सुप्रीम कोर्ट ने कहा- त्वरित सुनवाई का अधिकार केवल एक संवैधानिक सिद्धांत नहीं, बल्कि अभियोजन और राज्य का दायित्व
नई दिल्ली। राजस्थान के जयपुर ग्रामीण जिले के शाहपुरा थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में अभियोजन की ओर से ट्रायल में अनावश्यक देरी पर कड़ी नाराज़गी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब आरोपी जेल में बंद हों, तब ट्रायल में देरी अत्यंत गंभीर विषय है। अदालत ने इसे अभियोजन की लापरवाही करार देते हुए भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया।
जस्टिस अहसनुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने मादक पदार्थों से जुड़े गंभीर अपराधों में भी त्वरित सुनवाई के संवैधानिक अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए एनडीपीएस एक्ट के एक मामले में आरोपी को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की है।
यह मामला राजस्थान के जयपुर ग्रामीण जिले के शाहपुरा थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां वर्ष 2023 में दर्ज एफआईआर संख्या 319/2023 के तहत एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/15 के अंतर्गत कार्रवाई की गई थी। इस प्रकरण में सह-आरोपी के कब्जे से 141.390 किलोग्राम डोडा चूरा (पॉपी हस्क) बरामद किया गया था, जिसे वाणिज्यिक मात्रा की श्रेणी में रखा जाता है।
याचिकाकर्ता बलजीत सिंह उर्फ बब्बू सिंह पर आरोप था कि वह सह-आरोपी को मादक पदार्थ की आपूर्ति करने वाला सप्लायर है। राजस्थान हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और जमानत की मांग की।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि बरामदगी आरोपी के व्यक्तिगत कब्जे से नहीं, बल्कि एक वाहन से हुई थी।
इसके अलावा यह भी तर्क रखा गया कि जिस सह-आरोपी से वास्तव में मादक पदार्थ जब्त किया गया, उसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही 11 नवंबर 2024 को जमानत प्रदान कर चुका है।
ऐसे में समानता (Parity) के सिद्धांत के आधार पर वर्तमान याचिकाकर्ता को भी राहत मिलनी चाहिए।
बचाव पक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि आरोपी पिछले दो साल चार महीने से न्यायिक हिरासत में है और उसके खिलाफ कोई अन्य आपराधिक पूर्ववृत्त (क्रिमिनल एंटीसिडेंट) नहीं है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि मामला वाणिज्यिक मात्रा के मादक पदार्थ से जुड़ा है, जो अपने आप में गंभीर अपराध है।
अभियोजन ने यह तर्क रखा कि ऐसे मामलों में जमानत देने से समाज पर गलत संदेश जाता है।
हालांकि, जब सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल की प्रगति को लेकर सीधा प्रश्न किया, तो राज्य के अधिवक्ता को यह स्वीकार करना पड़ा कि कुल 16 गवाहों में से अब तक केवल 3 गवाहों के बयान ही दर्ज हो सके हैं।
ट्रायल में देरी का कारण अदालत परिवर्तन को बताया गया।
सुप्रीम कोर्ट का अहम अवलोकन
खंडपीठ ने सभी तथ्यों पर विचार करते हुए कहा कि सह-आरोपी, जिसे मुख्य आपूर्तिकर्ता बताया गया था, पहले ही जमानत पर है।
इसके अतिरिक्त, वर्तमान आरोपी दो साल से अधिक समय से जेल में बंद है और ट्रायल की गति अत्यंत धीमी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि त्वरित सुनवाई का अधिकार केवल एक संवैधानिक सिद्धांत नहीं, बल्कि अभियोजन और राज्य का दायित्व भी है।
लंबे समय तक विचाराधीन कैदी को जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
जमानत मंजूर, लेकिन सख्त शर्तों के साथ
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने का आदेश पारित किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन होगी और आरोपी को सुनवाई में पूर्ण सहयोग करना होगा।
अभियोजन पर कड़ी टिप्पणी
फैसले के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब आरोपी जेल में बंद हों, तब ट्रायल में देरी अत्यंत गंभीर विषय है।
अदालत ने इसे अभियोजन की लापरवाही करार देते हुए भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया।