नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति सौदों और स्पेसिफिक परफॉर्मेंस मामलों को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर अदालत के आदेश के बावजूद खरीदार तय समय में पूरी रकम जमा नहीं कर पाता, तो केवल इसी आधार पर डिक्री अपने आप खत्म नहीं मानी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों के पास समय सीमा समाप्त होने के बाद भी भुगतान या जमा करने के लिए अतिरिक्त समय देने का अधिकार बना रहता है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस डिक्री एक प्रकार की “प्रारंभिक डिक्री” होती है और जब तक बिक्री विलेख पूरी तरह निष्पादित नहीं हो जाता, तब तक अदालत अपने अधिकार क्षेत्र को बनाए रखती है। अदालत चाहे तो देरी के कारण अनुबंध समाप्त कर सकती है या परिस्थितियों के अनुसार अतिरिक्त समय भी दे सकती है।
जस्टिस Manoj Misra और जस्टिस Manmohan की बेंच ने यह फैसला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को पलटते हुए दिया जिसमें स्पेसिफिक परफॉर्मेंस डिक्री को लागू कराने की कार्यवाही खारिज कर दी गई थी।
एक जमीन सौदे से कोर्ट तक पहुंचा मामला
मामला 2011 में हुए एक भूमि बिक्री समझौते से जुड़ा था। करीब 3.75 एकड़ जमीन को 16 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से बेचने का एग्रीमेंट हुआ था। बाद में विवाद बढ़ने पर खरीदार ने स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का मुकदमा दायर किया।
Execution Court (क्रियान्वयन अदालत) ने 3 मार्च 2017 को खरीदार के पक्ष में फैसला देते हुए निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर 57.5 लाख रुपये की शेष राशि जमा करे या भुगतान करे। खरीदार ने तय समय के भीतर विक्रेता को नोटिस भेजकर बिक्री विलेख निष्पादित करने की मांग भी की।
लेकिन बाद में भुगतान कोर्ट में 26 नवंबर 2020 को जमा किया गया। बाद में उसने डिक्री लागू कराने के लिए execution proceedings शुरू कीं।
हालांकि विवाद तब बढ़ा जब शेष रकम आखिरकार नवंबर 2020 में अदालत में जमा हुई। execution court ने कहा कि चूंकि खरीदार तय समय में रकम जमा नहीं कर पाया, इसलिए डिक्री लागू नहीं की जा सकती। हाईकोर्ट ने भी यही रुख अपनाया।
ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट का नजरिया
Execution Court (क्रियान्वयन अदालत) ने यह कहते हुए खरीदार की अर्जी खारिज कर दी कि उसने तय समय में पैसे जमा नहीं किए, इसलिए वह डिक्री लागू नहीं कर सकता।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी इसी फैसले को बरकरार रखा और कहा कि खरीदार समय सीमा का पालन करने में असफल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता ने दलील दी कि निचली अदालतों ने अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया। खरीदार का कहना था कि विक्रेता खुद डिक्री के खिलाफ अपील कर चुका था और भुगतान लेने को तैयार नहीं था। इसके अलावा कोविड लॉकडाउन और लंबी अदालती प्रक्रिया के कारण भी देरी हुई।
अपीलकर्ता ने यह भी कहा कि Specific Relief Act की धारा 28 अदालत को समय बढ़ाने का अधिकार देती है और अनुबंध अपने आप समाप्त नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर विक्रेता ने कहा कि खरीदार ने तीन साल से अधिक समय तक राशि जमा नहीं की, इसलिए उसे समानता आधारित राहत यानी equitable relief नहीं मिलनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का नजरिया: ‘तकनीकी आधार’ नहीं चलेगा
वहीं पूरे मामले को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए कहा कि उन्होंने बहुत ज्यादा तकनीकी (hyper-technical) दृष्टिकोण अपनाया।
कोर्ट ने देखा कि:
- खुद execution court कई बार सुनवाई टालता रहा और आगे की तारीख देकर भुगतान करने को कहता रहा।
- विक्रेता ने भी डिक्री को चुनौती दी थी और भुगतान लेने के लिए तैयार नहीं था।
- कोविड-19 महामारी के कारण भी देरी हुई थी।
ऐसे में सिर्फ देरी के आधार पर खरीदार का हक खत्म करना न्यायसंगत नहीं था।
बेंच ने कहा कि निचली अदालतों ने यह विचार ही नहीं किया कि खरीदार को समय विस्तार मिलना चाहिए या नहीं। साथ ही यह भी नहीं देखा गया कि देरी के लिए विक्रेता को किसी अतिरिक्त शर्त या मुआवजे के जरिए संतुलित किया जा सकता था या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्पेसिफिक परफॉर्मेंस का सिद्धांत पूरी तरह “equity” यानी न्यायसंगत संतुलन पर आधारित है। इसलिए अदालतों को केवल तकनीकी देरी देखकर डिक्री खत्म नहीं करनी चाहिए।
Section 28 Specific Relief Act: सुप्रीम कोर्ट ने नियम तय किए
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने Section 28 के तहत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांतों को स्पष्ट किया, जो भविष्य के मामलों में मार्गदर्शन करेंगे।
कोर्ट ने कहा कि specific performance की डिक्री एक तरह से प्रारंभिक (preliminary) डिक्री होती है। जब तक पूरी तरह रजिस्ट्री नहीं हो जाती, तब तक कोर्ट का अधिकार बना रहता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि समय सीमा खत्म होने पर न तो डिक्री अपने आप खत्म होती है और न ही समय अपने आप बढ़ता है। इसके लिए कोर्ट को परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेना होता है।
यदि डिक्री में साफ लिखा हो कि समय सीमा चूकने पर डिक्री खत्म हो जाएगी, तो फिर उसका पालन करना जरूरी होगा और ऐसी स्थिति में डिक्री लागू नहीं की जा सकती।
देरी के बावजूद राहत कब मिलेगी?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यदि खरीदार की नीयत सही है और वह सौदा पूरा करना चाहता है, तो कोर्ट उसे राहत दे सकता है।
कोर्ट यह देखेगा:
- क्या खरीदार जानबूझकर देरी कर रहा था?
- क्या उसकी तरफ से लापरवाही या धोखाधड़ी थी?
- क्या विक्रेता को इस देरी से नुकसान हुआ?
अगर खरीदार की नीयत साफ है, तो कोर्ट अतिरिक्त शर्तें लगाकर उसे मौका दे सकता है।
देरी का हर दिन समझाना जरूरी नहीं: SC
फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में Limitation Act की धारा 5 जैसी कठोर कसौटी लागू नहीं होगी। यानी हर दिन की देरी का अलग-अलग स्पष्टीकरण देना अनिवार्य नहीं है।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यदि खरीदार के आचरण से यह लगे कि उसकी अनुबंध पूरा करने की कोई वास्तविक मंशा ही नहीं थी या उसने जानबूझकर लापरवाही की, तब अदालत धारा 28 के तहत अनुबंध समाप्त कर सकती है।
कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले में परिस्थितियों, पक्षकारों के व्यवहार और देरी के प्रभाव को समग्र रूप से देखना होगा।
हाईकोर्ट और execution court के आदेश रद्द
अदालत ने अंततः माना कि निचली अदालतों ने धारा 28 के सिद्धांतों को सही तरीके से लागू नहीं किया। अदालत ने कहा कि execution court और हाईकोर्ट दोनों ने मामले को अत्यधिक तकनीकी तरीके से देखा।
इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए मामले में खरीदार को राहत दी और स्पष्ट किया कि अदालतें न्यायसंगत परिस्थितियों में समय सीमा बढ़ा सकती हैं।
यह फैसला संपत्ति कानून में equity और substantive justice को प्राथमिकता देने वाले महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।
संतुलन और न्याय पर आधारित फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण को सामने लाता है। इसमें न तो खरीदार को पूरी छूट दी गई है और न ही सख्त तकनीकी नियम लागू किए गए हैं।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून का उद्देश्य सिर्फ प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि वास्तविक न्याय सुनिश्चित करना है।
इस फैसले का असर उन हजारों मामलों पर पड़ेगा, जहां जमीन खरीद-फरोख्त के विवाद कोर्ट में लंबित हैं।
अब यह साफ हो गया है कि सिर्फ समय पर पैसे जमा न करने से केस खत्म नहीं होगा। कोर्ट के पास हमेशा विवेकाधिकार रहेगा
हर केस में परिस्थितियों के आधार पर फैसला होगा।
इससे खरीदारों को राहत मिलेगी, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट है कि जानबूझकर देरी करने वालों को कोई फायदा नहीं मिलेगा।