डॉक्टरों, मेडिकल स्टोर संचालक और 8 लाभार्थियों सहित 12 आरोपियों को माना मामले में आरोपी, पुलिस जांच अधिकारी की भूमिका पर भी उठे सवाल, डीजीपी को कार्रवाई के निर्देश
जयपुर/चूरू। राजस्थान सरकार की आम जनता से जुड़ी चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की महत्वाकांक्षी राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (RGHS) में कथित करोड़ों रुपये के घोटाले के मामले में चूरू के 2 डॉक्टर सहित 12 लोगों के खिलाफ आरोप तय किए गए हैं।
चूरू के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हरीश कुमार ने मंगलवार को दिए एक विस्तृत आदेश में इस बहुचर्चित प्रकरण में 12 आरोपियों के विरुद्ध संज्ञान लेते हुए न केवल मेडिकल स्टोर संचालक, आयुर्वेद चिकित्सकों और कंप्यूटर ऑपरेटर को अभियुक्त माना, बल्कि लाभार्थी कार्डधारकों की भूमिका को भी आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा बताया है।
सीजेएम कोर्ट ने मामले की जांच में पुलिस की भूमिका को बेहद संदिग्ध मानते हुए जांच अधिकारी के खिलाफ भी राज्य के डीजीपी को आदेश की प्रति भेजकर कार्रवाई के लिए लिखा है
2 डॉक्टर सहित 12 के खिलाफ आरोप
सीजेएम कोर्ट ने मेडिकल स्टोर संचालक, आयुर्वेद चिकित्सकों, कंप्यूटर ऑपरेटर और योजना के लाभार्थियों सहित कुल 12 अभियुक्तों के विरुद्ध प्रसंज्ञान लिया है।
कोर्ट के अनुसार आरोपियों के खिलाफ बीएनएस 2023 की धारा 318(4), 338, 336(3), 340(2), 339, 316(5) तथा धारा 61(2) के अंतर्गत अपराध बनता है और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य इस स्तर पर आरोप तय करने के लिए पर्याप्त हैं।
अदालत ने जिन आरोपियों के विरुद्ध संज्ञान लिया है, उनमें आयुर्वेद चिकित्सक डॉ. पवन कुमार जांगिड़ और डॉ. कविता धनकड़, आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी, राजकीय आयुर्वेद औषधालय, डी.बी. अस्पताल, चूरू, सुशीला शर्मा, लाइसेंस धारक, शिवम ड्रग्स मेडिकल स्टोर, नवीन कुमार शर्मा, संचालक, शिवम ड्रग्स मेडिकल स्टोर, जितेन्द्र कुमार (कंप्यूटर ऑपरेटर) के साथ ही 8 आरजीएचएस लाभार्थी भी अभियुक्त बनाए गए हैं, जिन पर फर्जी पर्चियों और ओटीपी साझा कर सरकारी राशि का लाभ उठाने का आरोप है।
सीजेएम कोर्ट ने इस घोटाले में मुख्य आरोपी सुशीला शर्मा को माना है।
जांच अधिकारी के खिलाफ आदेश
कोर्ट ने पुलिस जांच अधिकारी की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि—
“सिर्फ एक कंप्यूटर ऑपरेटर, जिसे मात्र 8,000 रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था, को आरोपी बनाकर बाकी मुख्य लाभार्थियों को बचाने का प्रयास किया गया है।”
कोर्ट के अनुसार, लाइसेंस धारक सुशीला शर्मा, संचालक नवीन शर्मा और नामजद आयुर्वेद चिकित्सकों को आरोपी न बनाना दूषित अनुसंधान की ओर संकेत करता है।
अदालत ने अपने आदेश में अनुसंधान अधिकारी एएसआई वीरेंद्र सिंह की भूमिका को “संदिग्ध” बताते हुए कहा कि—
बैंक स्टेटमेंट विधिवत प्रमाणित नहीं कराने, एफएसएल जांच नहीं करवाने और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जानबूझकर पत्रावली में शामिल नहीं करने से जांच अधिकारी की भूमिका पुरी तरह संदिग्ध हैं.
इसी कारण कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक, राजस्थान को आदेश की प्रति भेजकर अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए हैं
ये है पूरा मामला
मामले की शुरुआत 13 अगस्त 2025 को हुई, जब मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), रतनगढ़, चूरू द्वारा एक टाइपशुदा रिपोर्ट पुलिस को सौंपी गई।
यह रिपोर्ट शासन सचिव (वित्त–व्यय) विभाग और महानिदेशक RSPAA के निर्देशों के अनुपालन में गठित जांच दल द्वारा की गई भौतिक जांच और सत्यापन पर आधारित थी।
इस रिपोर्ट के आधार पर FIR संख्या 181/2025, पुलिस थाना कोतवाली, चूरू में दर्ज की गई थी।
चूरू स्थित शिवम ड्रग्स मेडिकल स्टोर के माध्यम से आरजीएचएस योजना के तहत कथित रूप से फर्जी परामर्श पर्चियां, कूटरचित बिल और ओटीपी के दुरुपयोग के जरिए लाखों–करोड़ों रुपये का भुगतान सरकारी खजाने से किया गया।
जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में सरकारी अस्पताल में पदस्थ आयुर्वेद चिकित्सकों के नाम से ऐसी पर्चियां तैयार की गईं, जो वास्तविक परामर्श के बिना बनाई गई थीं।
इन पर्चियों के आधार पर दवाइयों की बिक्री दर्शाकर आरजीएचएस पोर्टल पर बिल अपलोड किए गए और भुगतान प्राप्त किया गया।
कमीशन, फर्जी पर्चियां और करोड़ों का भुगतान
जांच में चूरू स्थित “शिवम ड्रग्स” नामक फार्मा स्टोर में आरजीएचएस योजना के अंतर्गत बड़े पैमाने पर अनियमितताएं सामने आईं। निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि मेडिकल स्टोर परिसर में डॉक्टरों के चैंबर संचालित हो रहे थे और राजकीय आयुर्वेद चिकित्सकों के नाम के बोर्ड भी लगे थे।
जांच दल के समक्ष मेडिकल स्टोर संचालक नवीन शर्मा द्वारा यह स्वीकार किया गया कि कुछ आयुर्वेद चिकित्सकों को प्रति रोगी कमीशन दिया जाता था और राजकीय अस्पताल की पर्चियां छपवाकर मेडिकल स्टोर से दवाइयों की आपूर्ति की जाती थी।
वर्ष 2024 में आरजीएचएस योजना के तहत 77.34 लाख रुपये की आयुर्वेदिक दवाइयों की बिक्री दिखाई गई।
इनमें से 47.84 लाख रुपये की बिक्री केवल एक डॉक्टर की परामर्श पर्चियों के आधार पर हुई।
वर्ष 2025 (जनवरी–जून) के बीच पुनः 20.79 लाख रुपये की बिक्री कथित रूप से फर्जी पर्चियों के जरिए की गई।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह सब राजकोष को सदोष हानि और निजी व्यक्तियों को सदोष लाभ पहुंचाने का गंभीर मामला है।
डॉक्टरों की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी
अदालत ने कहा कि सरकारी सेवा में रहते हुए किसी निजी मेडिकल स्टोर के माध्यम से आरजीएचएस योजना का लाभ उठाना विभागीय नहीं बल्कि आपराधिक कृत्य है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि—
“फर्जी रिकॉर्ड बनाना या सार्वजनिक धन का दुरुपयोग करना किसी भी लोक सेवक का आधिकारिक कर्तव्य नहीं हो सकता।”
लाभार्थी भी आरोपी की श्रेणी में
यह आदेश इस मायने में भी अहम है कि कोर्ट ने आरजीएचएस कार्डधारकों की भूमिका को भी संदेह के घेरे में रखा। अदालत के अनुसार, बिना डॉक्टर से परामर्श लिए OTP साझा करना, फर्जी बिल बनवाना और सरकारी राशि प्राप्त करना आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा है।
इसी आधार पर कुल 12 व्यक्तियों—डॉक्टर, मेडिकल स्टोर संचालक, कंप्यूटर ऑपरेटर और 8 लाभार्थियों—के विरुद्ध संज्ञान लिया गया।
गिरफ्तारी वारंट, अगली सुनवाई 30 जनवरी
सीजेएम ने एक आरोपी को छोड़कर शेष सभी अभियुक्तों के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी करने के आदेश दिए हैं। मामले की अगली पेशी 30 जनवरी 2026 को निर्धारित की गई है।
साथ ही, आदेश की प्रतियां मुख्य सचिव, वित्त विभाग, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग और आयुर्वेद निदेशालय को भी आवश्यक कार्रवाई हेतु भेजी गई हैं।