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“अपील का अधिकार पूर्णतः वैधानिक”, अपील का अधिकार स्वाभाविक या मौलिक नहीं : राजस्थान हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Quashes Appellate & Revisional Orders in CRPF Disciplinary Case, Clarifies Appeal Is Purely Statutory Right
हाईकोर्ट ने कहा कानून में प्रावधान नहीं होने पर अपील नहीं कि जा सकती, बिना अधिकार अपील पर जारी CRPF के पारित दंडादेश, अपीलीय आदेश और पुनरीक्षण आदेश सभी को किया रद्द

जोधपुर 10 फरवरी। राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक अनुशासनात्मक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया हैं ​कि अपील का अधिकार स्वाभाविक या मौलिक नहीं होता, बल्कि यह पूर्णतः कानून द्वारा प्रदत्त अधिकार है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी अधिनियम या नियम में अपील का प्रावधान नहीं है, तो संबंधित प्राधिकारी अपील सुनने का अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अपील और उससे संबंधित पुनरीक्षण (रीविजन) की कार्यवाही अधिकार क्षेत्र के अभाव में स्वतः अवैध मानी जाएगी।

जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल फैसला सुनील कुमार बनाम भारत संघ मामले में दिया हैं.

याचिकाकर्ता सुनील कुमार CRPF में कार्यरत थे, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के तहत पारित दंडादेश, अपीलीय आदेश और पुनरीक्षण आदेश को चुनौती देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर कि गयी.

ये हैं मामला

याचिकाकर्ता CRPF कर्मी सुनील कुमार के खिलाफ वर्ष 1998 में अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश की अवहेलना का आरोप लगाते हुए विभागीय चार्जशीट जारी की गई थी।

विभागीय जांच के बाद वर्ष 2000 में उन्हें ‘सेन्सर’ (निंदा) का दंड दिया गया।

इसके बाद उन्होंने अपील दायर की, जिस पर विभागीय प्राधिकारी ने जांच और दंडादेश को निरस्त करते हुए पुनः जांच (de novo inquiry) का आदेश दिया।

आदेश के अनुसार हुई नई जांच के बाद वर्ष 2003 में याचिकाकर्ता के दो वेतनवृद्धि रोकने का दंड दिया गया, जिसे अपील में संशोधित करते हुए एक वेतनवृद्धि रोकने का आदेश कर दिया गया।

इसके पश्चात दायर पुनरीक्षण याचिका भी 2004 में खारिज कर दी गई।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि जिस मूल दंड—‘सेन्सर’—के खिलाफ अपील की गई थी, उस पर कानून के अनुसार अपील का अधिकार ही उपलब्ध नहीं था, इसलिए अपील स्वीकार करना और आगे की पूरी कार्यवाही करना ही अवैध है।

याचिकाकर्ता की दलीलें

राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष दायर कि गयी इस अपील में याचिकाकर्ता सुनीलकुमार की ओर से अधिवक्ता धीरज जांगिड़ और अभिलाषा बोड़ा ने दलील दी कि केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल नियम, 1955 के नियम 27 और नियम 28(ब) के अनुसार ‘सेन्सर’ जैसे दंड के विरुद्ध अपील का कोई प्रावधान ही नहीं है।

चूंकि कानून स्पष्ट रूप से ऐसे मामलों में अपील की अनुमति नहीं देता, इसलिए विभागीय अपीलीय प्राधिकारी द्वारा अपील स्वीकार करना ही अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

अधिवक्ता ने कहा कि अपील स्वीकार करने के बाद की गई समस्त कार्यवाही—पुनः जांच का आदेश, उसके आधार पर दिया गया नया दंडादेश तथा बाद की अपीलीय और पुनरीक्षण कार्यवाही—सभी कानूनन अवैध और शून्य मानी जानी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि अपील का अधिकार कोई स्वाभाविक या अंतर्निहित अधिकार नहीं होता, बल्कि यह केवल विधि द्वारा प्रदत्त अधिकार है। जब संबंधित नियमों में अपील का अधिकार ही उपलब्ध नहीं था, तब अपीलीय प्राधिकारी को उस अपील पर विचार करने या कोई आदेश पारित करने का अधिकार नहीं था। अतः ऐसे अवैध अधिकार-प्रयोग के आधार पर पारित सभी आदेशों को निरस्त किया जाना आवश्यक है।

राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अपील का अधिकार न तो स्वाभाविक है और न ही न्यायसंगत सिद्धांतों से स्वतः उत्पन्न होता है; यह पूरी तरह वैधानिक प्रावधान पर निर्भर करता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब कानून स्पष्ट रूप से अपील पर रोक लगाता है, तब किसी प्राधिकारी द्वारा अपील स्वीकार कर उस पर निर्णय देना अधिकार क्षेत्र से परे माना जाएगा।

अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में सीआरपीएफ द्वारा वर्ष 2003 के दिए गए दंडादेश, वर्ष 2003 के अपीलीय आदेश तथा वर्ष 2004 के पुनरीक्षण आदेशो को निरस्त कर दिया हैं.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल वर्ष 2000 का मूल ‘सेन्सर’ आदेश ही प्रभावी रहेगा, क्योंकि उसी पर आगे की पूरी कार्यवाही आधारित थी और वह कानूनन वैध था।

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