नई दिल्ली: सूचना के अधिकार कानून के दायरे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि हर जांच एजेंसी को आरटीआई से छूट नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई कानून से छूट को लेकर सीमा तय करते हुए कहा है कि केवल जांच एजेंसी होने भर से किसी संस्था को सूचना के अधिकार कानून से बाहर नहीं रखा जा सकता। यह छूट केवल खुफिया और सुरक्षा से जुड़ी संस्थाओं के लिए है।
इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसके जरिए मध्य प्रदेश स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट (एसपीई) को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मध्य प्रदेश स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट (एसपीई) को सिर्फ इसलिए आरटीआई कानून से बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि राज्य सरकार ने उसे “इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी ऑर्गेनाइजेशन” घोषित कर दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह एजेंसी मुख्य रूप से भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करती है और इसका काम खुफिया जानकारी जुटाने या सुरक्षा से जुड़े मामलों को संभालना नहीं है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने मध्य प्रदेश सरकार की वर्ष 2011 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसके जरिए स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट को सूचना के अधिकार कानून के दायरे से बाहर कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को भी बरकरार रखा, जिसमें एक सरकारी कर्मचारी द्वारा मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
एक RTI आवेदन से शुरू हुआ विवाद
मामले की शुरुआत कटनी जिले में तैनात एक टाउन इंस्पेक्टर से हुई थी। उनके खिलाफ स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट ने भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत ट्रैप कार्रवाई की थी।
जांच पूरी होने के बाद राज्य सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी।
इसके बाद संबंधित अधिकारी ने आरटीआई के तहत यह जानने की कोशिश की कि उसके खिलाफ अभियोजन की मंजूरी कैसे और किन आधारों पर दी गई। लेकिन उसकी इस मांग को खारिज कर दिया गया।
बाद में मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंचा, राज्य सूचना आयोग ने भी इस फैसले को सही ठहराया और कहा कि मामला जांच से जुड़ा है, इसलिए जानकारी नहीं दी जा सकती।
इसके बाद संबंधित अधिकारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
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हाईकोर्ट ने दिया था सूचना देने का आदेश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि जिस जांच का हवाला देकर सूचना रोकी जा रही है, वह पहले ही पूरी हो चुकी है।
कोर्ट ने कहा कि जब जांच खत्म हो चुकी है तो सूचना देने से इनकार करने का कोई आधार नहीं बनता। इसी के तहत हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट इस फैसले से सहमत नहीं था और उसने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी।
एसपीई को RTI से बाहर रखने का दावा
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट ने वर्ष 2011 की एक अधिसूचना का सहारा लिया।
इस अधिसूचना में मध्य प्रदेश सरकार ने लोकायुक्त संगठन के तहत काम करने वाली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट को सूचना के अधिकार कानून से छूट देने की घोषणा की थी।
इसलिए एजेंसी का तर्क था कि उससे आरटीआई के तहत कोई जानकारी नहीं मांगी जा सकती।
यहीं से विवाद का सबसे अहम सवाल सामने आया कि क्या एसपीई वास्तव में ऐसी एजेंसी है जिसे आरटीआई कानून से बाहर रखा जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने जांचा कानून का दायरा
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई कानून की धारा 24 का अध्ययन किया, जिसमें कुछ विशेष संस्थाओं को सूचना देने से छूट देने का प्रावधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस धारा के तहत केवल उन संस्थाओं को आरटीआई कानून से छूट दी जा सकती है, जो वास्तव में खुफिया या सुरक्षा से जुड़ा काम करती हैं।
कोर्ट ने बताया कि कानून में जिन संस्थाओं को छूट मिली हुई है, उनमें सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, प्रवर्तन निदेशालय और राष्ट्रीय जांच एजेंसी जैसी संस्थाएं शामिल हैं। इनका मुख्य काम देश की सुरक्षा, आंतरिक सुरक्षा या खुफिया गतिविधियों से जुड़ा होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर जांच एजेंसी को खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं माना जा सकता।
‘लोकायुक्त की मदद करने वाली एजेंसी है एसपीई‘
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त और उप-लोकायुक्त कानून की भी समीक्षा की। कोर्ट ने कहा कि यह कानून सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और अन्य शिकायतों की जांच के लिए बनाया गया है।
स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट लोकायुक्त संगठन की जांच एजेंसी के रूप में काम करती है और उसका मुख्य काम भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में लोकायुक्त की मदद करना है।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि एसपीई को केवल भ्रष्टाचार निवारण कानून, भारतीय दंड संहिता की कुछ विशेष धाराओं और उनसे जुड़े मामलों की जांच का अधिकार दिया गया है।
उसके पास न तो खुफिया जानकारी जुटाने का अधिकार है और न ही राष्ट्रीय या आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मामलों की जांच का दायरा। इसी वजह से उसे “इंटेलिजेंस और सिक्योरिटी ऑर्गेनाइजेशन” नहीं माना जा सकता।
‘सरकार अपने दायरे से बाहर जाकर छूट नहीं दे सकती‘
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी अधिसूचना के जरिए वही किया जा सकता है, जिसकी अनुमति मूल कानून देता हो।
यदि कानून केवल खुफिया और सुरक्षा संगठनों को छूट देने की अनुमति देता है, तो सरकार किसी दूसरी संस्था को उसी श्रेणी में रखकर छूट नहीं दे सकती।
कोर्ट ने कहा कि स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट को आरटीआई कानून से बाहर रखने वाली अधिसूचना कानून द्वारा दी गई सीमा से बाहर चली गई थी। इसी कारण यह अधिसूचना कानूनी रूप से टिक नहीं सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार कोई ऐसा नियम या आदेश जारी नहीं कर सकती, जो मूल कानून में दी गई सीमाओं से बाहर हो। यदि कोई सरकारी आदेश कानून के दायरे से बाहर जाकर बनाया गया है, तो उसे रद्द किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला, नोटिफिकेशन रद्द
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार की 25 अगस्त 2011 की अधिसूचना को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट को आरटीआई कानून से बाहर रखने का फैसला कानून के अनुरूप नहीं था।
इसके साथ ही हाईकोर्ट का वह आदेश भी बरकरार रखा गया, जिसमें संबंधित अधिकारी को मांगी गई जानकारी देने का निर्देश दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि केवल भ्रष्टाचार मामलों की जांच करने वाली एजेंसी को खुफिया या सुरक्षा संगठन नहीं कहा जा सकता। इसलिए उसे सूचना के अधिकार कानून से छूट नहीं मिल सकती।
आम लोगों पर असर: पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम
यह फैसला पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े मामलों में अहम माना जा रहा है।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर आम नागरिकों पर पड़ेगा। अब ऐसी एजेंसियां, जो पहले खुद को आरटीआई से बाहर बताकर जानकारी देने से मना कर देती थीं, उन्हें जवाब देना होगा। इससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय करना आसान होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि आरटीआई कानून से छूट केवल उन्हीं संस्थाओं को मिल सकती है, जो वास्तव में कानून में तय की गई श्रेणी में आती हों।
साथ ही, यह फैसला यह भी स्पष्ट करता है कि सरकारें मनमाने तरीके से किसी भी संस्था को आरटीआई से बाहर नहीं कर सकतीं।