नदी तंत्र को बहाल करने और प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था के लिए वित्तीय प्रस्ताव पेश करने को कहा है।

राज्य सरकार को अवैध खनन से जुड़े सवालों का जवाब देने और नदी के पूरे दर्ज कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों का ब्योरा भी देना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों के तहत नदी के किनारे से 100 मीटर के दायरे में निर्माण और विकास गतिविधियों पर रोक जारी है। इसके अलावा, मौजूदा फ्लड लाइनों के दोनों ओर 500 मीटर के दायरे में प्रदूषण फैलाने वाली और खतरनाक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया गया है।

मामले में अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 को होगी। उस दिन राज्य सरकार के प्रस्ताव और अब तक उठाए गए कदमों पर विचार किया जाएगा।

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