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‘प्राइवेट डिटेक्टिव’ को रेगुलेट करने वाला कानून क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और विधि आयोग को कानून बनाने का दिया सुझाव

Supreme Court Seeks Response on Plea Alleging Medical Data Leak of 1.5 Lakh People

नई दिल्ली: राजस्थान के एक मेंटेनेंस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निजी जासूस (प्राइवेट डिटेक्टिव) एजेंसियों के कामकाज को लेकर बड़ा सवाल उठाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में प्राइवेट डिटेक्टिव्स के कामकाज को लेकर कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं है, जो गंभीर चिंता का विषय है।

जब निजी जासूस लोगों की तस्वीरें, वीडियो और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सबूत जुटा रहे हैं, तो उनके कामकाज को नियंत्रित करने वाला स्पष्ट कानून क्यों नहीं है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और विधि आयोग (लॉ कमीशन) से इस मुद्दे पर विचार कर जरूरी कानूनी व्यवस्था बनाने को कहा है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी राजस्थान के एक मेंटेनेंस विवाद की सुनवाई के दौरान की।

इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पति पहली नजर में ऐसे ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश कर देता है, जिनसे पत्नी को मेंटेनेंस न मिलने का कानूनी आधार बनता हो, तो ट्रायल कोर्ट उस आवेदन को अंतिम सुनवाई तक लंबित नहीं रख सकता। कोर्ट को पहले उस आवेदन पर फैसला करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सिर्फ एक विवाद तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सरकार और लॉ कमीशन को साफ संकेत दिया कि अब इस पूरे क्षेत्र को रेगुलेट करने का समय आ गया है।

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क्या था राजस्थान का मामला?

मामला राजस्थान के उदयपुर का है। जहां पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अपने और बच्चे के लिए मेंटेनेंस की मांग की थी।

इसके जवाब में पति ने दावा किया कि पत्नी किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही है। उसका कहना था कि यदि ऐसा है तो कानून की धारा 125(4) के तहत पत्नी मेंटेनेंस की हकदार नहीं होगी।

पति ने अपने दावे के समर्थन में बड़ी संख्या में फोटो, वीडियो और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड कोर्ट के सामने पेश किए। उसका कहना था कि ये रिकॉर्ड पत्नी के कथित एक्सट्रा मेरिटल रिलेशनशिप की ओर इशारा करते हैं।

हालांकि ट्रायल कोर्ट ने पति का आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इन आरोपों की जांच अंतिम सुनवाई के दौरान होगी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने भी इसी फैसले को सही माना। इसके बाद पति सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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मेंटेनेंस पर सुप्रीम कोर्ट कि टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 125 का मकसद आर्थिक रूप से कमजोर पत्नी, बच्चों और माता-पिता को तत्काल सहायता देना है।

यह सामाजिक न्याय से जुड़ा प्रावधान है और इसका मकसद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को बेसहारा होने से बचाना है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 125(4) सामान्य नियम नहीं, बल्कि एक अपवाद है।

इसलिए यदि पति पहली नजर में ऐसे ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश कर देता है, जिनसे यह संकेत मिलता हो कि पत्नी किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रह रही है या कानून के तहत उसे मेंटेनेंस नहीं मिल सकता, तो ट्रायल कोर्ट को उस आवेदन पर पहले फैसला करना चाहिए।

केवल यह कहकर कि सभी मुद्दों पर अंतिम सुनवाई में विचार होगा, आवेदन को लंबित नहीं रखा जा सकता।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर मामले के तथ्य अलग होते हैं। यदि आरोपों की सच्चाई जानने के लिए सबूतों की जांच जरूरी हो, तो ट्रायल कोर्ट अंतरिम मेंटेनेंस जारी रख सकता है।

लेकिन जहां पहली नजर में मजबूत सबूत मौजूद हो, वहां धारा 125(4) के आवेदन पर पहले फैसला करना जरूरी होगा।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मामला फिर से ट्रायल कोर्ट को भेज दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि पति के आवेदन पर पहले कानून के मुताबिक फैसला किया जाए और उसके बाद ही मुख्य मेंटेनेंस मामले की सुनवाई आगे बढ़ाई जाए।

प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसियों पर चिंता जताई

सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड में मौजूद बड़ी संख्या में फोटो और वीडियो पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में अक्सर निजी जासूस (प्राइवेट डिटेक्टिव) एजेंसियों की मदद से इलेक्ट्रॉनिक सबूत जुटाए जाते हैं, लेकिन देश में उनके कामकाज को नियंत्रित करने वाला कोई स्पष्ट कानून नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि निजी जासूसों को लोगों की निगरानी करने, उनकी तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड करने या निजी जानकारी जुटाने का अधिकार किस कानून के तहत मिलता है?

उनके जुटाए गए इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की विश्वसनीयता कैसे तय होगी? अगर किसी व्यक्ति की निजता का उल्लंघन होता है या सबूतों से छेड़छाड़ होती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तकनीक के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के बीच इन सवालों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

इसलिए निजी जासूस एजेंसियों के कामकाज, उनके अधिकार, जिम्मेदारियों और जवाबदेही को लेकर स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार करने की जरूरत है।

साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि जांच के दौरान किसी व्यक्ति की निजता और व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा से समझौता न हो।

केंद्र और विधि आयोग को सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में वर्ष 2007 में पेश प्राइवेट डिटेक्टिव एजेंसी (रेगुलेशन) विधेयक का भी जिक्र किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उस प्रस्तावित कानून में निजी जासूस एजेंसियों के लाइसेंस, उनके कामकाज की निगरानी, रिकॉर्ड रखने और जवाबदेही तय करने जैसे कई प्रावधान थे, लेकिन यह कानून कभी लागू नहीं हो सका।

इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति केंद्र सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय और विधि आयोग को भेजने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों संस्थाएं इस विषय पर विचार करें कि क्या निजी जासूस एजेंसियों को रेगुलेट करने के लिए नया कानून या कोई स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि आज जब निजी जांच एजेंसियों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, तब उनके अधिकार, जिम्मेदारियां और जवाबदेही तय करने के लिए स्पष्ट कानून होना जरूरी है।

इससे एक ओर इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की विश्वसनीयता बनी रहेगी, वहीं दूसरी ओर नागरिकों के निजता के अधिकार की भी बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस फैसले की कॉपी कानून मंत्रालय और लॉ कमीशन को भेजी जाए, ताकि वे इस मुद्दे पर विचार कर सकें।

दूसरे देशों के मॉडल से सीखने की सलाह

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत इस क्षेत्र में कानून बनाते समय दूसरे देशों के अनुभवों से सीख सकता है।

फैसले में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, नीदरलैंड और सिंगापुर जैसे देशों का जिक्र किया गया, जहां इस तरह की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए स्पष्ट नियम मौजूद हैं।

सुप्रीम कोर्ट का संकेत साफ है निजी जासूसों के लिए एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार किया जाए, जिसमें उनकी जिम्मेदारियां तय हों, प्राइवेसी की सुरक्षा हो और दुरुपयोग की स्थिति में जवाबदेही भी सुनिश्चित की जा सके।

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