बहुचर्चित भीलवाड़ा के अरुणा हत्याकांड का आरोपी पूरणमल 14 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से बरी, सबूतों की कड़ी टूटी—कोर्ट ने कहा “संदेह का लाभ देना होगा”
नई दिल्ली/जोधपुर। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के बहुचर्चित अरुणा हत्याकांड में एक अहम और मिसाल कायम करने वाला फैसला सुनाते हुए आरोपी पूरणमल को बरी कर दिया है।
करीब 14 साल पुराने इस मामले में निचली अदालत और राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा दोषी ठहराए गए पूरणमल को सुप्रीम कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए निर्दोष घोषित कर दिया।
कोर्ट ने साफ कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ “पूर्ण और मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला” स्थापित करने में असफल रहा।
मामला क्या था?
यह मामला 2-3 मार्च 2010 की रात का है, जब भीलवाड़ा जिले में लाडूलाल की पत्नी अरुणा की उनके घर में हत्या कर दी गई थी।
प्रारंभिक रिपोर्ट में अज्ञात व्यक्तियों द्वारा हत्या और करीब 4 लाख रुपये की चोरी की बात कही गई थी।
जांच के दौरान पुलिस को पति लाडूलाल पर शक हुआ और पूछताछ के बाद पूरणमल को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया।
दोनों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 (हत्या) और 201 (सबूत मिटाना) के तहत आरोप लगाए गए।
ट्रायल कोर्ट ने 2012 में दोनों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसे 2018 में राजस्थान हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
पूरणमल गरीबी और कानूनी सहायता के अभाव में लंबे समय तक अपील नहीं कर पाया था।
बाद में लीगल एड के जरिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2749 दिनों की देरी को भी स्वीकार कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि अभियोजन का पूरा केस केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर आधारित था, लेकिन उन साक्ष्यों की श्रृंखला अधूरी और कमजोर थी।
अभियोजन के मुख्य सबूत क्या थे?
अभियोजन ने तीन प्रमुख आधारों पर पूरणमल को दोषी साबित करने की कोशिश की:
कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR)
आरोप था कि घटना के समय पूरणमल और सह-आरोपी के बीच लगातार बातचीत हुई। लेकिन कोर्ट ने कहा कि CDR के लिए जरूरी धारा 65-B का प्रमाणपत्र पेश नहीं किया गया। बिना इस प्रमाणपत्र के इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अमान्य हो जाता है, इसलिए CDR को कोर्ट ने साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया।
खून से सना शर्ट
पुलिस ने दावा किया कि पूरणमल के पास से बरामद शर्ट पर मृतका के ब्लड ग्रुप जैसा खून मिला। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शर्ट की बरामदगी संदिग्ध थी और “चेन ऑफ कस्टडी” यानी साक्ष्य की सुरक्षित श्रृंखला टूटी हुई थी, जिसके चलते FSL रिपोर्ट भरोसेमंद नहीं रही।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ खून मिलने से अपराध साबित नहीं होता, जब तक मजबूत कड़ी न हो।
₹46,000 की बरामदगी
पुलिस ने दावा किया कि हत्या के बदले पूरणमल को पैसे मिले थे। लेकिन प्राप्त की गई राशि में अंतर पाया गया। ₹46,000 की जगह ₹46,145 मिले, जिससे अपराध के बीच कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ। कोर्ट ने इसे भी अविश्वसनीय माना।
FSL रिपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण FSL रिपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को लेकर दिया गया फैसला है।
अभियोजन पक्ष का मुख्य तर्क था कि आरोपी पूरणमल के पास से एक खून से सनी शर्ट बरामद हुई। दावा किया गया कि FSL जांच में पाया गया कि उस शर्ट पर मौजूद खून का ब्लड ग्रुप (O) मृतका अरुणा के ब्लड ग्रुप से मेल खाता है, इसलिए यह आरोपी को अपराध से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण साक्ष्य है।
कोर्ट ने क्यों खारिज की रिपोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट ने FSL रिपोर्ट को विश्वसनीय साक्ष्य मानने से इनकार कर दिया और इसके पीछे कई ठोस कारण बताए।
कोर्ट ने कहा कि जब कोई वस्तु (जैसे खून से सनी शर्ट) बरामद होती है, तो यह जरूरी है कि उसकी जब्ती से लेकर FSL तक पहुंचने तक की पूरी कड़ी (chain) सुरक्षित और प्रमाणित हो।
लेकिन इस केस में मलकाना रिकॉर्ड (Malkhana Register) में विरोधाभास था।
साक्ष्य पहले भेजे गए, फिर वापस आए — लेकिन कारण स्पष्ट नहीं था। मामले में पुलिस गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
कोर्ट ने कहा, “साक्ष्य की सुरक्षित कड़ी पूरी तरह टूट चुकी है।”
साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ (Tampering) की संभावना
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब chain of custody साबित नहीं होती, तो यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि वही साक्ष्य FSL तक पहुंचे जो मौके से बरामद हुआ था।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में साक्ष्य के साथ छेड़छाड़ (tampering/manipulation) की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने बहुत सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि chain of custody साबित नहीं हो, तो FSL रिपोर्ट “worthless piece of paper” (बेकार कागज) बन जाती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मान भी लें कि शर्ट पर मिला खून मृतका का ही है, तब भी यह अपने आप में अपराध साबित नहीं करता।
जब तक अन्य मजबूत और स्वतंत्र साक्ष्य मौजूद न हों और पूरी परिस्थितिजन्य कड़ी पूरी न हो, तब तक केवल FSL रिपोर्ट के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने FSL मामले में साक्ष्य की कस्टडी साबित नहीं होने, गवाहों के बयान विरोधाभासी होने और छेड़छाड़ की संभावना के चलते FSL रिपोर्ट को पूरी तरह अविश्वसनीय मानकर खारिज कर दिया।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और Section 65-B Certificate
मामले में अभियोजन ने कहा कि आरोपी और सह-आरोपी के बीच घटना के समय लगातार फोन कॉल्स हुईं, जो Call Detail Records (CDR) से साबित होती हैं। इससे दोनों के बीच साजिश का संकेत मिलता है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B के अनुसार कोई भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (जैसे CDR, वीडियो, ईमेल) तभी मान्य होगा जब उसके साथ 65-B Certificate प्रस्तुत किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में CDR तो पेश किए गए, लेकिन Section 65-B Certificate प्रस्तुत नहीं किया गया, जो कि एक अनिवार्य कानूनी आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना 65-B Certificate के इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अमान्य (inadmissible) हो जाता है, उसे कोर्ट में सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में टेलीकॉम कंपनी के अधिकारियों द्वारा दी गई मौखिक गवाही को खारिज करते हुए कहा कि
“मौखिक गवाही, 65-B Certificate की जगह नहीं ले सकती।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत दोहराते हुए कहा कि “सिर्फ शक या आंशिक सबूत के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”
कोर्ट ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के लिए 65-B सर्टिफिकेट अनिवार्य है, बिना इस प्रमाणपत्र के CDR या अन्य डिजिटल साक्ष्य स्वीकार्य नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि FSL रिपोर्ट तभी मान्य है जब साक्ष्य सुरक्षित रहे। यदि साक्ष्य की कस्टडी में गड़बड़ी हो, तो FSL रिपोर्ट भी बेकार हो जाती है।
अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहा और सबूतों की श्रृंखला अधूरी और कमजोर थी, जिससे आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले रद्द करते हुए पूरणमल को सभी आरोपों से बरी करते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया।