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जंतर-मंतर पर नहीं होंगे विरोध-प्रदर्शन? नई जगह तय करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई, केंद्र से मांगा जवाब

Supreme Court Seeks Centre's Response on Plea to Shift Protest Venue from Jantar Mantar

नई दिल्ली: विरोध-प्रदर्शन के लिए तय दिल्ली में जंतर-मंतर की जगह अब बदली जानी चाहिए या नहीं, इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने जंतर मंतर पर होने वाले विरोध-प्रदर्शनों को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने का फैसला किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

याचिका में कहा गया है कि जंतर-मंतर अब बड़े प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त नहीं रह गया है और इससे आसपास रहने वाले लोगों के साथ-साथ रोजाना आने-जाने वालों को भी परेशानी होती है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका में उठाया गया मुद्दा अहम है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे-खासकर लोगों की आवाजाही, जरूरी सेवाओं की सप्लाई और इलाके में रहने वालों की परेशानी बेहद गंभीर हैं और इन पर विचार जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से केंद्र सरकार से निर्देश लेकर जवाब दाखिल करने को कहा।

साथ ही इस मामले की अलग से सुनवाई करने का भी आदेश दिया।

याचिका में क्या मांग की गई?

याचिकाकर्ता का कहना है कि जंतर-मंतर को उस समय प्रदर्शन के लिए तय किया गया था, जब विरोध-प्रदर्शनों में सीमित संख्या में लोग शामिल होते थे।

लेकिन अब सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों के कारण कुछ ही समय में हजारों लोग जुट जाते हैं। ऐसे में मौजूदा व्यवस्था पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि जंतर-मंतर को नियमित विरोध-प्रदर्शन की जगह के रूप में इस्तेमाल करने की व्यवस्था पर दोबारा विचार किया जाए।

इसके बजाय दिल्ली में किसी बड़े और सुरक्षित स्थान को प्रदर्शन के लिए तय किया जाए, जहां बड़ी संख्या में लोगों के जुटने पर भी आम लोगों का जीवन प्रभावित न हो।

याचिका में सुझाव दिया गया है कि रामलीला मैदान या इसी तरह का कोई बड़ा खुला स्थान इस उद्देश्य के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे प्रदर्शन करने वालों का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा और आम लोगों को अनावश्यक परेशानी भी नहीं होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि याचिका में एक अहम मुद्दा उठाया गया है।

उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर के आसपास लोगों के आने-जाने, जरूरी सेवाओं की आपूर्ति और दूसरी व्यावहारिक दिक्कतों पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि वे केंद्र सरकार से इस मामले में निर्देश लेकर जवाब दाखिल करें।

इसके साथ ही याचिका पर नोटिस जारी करते हुए इसे अलग से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया।

सुनवाई के दौरान एक प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन का भी जिक्र हुआ। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उस पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

चीफ जस्टिस ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि कहीं गड़बड़ी होती है, तो कोर्ट उस पर उचित समय पर विचार करेगी।

जंतर-मंतर को लेकर सवाल क्यों उठा?

याचिका में कहा गया है कि जंतर-मंतर संसद, सेंट्रल विस्टा, कई सरकारी दफ्तरों और महत्वपूर्ण इलाकों के पास स्थित है।

ऐसे में बड़े विरोध-प्रदर्शनों के दौरान यातायात प्रभावित होता है और आसपास रहने वाले लोगों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि अब विरोध-प्रदर्शनों का स्वरूप और तरीका पहले जैसा नहीं रहा।

डिजिटल माध्यमों के कारण कम समय में बड़ी संख्या में लोग एक जगह पहुंच जाते हैं।

इसलिए यह देखने की जरूरत है कि क्या जंतर-मंतर अब भी ऐसे प्रदर्शनों के लिए सही जगह है या फिर कोई नई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए।

प्रदर्शन के अधिकार पर पुराने फैसले

यह पहला मामला नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट के सामने विरोध-प्रदर्शन और आम लोगों की परेशानी का सवाल आया हो।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका है कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन यह अधिकार इस तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि दूसरे लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित होने लगे।

साल 2018 में जंतर-मंतर और बोट क्लब से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध-प्रदर्शन का महत्वपूर्ण स्थान है। ले

किन प्रदर्शन तय जगह पर होने चाहिए और उनसे आसपास रहने वाले लोगों को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए।

शाहीन बाग फैसले में भी यही सिद्धांत दोहराया

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2020 में शाहीन बाग मामले की सुनवाई के दौरान भी यही बात दोहराई थी। कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक सड़क या सार्वजनिक जगह पर अनिश्चित समय तक कब्जा करके प्रदर्शन नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान नागरिकों को अपनी बात रखने और विरोध करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार दूसरे लोगों के अधिकारों से अलग नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रदर्शन करने का अधिकार और आम लोगों के आने-जाने का अधिकार, दोनों के बीच संतुलन बना रहना चाहिए।

यदि किसी प्रदर्शन की वजह से लोगों का रोजमर्रा का जीवन प्रभावित होता है, तो उस स्थिति पर भी विचार करना जरूरी है।

अब किन सवालों पर करेगा विचार?

इस जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या जंतर-मंतर आज भी दिल्ली में बड़े विरोध-प्रदर्शनों के लिए सही जगह है।

याचिका में दावा किया गया है कि समय के साथ प्रदर्शनों का स्वरूप बदल गया है और अब पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा लोग कम समय में वहां पहुंच जाते हैं।

इसी वजह से याचिकाकर्ता ने मांग की है कि केंद्र सरकार नई व्यवस्था पर विचार करे और विरोध-प्रदर्शन के लिए किसी बड़े और अधिक सुविधाजनक स्थान को तय किया जाए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस मांग पर कोई राय नहीं दी है।

सुप्रीम ने सिर्फ केंद्र सरकार से जवाब मांगा है और कहा है कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर विस्तार से सुनवाई की जाएगी।

केंद्र सरकार को नोटिस

सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से भी इस मामले में केंद्र से निर्देश लेकर अपना पक्ष रखने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वह इस मामले की अलग से सुनवाई करेगा।

यानी फिलहाल जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाने या नई जगह तय करने का कोई आदेश नहीं दिया गया है।

अब केंद्र सरकार का जवाब आने के बाद सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि मौजूदा व्यवस्था जारी रहनी चाहिए या विरोध-प्रदर्शनों के लिए किसी नई व्यवस्था की जरूरत है।

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