नई दिल्ली: न्यायिक अधिकारियों (ज्यूडिशियल ऑफिसर्स) की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों के आर्थिक बोझ वाले तर्क को गलत बताया है।
राज्य सरकारों की दलील पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का विरोध सिर्फ अतिरिक्त आर्थिक बोझ का हवाला देकर नहीं किया जा सकता।
सु्प्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तर्क को गलत मानते हुए सभी राज्यों से इस मुद्दे पर दो सप्ताह के अंदर नए सिरे से स्वतंत्र फैसला लेने को कहा है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि कई राज्य सरकारों ने न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 साल से बढ़ाने का विरोध अतिरिक्त खर्च का हवाला देकर किया था।
इस पर कोर्ट ने कहा कि अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को सेवा में बनाए रखना, उनके रिटायर होने के बाद नए अधिकारियों की भर्ती और प्रशिक्षण कीतुलना में कम खर्चीला हो सकता है।
इसलिए सिर्फ आर्थिक बोझ का तर्क देकर रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने से इनकार करना सही नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें केवल इसलिए सकारात्मक फैसला लेने से न रुकें कि संबंधित हाईकोर्ट ने इस पर कोई अलग राय व्यक्त की है। हर राज्य को सभी पहलुओं पर विचार कर स्वतंत्र निर्णय लेना चाहिए।
रिटायरमेंट उम्र 60 से 62 साल करने की मांग
सुप्रीम कोर्ट देशभर में जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने की मांग से जुड़ी याचिका पर सुनवाई कर रहा है।
याचिका में मांग की गई है कि पूरे देश में जिला न्यायपालिका के जजों और अन्य न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 साल से बढ़ाकर 62 साल की जाए।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट अंतरिम आदेश में राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों से इस मुद्दे पर विचार करने को कह चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर कोई राज्य सहमत होता है, तो वहां न्यायिक अधिकारियों को अंतिम फैसला आने तक 61 वर्ष की उम्र तक सेवा जारी रखने की अनुमति दी जा सकती है।
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राज्यों को क्या निर्देश?
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों से कहा कि वे न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के मुद्दे पर फिर से विचार करें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह फैसला दूसरे सरकारी कर्मचारियों की रिटायरमेंट उम्र से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम ने यह भी कहा कि राज्य सरकारें सभी जरूरी पहलुओं पर विचार करते हुए अपना स्वतंत्र फैसला लें।
यह पूरी प्रक्रिया प्राथमिकता के आधार पर दो सप्ताह के अंदर पूरी करने की कोशिश की जाए।
खर्च बढ़ने की दलील ठुकराई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई राज्य सरकारों ने न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का विरोध अतिरिक्त आर्थिक बोझ का हवाला देकर किया था। लेकिन कोर्ट के मुताबिक यह तर्क सही नहीं है।
सुप्रीम ने कहा कि इस मुद्दे के आर्थिक पहलुओं पर वर्ष 2024 के फैसले में विस्तार से विचार किया जा चुका है।
अगर कोई न्यायिक अधिकारी रिटायर होता है, तो उसकी जगह नए अधिकारी की भर्ती, प्रशिक्षण और अन्य प्रक्रियाओं पर भी खर्च आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे में अनुभवी न्यायिक अधिकारियों को कुछ और समय तक सेवा में बनाए रखना, कई मामलों में राज्यों के लिए नए अधिकारियों की भर्ती करने से कम खर्च वाला हो सकता है।
इसलिए सिर्फ अतिरिक्त आर्थिक बोझ का हवाला देकर रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का विरोध करना उचित नहीं माना जा सकता।
2002 के फैसले से कैसे जुड़ा है मामला?
न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का विवाद नया नहीं है।
वर्ष 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस के. जगन्नाथ शेट्टी आयोग की उस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया था, जिसमें जिला न्यायपालिका के न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 62 वर्ष करने का सुझाव दिया गया था।
हालांकि इसके बाद कुछ राज्यों ने इस दिशा में अलग-अलग कदम उठाए।
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश में मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र 60 से बढ़ाकर 61 वर्ष करने की अनुमति दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा आदेश में यह भी कहा कि तेलंगाना में भी न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का फैसला लिया जा चुका है।
इन्हीं घटनाक्रमों के बीच अब सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों से कहा है कि वे न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के मुद्दे पर नए सिरे से विचार करें।
हाईकोर्ट को भी दी अहम जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने केवल राज्य सरकारों को ही निर्देश नहीं दिए, बल्कि सभी हाईकोर्ट से भी इस मुद्दे पर विचार करने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि हाईकोर्ट अपनी फुल कोर्ट बैठक में इस विषय पर चर्चा करें और अपनी राय संबंधित राज्य सरकार को भेजें।
इससे राज्य सरकारों को अंतिम फैसला लेने में मदद मिलेगी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि राज्य सरकारें अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से लेंगी। अगर किसी हाईकोर्ट ने पहले कोई अलग राय दी है, तो भी राज्य सरकार उस कारण से सकारात्मक फैसला लेने से नहीं रुके।
बीच में रिटायर होने वालों को भी मिलेगा लाभ
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई राज्य न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का फैसला करता है, तो उसका लाभ उन अधिकारियों को भी दिया जाए, जो इस बीच रिटायर हो चुके हैं या फैसला लागू होने से पहले रिटायर होने वाले हैं।
सुप्री कोर्ट ने कहा कि ऐसा इसलिए जरूरी है, ताकि रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने का फैसला लागू होने के दौरान किसी अधिकारी के साथ अलग या असमान व्यवहार न हो।
राज्यों को 2 हफ्ते का समय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे का समाधान आपसी सहमति से होना बेहतर होगा। इसलिए सभी राज्य सरकारों से न्यायिक अधिकारियों की रिटायरमेंट उम्र बढ़ाने के मुद्दे पर फिर से विचार करने को कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकारें इस मुद्दे पर अपना स्वतंत्र फैसला लें। साथ ही सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वे फुल कोर्ट बैठक में इस पर चर्चा कर अपनी राय संबंधित राज्य सरकार को भेजें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया प्राथमिकता के आधार पर पूरी की जाए और कोशिश हो कि राज्य सरकारें दो सप्ताह के अंदर इस पर फैसला लें।