राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए जमानत याचिका को खारिज करते हुए सरकार को दिए थे कई दिशानिर्देश
नई दिल्ली/जोधपुर। देश में बढ़ते साइबर अपराधों पर कड़ा संदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जोधपुर में हुए ₹2 करोड़ के “डिजिटल अरेस्ट” ठगी मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 84 वर्षीय दंपति को ठगने के आरोपी राहुल जगदीश भाई जादव की जमानत याचिका खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इस तरह के अपराध बेहद गंभीर, संगठित और समाज के कमजोर वर्ग—खासकर बुजुर्गों—को निशाना बनाने वाले हैं, इसलिए ऐसे मामलों में किसी तरह की रियायत नहीं दी जा सकती।
राज्य का बड़ा खुलासा: गुजरात में भी ठगी, सच छुपाया
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा और एएसजी एस.डी. संजय ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए बताया कि आरोपी ने अपने खिलाफ गुजरात में दर्ज समान साइबर ठगी के मामले को छुपाया है।
राज्य ने खुलासा किया कि आरोपी पहले भी गुजरात में एक 70 वर्षीय दंपति के साथ इसी तरह की ठगी में शामिल रहा है और वहां उसके खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है।
यह तथ्य सामने आने के बाद कोर्ट ने आरोपी की भूमिका को और गंभीर माना।
“डिजिटल अरेस्ट” का खौफ दिखाकर ₹2 करोड़ की ठगी
मामला जोधपुर के साइबर पुलिस स्टेशन (ईस्ट) में दर्ज एफआईआर संख्या 003/2025 से जुड़ा है।
आरोप है कि आरोपी ने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर 84 वर्षीय दंपति को “डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाया और ऑनलाइन पूछताछ के नाम पर उनसे ₹2 करोड़ से ज्यादा की रकम ट्रांसफर करवा ली।
यह नया साइबर ठगी का तरीका तेजी से सामने आ रहा है, जिसमें अपराधी वीडियो कॉल या फोन के जरिए पीड़ित को मानसिक दबाव में लेकर बड़ी रकम हड़प लेते हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर
इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट भी आरोपी की जमानत खारिज कर चुका था और कड़ी टिप्पणियां करते हुए इसे “संगठित और सिस्टमेटिक खतरा” बताया था।
हाईकोर्ट ने राज्य को साइबर अपराध रोकने के लिए बड़े सुधारों के निर्देश दिए थे, जिनमें शामिल हैं—साइबर पुलिसिंग को मजबूत करना, तकनीकी रूप से प्रशिक्षित विशेष यूनिट्स बनाना, I4C और बैंकों के साथ तालमेल बढ़ाना, संदिग्ध ट्रांजैक्शन की रियल-टाइम निगरानी, म्यूल अकाउंट्स और क्रिप्टो के दुरुपयोग पर सख्ती शामिल है।
जस्टिस रवि चिरानिया की एकलपीठ ने इस मामले में विस्तृत फैसला दिया था और जिसके जरिए राज्य में साइबर क्राइम के खिलाफ कई दिशा-निर्देश दिए थे।
जमानत याचिकाएं खारिज
हाईकोर्ट ने इस मामले के आरोपी गुजरात के दो युवकों—अदनान हैदर भाई और राहुल जगदीश भाई जाधव—की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए यह फैसला दिया है।
हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि जमानत याचिका में तथ्य छुपाने की कोशिश की गई, जो कि न्यायिक प्रक्रिया के साथ छल है।
जांच में सामने आया कि इस राशि में से 45 लाख रुपये सीधे जमानत अर्जी देने वाले दोनों आरोपियों के खातों में पहुंचे थे।
कोर्ट ने कहा कि अगस्त और अक्टूबर 2025 की विस्तृत जांच रिपोर्टों ने दिखाया कि आरोपियों के खातों में ठगी की धनराशि पहुंची थी।
हाईकोर्ट के फैसले को दी थी चुनौती
हाईकोर्ट के रिपोर्टेबल जजमेंट के खिलाफ आरोपी राहुल जगदीश भाई जाधव ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी।
राजस्थान हाईकोर्ट का विस्तृत फैसला यहां पढ़े:
सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: अब नहीं मिलेगी राहत
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के जरिए साफ कर दिया है कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसे साइबर अपराधों में शामिल आरोपियों को अब आसानी से जमानत नहीं मिलेगी।
कोर्ट पहले भी ऐसे मामलों पर गंभीर चिंता जता चुका है और पूरे देश में इनसे निपटने के लिए सख्त व्यवस्था पर विचार कर रहा है।
ये है मामला
जोधपुर के 84 वर्षीय प्रेम मोहन गोविला और उनकी पत्नी को कॉल कर आरोपियों ने खुद को “मुंबई साइबर पुलिस अधिकारी” बताया। कॉल पर आरोप लगाया गया कि उनके खातों से 538 करोड़ रुपये के साइबर अपराध से जुड़े लेनदेन हुए हैं।
ठगों ने बुजुर्ग दंपति को राष्ट्रीय एजेंसियों की जांच का डर दिखाया और कहा कि उनके सभी बैंक खाते सुरक्षा कारणों से खाली कर “सरकारी सुरक्षित खातों” में ट्रांसफर करने होंगे।
डराए और धमकाए गए बुजुर्ग दंपति ने 9 दिनों में 2 करोड़ 2 लाख रुपये कई खातों में भेज दिए।