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‘पति के जिंदा रहते फैमिली पेंशन पर दावा नहीं कर सकती पत्नी’: राजस्थान हाईकोर्ट ने PPO में नाम जोड़ने की मांग खारिज की

Rajasthan High Court Rules Wife Cannot Seek Inclusion In PPO For Family Pension While Husband Is Alive

जयपुर: फैमिली पेंशन को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि पति के जिंदा रहते पत्नी फैमिली पेंशन के नाम पर पेंशन पेमेंट ऑर्डर (पीपीओ) में अपना नाम जोड़ने की मांग नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक रिटायर्ड कर्मचारी जिंदा है और खुद पेंशन प्राप्त कर रहा है, तब तक फैमिली पेंशन का कोई अधिकार नहीं बनता। ऐसे में पत्नी पीपीओ में अपना नाम दर्ज कराने के लिए कोर्ट से आदेश नहीं मांग सकती।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली पेंशन का सवाल तभी उठेगा, जब पेंशन पाने वाले कर्मचारी का निधन होगा।

यदि उस समय कोई विवाद शुरू होता है, तो संबंधित व्यक्ति कानून के अनुसार अपना दावा पेश कर सकता है। लेकिन भविष्य में मिलने वाली फैमिली पेंशन के आधार पर अभी से कोई दावा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस अशोक कुमार जैन की बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए एक महिला की याचिका खारिज कर दी, जिसमें उसने अपने रिटायर्ड पति के पीपीओ में अपना नाम जोड़ने और खुद को फैमिली पेंशन की हकदार के रूप में दर्ज करने की मांग की थी।

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पत्नी क्यों पहुंची कोर्ट?

मामला संतोष पारीक और उनके पति डॉ. हरि मोहन शर्मा से जुड़ा है।

याचिका में महिला ने बताया कि उनकी शादी 11 जून 1978 को हुई थी और इस शादी से उनकी एक बेटी भी है।

उन्होंने यह भी कहा कि पति-पत्नी के बीच समय-समय पर विवाद जरूर हुए, लेकिन शादी आज भी कायम है। यहां तक कि तलाक का मामला भी चला, लेकिन वह सफल नहीं हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाने के बाद भी शादी बरकरार रही।

डॉ. हरि मोहन शर्मा राजस्थान सरकार के मेडिकल कॉलेज, कोटा में ईएनटी विभाग में प्रोफेसर थे। वे 30 सितंबर 2014 को रिटायर हुए और तब से नियमित रूप से पेंशन प्राप्त कर रहे हैं।

महिला का कहना था कि रिटायरमेंट के बाद जारी पीपीओ में उनका नाम शामिल नहीं किया गया।

उनका तर्क था कि वह कानूनी रूप से पत्नी हैं और राजस्थान सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1996 के तहत “फैमिली” की परिभाषा में आती हैं। इसलिए पीपीओ में उनका नाम दर्ज होना चाहिए, ताकि भविष्य में फैमिली पेंशन मिलने में कोई परेशानी न हो।

इसी मांग को लेकर उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

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सरकार ने क्या कहा?

राज्य सरकार की ओर से इस मांग का विरोध किया गया।

सरकार ने कोर्ट को बताया कि डॉ. शर्मा अभी जिंदा हैं और नियमित रूप से पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। ऐसे में पत्नी को इस समय पीपीओ में नाम जोड़ने का कोई अधिकार नहीं बनता।

सरकार ने कहा कि फैमिली पेंशन का सवाल ही तब उठेगा जब संबंधित कर्मचारी का निधन होगा। इसलिए यह याचिका समय से पहले दायर की गई है और सुनवाई योग्य नहीं है।

हाईकोर्ट के सामने क्या था सबसे बड़ा सवाल?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या किसी रिटायर्ड कर्मचारी की पत्नी उसके जिंदा रहते पीपीओ में अपना नाम दर्ज कराने की मांग कर सकती है?

कोर्ट ने रिकॉर्ड देखा और पाया कि डॉ. शर्मा जिंदा हैं और खुद पेंशन प्राप्त कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने अपनी पत्नी का नाम फैमिली पेंशन के लिए पीपीओ में दर्ज नहीं कराया है।

यहीं से कोर्ट ने यह जांच शुरू की कि क्या पत्नी को इस समय कोई ऐसा कानूनी अधिकार मिला है जिसके आधार पर वह पीपीओ में अपना नाम दर्ज कराने की मांग कर सके।

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पेंशन को लेकर हाईकोर्ट ने क्या कहा?

फैसले में हाईकोर्ट ने पेंशन की प्रकृति पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि पेंशन किसी व्यक्ति को उसकी नौकरी, सेवा और योगदान के बदले मिलने वाला लाभ है। यह उस कर्मचारी की खुद की कमाई हुई सुविधा है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक कर्मचारी जिंदा है और खुद पेंशन ले रहा है, तब तक कोई दूसरा व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि उसका नाम पीपीओ में जोड़ दिया जाए ताकि उसे आगे चलकर फैमिली पेंशन मिल सके।

‘फैमिली पेंशन का अधिकार अभी पैदा ही नहीं हुआ’

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यहीं रहा। हाईकोर्ट ने कहा कि महिला जिस अधिकार की बात कर रही हैं, वह अभी अस्तित्व में ही नहीं आया है।

कोर्ट के मुताबिक फैमिली पेंशन का अधिकार तभी बनेगा, जब कानून में तय स्थिति आएगी। अभी क्योंकि पेंशन पाने वाला कर्मचारी जिंदा है, इसलिए पत्नी का दावा समय से पहले किया गया दावा माना जाएगा।

कोर्ट ने साफ कहा कि भविष्य में फैमिली पेंशन को लेकर यदि कोई विवाद पैदा होता है, तो उस समय महिला कानून के अनुसार अपना दावा कर सकती हैं। लेकिन अभी पीपीओ में नाम जोड़ने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

समय से पहले दायर की गई याचिका

हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान याचिका प्रीमैच्योर यानी समय से पहले दायर की गई याचिका है। कोर्ट ने माना कि जब तक डॉ. शर्मा जिंदा हैं, तब तक पत्नी के पास पीपीओ में नाम दर्ज कराने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

इसी वजह से कोर्ट ने कहा कि फिलहाल इस याचिका पर कोई आदेश नहीं दिया जा सकता और महिला की मांग मानने से इनकार कर दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने पत्नी संतोष पारीक की याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने साफ कहा कि पति के जिंदा रहते पत्नी फैमिली पेंशन के नाम पर पीपीओ में अपना नाम जोड़ने की मांग नहीं कर सकती।

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर आगे चलकर फैमिली पेंशन को लेकर कोई विवाद होता है, तो महिला उस समय कानून के अनुसार अपना दावा कर सकती हैं। लेकिन अभी PPO में नाम जोड़ने की मांग नहीं की जा सकती।

फैसले का असर

यह फैसला उन हजारों सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए अहम है, जहां फैमिली पेंशन को लेकर पहले से विवाद या आशंकाएं मौजूद हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि सिर्फ इस आशंका के आधार पर कि भविष्य में फैमिली पेंशन मिल सकती है, अभी से पीपीओ में नाम जोड़ने या बदलाव की मांग नहीं की जा सकती। परिवार पेंशन का मामला तभी उठता है जब पेंशन लेने वाला व्यक्ति नहीं रहता। उससे पहले कोई भी दावा करना जल्दबाजी माना जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि फैमिली पेंशन का सवाल तभी उठता है, जब उसके लिए कानून में तय स्थिति पैदा हो जाए। उससे पहले इस तरह के दावों पर कोर्ट कोई आदेश नहीं देगा।

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