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निकाय चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पति या पत्नी की संपत्ति बताना जरूरी, जानकारी छिपाना पड़ सकता है भारी, गलत कानून लगने पर भी केस रहेगा जारी

Supreme Court Rules Spouse's Assets Must Be Disclosed In Election Affidavits

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि नगर निकाय चुनाव के दौरान उम्मीदवार को अपनी ही नहीं, बल्कि अपने जीवनसाथी की अलग-अलग संपत्तियों का भी पूरा खुलासा करना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नगर निकाय चुनाव लड़ने वाला कोई भी उम्मीदवार अपने पति या पत्नी की अलग से मौजूद संपत्ति को चुनावी हलफनामे में छिपा नहीं सकता।

अगर नियम के तहत संपत्ति की जानकारी देना जरूरी है, तो उसमें उम्मीदवार के साथ-साथ उसके जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति भी शामिल होगी।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर मजिस्ट्रेट ने गलती से गलत कानून के तहत केस शुरू कर दिया है, तो सिर्फ इसी वजह से पूरा मामला खत्म नहीं किया जा सकता।

ऐसी गलती को सुधारा जा सकता है। ऐसे मामले में सही कानून के तहत दोबारा कार्रवाई की जा सकती है।

यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने गुजरात की एक नगर पालिका चुनाव से जुड़े मामले में सुनाया।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि उम्मीदवार दोषी है या नहीं। कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा कि मामले की दोबारा सही कानून के तहत सुनवाई होनी चाहिए।

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हलफनामे से शुरू हुआ पूरा विवाद

यह मामला वर्ष 2015 के गुजरात नगर पालिका चुनाव का है। चुनाव लड़ने वाली उम्मीदवार ने अपने हलफनामे में अपने पति की कुछ संपत्तियों का जिक्र किया था, लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप था कि उनके पति के नाम पर कई दूसरी जमीनें भी थीं, जिनकी जानकारी हलफनामे में नहीं दी गई।

शिकायत में कहा गया कि यह जानकारी छिपाना चुनाव नियमों का उल्लंघन है और इससे मतदाताओं के सामने पूरी तस्वीर नहीं आ पाई। पहले इस शिकायत पर ज्यादा कार्रवाई नहीं हुई।

इसके बाद निजी शिकायत दायर की गई। मजिस्ट्रेट ने पहली नजर में मामला बनता मानते हुए उम्मीदवार को समन जारी कर दिया। बाद में गुजरात हाई कोर्ट ने भी इस कार्रवाई को रद्द करने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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जीवनसाथी की संपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट का साफ रुख

सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या उम्मीदवार को केवल अपनी और संयुक्त संपत्ति बतानी है या फिर पति या पत्नी के नाम पर अलग से मौजूद संपत्ति भी बतानी होगी।

उम्मीदवार का कहना था कि चुनाव नियमों में कहीं भी साफ नहीं लिखा है कि पति या पत्नी के नाम पर अलग से मौजूद संपत्ति की जानकारी देना जरूरी है। उनका दावा था कि नियम की भाषा यही बताती है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि नियम को सामान्य तरीके से पढ़ने पर साफ पता चलता है कि उम्मीदवार को अपनी, अपने पति या पत्नी और अपने आश्रितों की संपत्ति की जानकारी देनी होगी। नियम में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि अगर संपत्ति केवल पति या पत्नी के नाम पर है तो उसे छिपाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ शब्दों में कहा कि चुनावी हलफनामे में संपत्ति का खुलासा सिर्फ उम्मीदवार तक सीमित नहीं होता। इसमें पति या पत्नी और आश्रितों की संपत्तियां भी शामिल होती हैं।

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कॉमा की दलील कोर्ट ने क्यों ठुकराई?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियमों को पढ़ने से साफ होता है कि “मेरी, मेरे जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति”-यह तीनों अलग-अलग कैटेगरी हैं, और सभी का खुलासा करना जरूरी है। इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा है कि जो संपत्ति केवल जीवनसाथी के नाम पर है, उसे छिपाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियम में लगे कॉमा के आधार पर अलग मतलब नहीं निकाला जा सकता। वह सिर्फ लिखने का तरीका है। इससे यह नहीं माना जा सकता कि पति या पत्नी की अलग संपत्ति बताने से छूट मिल जाती है।

कोर्ट ने कहा कि नियम में लगा कॉमा सिर्फ शब्दों को अलग-अलग दिखाने के लिए है। इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पति या पत्नी की अलग संपत्ति की जानकारी देने की जरूरत नहीं है।

मजिस्ट्रेट से कहां हुई कानूनी गलती?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जिस कानून के तहत मजिस्ट्रेट ने मामला शुरू किया था, वह कानून संसद और विधानसभा चुनावों पर लागू होता है, नगर पालिका चुनावों पर नहीं।

कोर्ट ने कहा कि नगर पालिका चुनाव राज्य के अलग कानून और उसके तहत बने नियमों से चलते हैं। इसलिए इस मामले में सीधे उसी कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए थी, न कि जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत।

यही वजह थी कि सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मजिस्ट्रेट ने जिस कानून के तहत पहली बार मामला दर्ज किया, उसमें गलती हुई थी।

क्या गलत कानून लगाने से पूरा केस खत्म हो जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का जवाब भी साफ शब्दों में दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ‘क्यूरेबल इर्रेगुलैरिटी’ यानी सुधारी जा सकने वाली गलती के सिद्धांत को लागू किया।

कोर्ट ने कहा कि अगर किसी कोर्ट ने गलती से गलत कानूनी धारा के तहत मामला शुरू कर दिया है, तो सिर्फ इसी आधार पर पूरी कार्रवाई खत्म नहीं हो जाती। अगर उसी कोर्ट के पास सही कानून के तहत भी मामला देखने का अधिकार है, तो वह दोबारा सही कानून के तहत आगे बढ़ सकती है।

यानी अगर कोर्ट के पास सही कानून के तहत भी संज्ञान लेने की शक्ति है, तो यह गलती ठीक की जा सकती है।

कोर्ट ने कहा कि कानून का मकसद केवल तकनीकी गलती के आधार पर मामलों को खत्म करना नहीं है। सबसे पहले यह देखना होगा कि क्या उस गलती से किसी पक्ष को वास्तविक नुकसान हुआ है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो केवल गलत धारा लगाने से पूरी कार्रवाई रद्द नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट और मजिस्ट्रेट के पुराने आदेशों को पूरी तरह सही नहीं माना, लेकिन पूरे मामले को भी खत्म नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट अब इस मामले को दोबारा देखेंगे और सही कानून के तहत यह तय करेंगे कि आगे क्या कार्रवाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि उसने अभी इस बात पर कोई राय नहीं दी है कि उम्मीदवार ने वास्तव में जानकारी छिपाई थी या नहीं। इस मुद्दे पर फैसला अब आगे की प्रक्रिया में होगा।

यानी फिलहाल किसी को दोषी नहीं ठहराया गया है। केवल यह कहा गया है कि सही कानूनी आधार पर दोबारा प्रक्रिया अपनाई जाए।

निकाय चुनाव लड़ने वालों के लिए अहम फैसला

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ गुजरात के एक मामले तक सीमित नहीं माना जाएगा। इसका असर उन सभी राज्यों के नगर निकाय चुनावों पर पड़ सकता है, जहां उम्मीदवारों को हलफनामा देकर अपनी और परिवार की संपत्ति की जानकारी देनी होती है।

अब उम्मीदवारों के लिए यह संदेश साफ है कि अगर नियम में पति या पत्नी की संपत्ति बताने की जिम्मेदारी है, तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। जीवनसाथी के नाम पर मौजूद संपत्ति को छिपाने की कोशिश आगे चलकर कानूनी विवाद की वजह बन सकती है।

साथ ही यह फैसला लोवर कोर्ट के लिए भी अहम है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर किसी मामले में शुरुआत में गलत कानूनी धारा लग गई हो, तो हर बार पूरा मामला खत्म करना जरूरी नहीं है। अगर कानून इसकी इजाजत देता है, तो सही धारा के तहत दोबारा कार्रवाई की जा सकती है।

इस फैसले का एक और बड़ा संदेश यह है कि चुनावी हलफनामा केवल एक औपचारिक कागज नहीं है। इसमें दी गई जानकारी मतदाताओं के भरोसे से जुड़ी होती है। इसलिए उम्मीदवारों से पूरी और सही जानकारी देने की उम्मीद की जाती है।

यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी या जानकारी छिपाने के आरोपों की जांच जरूरी है, क्योंकि ऐसे मामले केवल किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि पूरे चुनावी सिस्टम और जनता के भरोसे से जुड़े होते हैं।

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