सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट से जताई सख्त नाराज़गी, रजिस्ट्रार जनरल से मांगी केस की संपूर्ण डिटेल
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने दहेज मृत्यु से जुड़े एक गंभीर आपराधिक मामले में राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा कि गयी देरी के चलते लगभग 23 वर्षों तक ट्रायल रुके रहने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए अत्यंत चिंताजनक करार दिया है।
ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय करने के फैसले के खिलाफ वर्ष 2003 में दायर निगरानी याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट ने वर्ष 2025 में फैसला दिया.
जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने मामले में राजस्थान हाईकोर्ट से पूरे मामले का रिकॉर्ड और ऑर्डर शीट विशेष दूत (स्पेशल मैसेंजर) के माध्यम से तलब करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश विजय कुमार व अन्य आरोपियों की ओर से दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई के बाद दिया है।
याचिका में कहा गया कि आरोपियों के खिलाफ वर्ष 2003 में आरोप तय किए जाने के खिलाफ दायर एक निगरानी याचिका राजस्थान हाईकोर्ट में लगभग दो दशकों तक लंबित रही, जिसके चलते दहेज मृत्यु जैसे गंभीर अपराध में ट्रायल पर रोक लगी रही।
यह निगरानी याचिका अंततः वर्ष 2025 में खारिज की गई, जिसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
SLP खारिज लेकिन लिया संज्ञान
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की ओर से दायर SLP को खारिज कर दिया, लेकिन मामले के तथ्यों को देखते हुए अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इस असाधारण देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए, 304-बी और 406 जैसे गंभीर अपराधों में वर्षों तक ट्रायल रुके रहना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अगले सप्ताह सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने बुलाया अतिरिक्त महाधिवक्ता
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा को कोर्ट की सहायता करने के लिए कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट करने को कहा कि बीते 20 वर्षों में राज्य सरकार ने इस निगरानी याचिका की सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि इतने गंभीर आपराधिक मामले में स्टे के बावजूद इसे प्राथमिकता से सूचीबद्ध क्यों नहीं किया गया।
रजिस्ट्रार जनरल को आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी आदेश दिया है कि इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट में निगरानी याचिका कितनी बार सूचीबद्ध हुई, कितनी बार कारण सूची (कॉज लिस्ट) में आई और किन-किन अवसरों पर बोर्ड पर होने के बावजूद सुनवाई नहीं हो सकी।
सभी हाईकोर्ट को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले के व्यापक प्रभाव को देखते हुए देशभर के सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे हत्या, बलात्कार, दहेज मृत्यु जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े उन मामलों का विवरण एकत्र कर प्रस्तुत करें, जिनमें ट्रायल पर रोक लगी है और मामले लंबे समय से लंबित हैं।
अदालत ने कहा कि इस तरह की अनिश्चितकालीन रोकें आपराधिक न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं।
ये है मामला
यह मामला दीपा नामक महिला की मृत्यु से जुड़ा है, जिसकी शादी नवंबर 2000 में हुई थी और 31 दिसंबर 2001 को उसकी ससुराल में मृत्यु हो गई।
प्रारंभिक जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कोई बाहरी चोट नहीं पाई गई थी और फॉरेंसिक जांच में भी जहर की पुष्टि नहीं हुई।
मेडिकल बोर्ड ने भी मृत्यु के किसी असामान्य कारण का निर्धारण नहीं किया।
इसके बावजूद जनवरी 2002 में दहेज उत्पीड़न और हत्या के आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई।
नवंबर 2002 में आरोप तय हुए और 2003 में दायर निगरानी याचिका के चलते ट्रायल लगभग 23 वर्षों तक रुका रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अनिश्चितकालीन स्टे न्याय के उद्देश्य को विफल करता है और इस पर सख्त न्यायिक निगरानी आवश्यक है। अगली सुनवाई अब रिकॉर्ड और जवाब मिलने के बाद की जाएगी।