सुप्रीम कोर्ट ने कहा : चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद परिसीमन जैसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप से बचना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में है।
नई दिल्ली, 16 फरवरी। राजस्थान में पंचायत राज संस्थाओं के परिसीमन (डिलिमिटेशन) से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण फैसला देते हुए राज्य सरकार को बड़ी राहत दी है।
देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने राजस्थान पंचायत राज अधिनियम, 1994 के तहत जारी अंतिम परिसीमन अधिसूचनाओं और पूरी प्रक्रिया को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत राज्य द्वारा किए गए परिसीमन जैसे प्रशासनिक और चुनावी प्रयास की न्यायिक समीक्षा सीमित दायरे में ही होनी चाहिए और चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालतों को हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
इस फैसले के साथ ही राज्य सरकार द्वारा घोषित समयसीमा के अनुसार 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत चुनाव पूरा कराने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती
यह मामला जय सिंह द्वारा दायर उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें राजस्थान सरकार द्वारा जारी परिसीमन अधिसूचनाओं और ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन की प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी।
इससे पहले राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 21 जनवरी 2026 को डी.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 792/2026 को खारिज करते हुए राज्य सरकार की परिसीमन अधिसूचनाओं को वैध ठहराया था।
हाईकोर्ट ने माना था कि परिसीमन की प्रक्रिया कानून के अनुरूप की गई है और इसमें किसी प्रकार की मनमानी नहीं पाई गई।
हाईकोर्ट के इसी निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में कहा गया कि राज्य सरकार ने परिसीमन अधिसूचना जारी करते समय अनिवार्य वैधानिक प्रावधानों का पूरी तरह पालन नहीं किया।
यह भी आरोप लगाया गया कि ग्राम पंचायत मुख्यालय की दूरी, स्थानीय निवासियों की असुविधा तथा अन्य प्रशासनिक पहलुओं से जुड़े जो आपत्तियां नागरिकों द्वारा प्रस्तुत की गई थीं, उन्हें पर्याप्त रूप से नहीं सुना गया और बिना समुचित विचार के निर्णय लिया गया।
याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से ग्राम पंचायत सिलारपुरी के पुनर्गठन का मुद्दा उठाया। इस ग्राम पंचायत में पहले सिलारपुरी (जनसंख्या 1254), खानी डांगियां (जनसंख्या 364) और रायपुर जाटान (जनसंख्या 1700) शामिल थे।
याचिका में कहा गया कि ग्राम पंचायत मुख्यालय को रायपुर जाटान स्थानांतरित करना मनमाना और अनुचित निर्णय है, जिससे कई ग्रामीणों को प्रशासनिक कार्यों के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज और राजस्थान सरकार के अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष स्पष्ट किया कि पूरा परिसीमन अभ्यास राजस्थान पंचायत राज अधिनियम, 1994 और संबंधित नियमों के अनुरूप ही किया गया है।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया कि परिसीमन से पहले आम जनता और जनप्रतिनिधियों से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए गए थे।
और प्राप्त आपत्तियों पर विचार करने के बाद ही ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन और मुख्यालय निर्धारण के लिए गठित मंत्रिस्तरीय उपसमिति ने सभी पहलुओं का अध्ययन कर अंतिम निर्णय लिया।
अंतिम मतदाता सूची 25 फरवरी को
सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने जानकारी दी हैं कि हाईकोर्ट ने पहले ही निर्देश दिया था कि पुनर्गठन की प्रक्रिया 31 दिसंबर 2025 तक पूरी की जाए, जिसका पालन करते हुए 28 दिसंबर 2025 को संशोधित अधिसूचना जारी की गई।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जानकारी दी कि जनवरी 2026 में पंचायत राज संस्थाओं के सभी वार्डों का गठन पूरा कर लिया गया।
राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी है और प्रारूप मतदाता सूचियां प्रकाशित कर आपत्तियां आमंत्रित की जा चुकी हैं।
अंतिम मतदाता सूची 25 फरवरी 2026 को प्रकाशित की जानी है।
राज्य सरकार ने आश्वासन दिया है कि पूरी चुनाव प्रक्रिया 15 अप्रैल 2026 तक पूरी कर ली जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां करते हुए कहा कि:
हाईकोर्ट पहले ही परिसीमन प्रक्रिया के प्रत्येक पहलू की विस्तार से जांच कर चुका है।
परिसीमन से संबंधित मुख्य निर्णयों के खिलाफ पहले भी कई याचिकाएं दायर हुई थीं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है।
चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद परिसीमन जैसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप से बचना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में है।
इस चरण पर हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा चुनाव 15 अप्रैल 2026 तक पूरा कराने का जो आश्वासन दिया गया है, उसका पालन किया जाना चाहिए और केवल अप्रत्याशित परिस्थितियों में ही इस समयसीमा में बदलाव संभव होगा।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया।