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NEET-BDS प्रवेश विवाद पर Supreme Court का ऐतिहासिक फैसला, NEET की न्यूनतम पात्रता प्रतिशत घटाने का राजस्थान सरकार का फैसला अवैध

Supreme Court Declares Rajasthan’s NEET-BDS Relaxation Illegal | NEET Admission Case 2016-17

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों या निजी संस्थानों को मनमाने ढंग से छूट देने की अनुमति दी जाए, तो इससे शिक्षा प्रणाली में अराजकता फैल जाएगी।

नई दिल्ली/जोधपुर। Supreme Court ने NEET प्रवेश परीक्षा के माध्यम से बीडीएस (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी) पाठ्यक्रम में दाखिले को लेकर वर्ष 2016-17 में राजस्थान सरकार द्वारा दी गई छूट को अवैध बताया है।

जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने गुरुवार को इस मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि NEET में न्यूनतम पात्रता प्रतिशत कम करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है, न कि राज्य सरकार को।

राजस्थान सरकार द्वारा वर्ष 2016-17 में 10 प्रतिशत और फिर अतिरिक्त 5 प्रतिशत तक दी गई छूट को सुप्रीम कोर्ट ने कानून के विपरीत करार दिया है।

Supreme Court में राजस्थान हाईकोर्ट के 4 मई 2023 के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें बीडीएस प्रवेशों को लेकर आंशिक नियमितीकरण और आंशिक निरस्तीकरण किया गया था।

सिद्धांत महाजन सहित सैकड़ों छात्रों के साथ ही निजी डेंटल कॉलेजों, डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया (DCI), राजस्थान सरकार और राजस्थान यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज (RUHS) ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग अपीलें दायर की थीं।

गुरुवार को जस्टिस विजय बिश्नोई ने Supreme Court में इन सभी अपीलों पर पीठ का फैसला सुनाया है।

सरकार का फैसला अवैध

Supreme Court ने इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि राजस्थान सरकार द्वारा NEET की न्यूनतम पात्रता प्रतिशत घटाना “स्पष्ट रूप से अवैध” था।

Supreme Court ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पत्र में प्रयुक्त “आवश्यक कार्रवाई करें” जैसे शब्दों को अधिकारों के प्रत्यायोजन (delegation of power) के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।

Supreme Court ने कहा कि मेडिकल और डेंटल शिक्षा में NEET केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि गुणवत्ता और मेरिट बनाए रखने का संवैधानिक औजार है।

नियमों से हटकर दी गई छूट से शिक्षा के मानकों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और यह जनहित के खिलाफ है।

छात्रों से सहानुभूति, लेकिन नियम सर्वोपरि

छात्रों की ओर से यह दलील दी गई कि उन्होंने कोई धोखाधड़ी नहीं की, वर्षों तक पढ़ाई की, डिग्री पूरी की और अब उनका करियर खतरे में है।

इस पर Supreme Court ने माना कि छात्रों की स्थिति कठिन है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि “गलत तरीके से हुए प्रवेशों को केवल सहानुभूति के आधार पर वैध नहीं ठहराया जा सकता।”

Supreme Court ने कहा कि नियमों की अनदेखी कर दी गई डिग्रियां भविष्य में पूरे स्वास्थ्य तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं, क्योंकि डेंटल शिक्षा सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी है।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

Supreme Court ने हाईकोर्ट के फैसले की समीक्षा करते हुए कहा कि राजस्थान सरकार को कभी भी यह अधिकार प्राप्त नहीं था कि वह NEET की न्यूनतम पात्रता प्रतिशत घटा सके।

Supreme Court ने कहा कि केंद्र सरकार के पत्र में प्रयुक्त “आवश्यक कार्रवाई करें” जैसे शब्दों को अधिकारों का प्रत्यायोजन (delegation of power) नहीं माना जा सकता।

Supreme Court ने कहा—

“राज्य सरकार द्वारा पात्रता प्रतिशत में की गई कटौती स्पष्ट रूप से अवैध थी और इसके आधार पर दिए गए प्रवेश वैध नहीं माने जा सकते।”

अराजकता फैल जाएगी

फैसले में Supreme Court ने दोहराया कि NEET केवल एक प्रवेश परीक्षा नहीं है, बल्कि देश में चिकित्सा और डेंटल शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने का संवैधानिक माध्यम है।

कोर्ट ने कहा कि NEET का उद्देश्य मेरिट आधारित चयन, पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करना है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि

यदि राज्यों या निजी संस्थानों को मनमाने ढंग से छूट देने की अनुमति दी जाए, तो इससे शिक्षा प्रणाली में अराजकता फैल जाएगी और जनस्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

सहानुभूति कानून का विकल्प नहीं

छात्रों की ओर से यह तर्क दिया गया कि उन्होंने किसी प्रकार की धोखाधड़ी नहीं की, वर्षों तक पढ़ाई की, कई ने डिग्री पूरी कर ली और अब उनका भविष्य अधर में है। छात्रों ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत राहत की मांग भी की।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सहानुभूति जताते हुए कहा कि छात्रों की स्थिति निस्संदेह कठिन है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि—

“सहानुभूति कानून का विकल्प नहीं हो सकती।”

अदालत ने कहा कि यदि अवैध प्रवेशों को वैध ठहराया गया, तो इससे भविष्य में नियमों के उल्लंघन को बढ़ावा मिलेगा।

निजी कॉलेजों पर सख्त रुख

Supreme Court ने निजी डेंटल कॉलेजों की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा किया।

कोर्ट ने कहा कि

कई कॉलेजों ने केवल सीटें भरने और आर्थिक लाभ के लिए नियमों की अनदेखी की। ऐसे कृत्य को शिक्षा के व्यवसायीकरण का सबसे खतरनाक रूप बताया गया।

अदालत ने माना कि कॉलेजों को यह जानकारी थी कि वे नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं, फिर भी उन्होंने प्रवेश दिए।

ये है मामला

वर्ष 2016-17 में NEET पहली बार पूरे देश में एक समान प्रवेश परीक्षा के रूप में लागू हुई। राजस्थान में बीडीएस की बड़ी संख्या में सीटें खाली रह गईं।

इस स्थिति में राज्य सरकार ने 30 सितंबर 2016 को NEET की न्यूनतम पात्रता में 10 प्रतिशत की छूट दी और 4 अक्टूबर 2016 को इसे बढ़ाकर कुल 15 प्रतिशत कर दिया।

सरकार द्वारा दी गई इसी छूट के आधार पर निजी डेंटल कॉलेजों ने अपनी प्रवेश प्रक्रिया पूरी की।

हालांकि, डेंटल काउंसिल ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया कि ऐसी छूट देने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है, राज्य सरकार को नहीं।

बाद में केंद्र सरकार ने भी राजस्थान सरकार के आदेशों को वापस लेने के निर्देश दिए।

इसके बावजूद कई कॉलेजों ने न केवल 15 प्रतिशत तक, बल्कि उससे भी अधिक छूट देकर छात्रों को प्रवेश दे दिया।

यहां तक कि शून्य या नकारात्मक प्रतिशत अंक लाने वाले छात्रों को भी बीडीएस में दाखिला दिया गया।

हाईकोर्ट का रुख

मामले में कई छात्रों के साथ ही सरकार और कॉलेजों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं।

राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने 20 अप्रैल 2018 को फैसला देते हुए 10+5 प्रतिशत तक दी गई छूट के तहत हुए प्रवेशों को नियमित कर दिया, लेकिन उससे आगे के सभी प्रवेशों को रद्द करने का आदेश दिया।

बाद में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी इस फैसले को बरकरार रखते हुए कॉलेजों पर 50-50 लाख रुपये का जुर्माना और प्रभावित छात्रों को 25-25 लाख रुपये मुआवजा देने के निर्देश भी दिए।

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