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अजमेर दरगाह पर प्रधानमंत्री सहित मुखियाओं द्वारा चादर चढ़ाने, सरकारी सम्मान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई से किया इनकार

Supreme Court Plea Challenges State-Sponsored Honor to Khwaja Moinuddin Chishti, Seeks Stay on PM’s Chadar Offering at Ajmer Dargah

नई दिल्ली। अजमेर दरगाह शरीफ में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर केन्द्र सरकार, प्रधानमंत्री सहित अन्य मंत्रियों, सरकारी एजेंसियों द्वारा चादर चढाने की मान्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कि गयी हैं.

सुप्रीम कोर्ट में दायर कि गयी इस याचिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा पर रोक लगाने की मांग की गई है.

याचिका में सरकार या सरकार के मुखिया द्वारा किसी विशेष धार्मिक स्थल पर इस प्रकार की औपचारिक धार्मिक गतिविधि में भाग लेने को संविधान की भावना के खिलाफ बताया हैं.

विश्व वैदिक सनातन संघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह और हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने याचिका दायर कर सोमवार को इस मामले पर तत्काल सुनवाई की मांग की थी.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने मामले की तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को रजिस्ट्री के समक्ष उचित प्रक्रिया अपनाने के लिए कहा.

याचिका में कहा गया कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अजमेर दरगाह को दिया जा रहा सरकारी संरक्षण और औपचारिक सम्मान न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह गणराज्य भारत की संवैधानिक गरिमा, संप्रभुता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के भी विरुद्ध है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि प्रधानमंत्री द्वारा अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1947 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी, जो तब से बिना किसी स्पष्ट कानूनी या संवैधानिक आधार के जारी है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सरकार या सरकार के मुखिया द्वारा किसी विशेष धार्मिक स्थल पर इस प्रकार की औपचारिक धार्मिक गतिविधि में भाग लेना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष के समर्थन में संविधान पीठ के फैसले Dargah Committee, Ajmer बनाम सैयद हुसैन अली का हवाला दिया है।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि अजमेर दरगाह को संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत एक स्वतंत्र धार्मिक संप्रदाय (religious denomination) का दर्जा प्राप्त नहीं है।

इसके आधार पर याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दरगाह को लेकर विशेष सरकारी सम्मान या आधिकारिक संरक्षण का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं बनता।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि सरकार के मुखिया द्वारा अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाना “जनता की इच्छा के विरुद्ध” है।

याचिकाकर्ताओं का दावा हैं कि उनमें से एक ने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक प्रतिनिधित्व (representation) भी भेजा है, जिसमें उनसे अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने से परहेज करने का अनुरोध किया गया है.

अजमेर दरगाह पर प्रधानमंत्री सहित मुखियाओं द्वारा चादर चढ़ाने, सरकारी सम्मान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालन सुनवाई से किया इनकार

नई दिल्ली। अजमेर दरगाह शरीफ में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर केन्द्र सरकार, प्रधानमंत्री सहित अन्य मंत्रियों, सरकारी एजेंसियों द्वारा चादर चढाने की मान्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कि गयी हैं.

याचिका में सरकार या सरकार के मुखिया द्वारा किसी विशेष धार्मिक स्थल पर इस प्रकार की औपचारिक धार्मिक गतिविधि में भाग लेने को संविधान की भावना के खिलाफ बताया हैं.

विश्व वैदिक सनातन संघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह और हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता ने याचिका दायर कर सोमवार को इस मामले पर तत्काल सुनवाई की मांग की थी.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने मामले की तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को रजिस्ट्री के समक्ष उचित प्रक्रिया अपनाने के लिए कहा.

सुप्रीम कोर्ट में दायर कि गयी इस याचिका में “राज्य-प्रायोजित औपचारिक सम्मान” और “प्रतीकात्मक मान्यता” के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा पर रोक लगाने की मांग की गई है.

याचिका में कहा गया कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और अजमेर दरगाह को दिया जा रहा सरकारी संरक्षण और औपचारिक सम्मान न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह गणराज्य भारत की संवैधानिक गरिमा, संप्रभुता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के भी विरुद्ध है।

याचिका में तर्क दिया गया है कि प्रधानमंत्री द्वारा अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1947 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी, जो तब से बिना किसी स्पष्ट कानूनी या संवैधानिक आधार के जारी है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सरकार या सरकार के मुखिया द्वारा किसी विशेष धार्मिक स्थल पर इस प्रकार की औपचारिक धार्मिक गतिविधि में भाग लेना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने अपने पक्ष के समर्थन में संविधान पीठ के फैसले Dargah Committee, Ajmer बनाम सैयद हुसैन अली का हवाला दिया है।

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि अजमेर दरगाह को संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत एक स्वतंत्र धार्मिक संप्रदाय (religious denomination) का दर्जा प्राप्त नहीं है।

इसके आधार पर याचिकाकर्ताओं का कहना है कि दरगाह को लेकर विशेष सरकारी सम्मान या आधिकारिक संरक्षण का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं बनता।

याचिका में यह भी दावा किया गया है कि सरकार के मुखिया द्वारा अजमेर दरगाह पर चादर चढ़ाना “जनता की इच्छा के विरुद्ध” है।

याचिकाकर्ताओं का दावा हैं कि उनमें से एक ने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक प्रतिनिधित्व (representation) भी भेजा है, जिसमें उनसे अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने से परहेज करने का अनुरोध किया गया है.

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