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विधवा का पुनर्विवाह होने मात्र से उसका मुआवजा पाने का अधिकार समाप्त नहीं होता- राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Widow’s Remarriage Does Not End Compensation Rights: Rajasthan High Court Enhances Minor Daughter’s Share

विधवा के पुनर्विवाह के बाद नाबालिग बेटी दादा-दादी के पास, ऐसे में विधवा पत्नी का हिस्सा कम कर बेटी का बढ़ाया

जयपुर। सड़क दुर्घटना के मुआवजा मामलों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए स्पष्ट किया है कि पति की मृत्यु के बाद विधवा का पुनर्विवाह होने मात्र से उसका मुआवजा पाने का अधिकार समाप्त नहीं होता।

हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि, परिस्थितियों के अनुसार आश्रितों के हितों को ध्यान में रखते हुए मुआवजे के वितरण में संतुलन बनाया जा सकता है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने पति की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह कर चुकी विधवा पत्नी को भी मुआवजे में हिस्सेदार मानते हुए उसका हिस्सा देने का आदेश दिया है।

लेकिन विधवा की नाबालिग बेटी के दादा-दादी के पास रहने और उसके भविष्य को देखते हुए विधवा की हिस्सेदारी 70 से 40 करते हुए बेटी के मुआवजे को 15 से 45 प्रतिशत बढ़ाने का फैसला किया गया है।

जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट कुमारी हंसा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

दुर्घटना, दावा और कानूनी बिंदु

मामला वर्ष 2011 में जयपुर जिले के बासी क्षेत्र में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। एक पिकअप वाहन सब्जियां लेकर जयपुर की ओर जा रहा था।

वाहन में चालक सहित कुछ अन्य व्यक्ति भी मौजूद थे। रास्ते में वाहन तेज और लापरवाही से चलाने के कारण डिवाइडर से टकरा गया, जिससे वाहन में बैठे दो व्यक्तियों — जयनारायण मीणा और जगदीश प्रसाद मीणा — को गंभीर चोटें आईं और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

मृतकों के परिजनों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में मुआवजा याचिकाएं दायर की थीं, जिसे ट्रिब्यूनल ने स्वीकार करते हुए मुआवजा प्रदान किया।

बाद में बीमा कंपनी और दावेदारों दोनों ने अलग-अलग आधारों पर हाईकोर्ट में अपीलें दाखिल कीं।

बीमा कंपनी का तर्क था कि वाहन मालवाहक था और उसमें यात्रियों को ले जाना पॉलिसी का उल्लंघन है, इसलिए कंपनी मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं है। दूसरी ओर, दावेदारों ने मुआवजा बढ़ाने और उसके वितरण में संशोधन की मांग करते हुए अपील दायर की।

बीमा कंपनी की अपील खारिज

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि बीमा पॉलिसी में “नॉन-फेयर पेइंग पैसेंजर्स” के लिए अतिरिक्त प्रीमियम जमा किया गया था, जिससे कुछ यात्रियों का जोखिम कवर था।

इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी मुआवजा देने से बच नहीं सकती और उसकी अपील में कोई दम नहीं है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि बीमा कंपनी अतिरिक्त प्रीमियम लेकर यात्रियों का जोखिम कवर करती है, तो बाद में यात्रियों के वाहन में होने के आधार पर जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।

बीमा कंपनी के तर्क

बीमा कंपनी की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया कि दुर्घटना में शामिल वाहन मालवाहक था और उसे यात्रियों को ले जाने के लिए अधिकृत नहीं किया गया था। कंपनी का कहना था कि दुर्घटना के समय वाहन में कई लोग यात्रा कर रहे थे, जो पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है। इसलिए बीमा कंपनी को मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

कंपनी ने यह भी कहा कि पॉलिसी केवल चालक, मालिक और खलासी जैसे सीमित व्यक्तियों के जोखिम को कवर करती है, जबकि दुर्घटना में मृतक अन्य यात्री थे, इसलिए बीमा दायित्व लागू नहीं होता।

दावेदारों का पक्ष

दूसरी ओर, दावेदारों के वकीलों ने अदालत को बताया कि वाहन की बीमा पॉलिसी में अतिरिक्त प्रीमियम लेकर “नॉन-फेयर पेइंग पैसेंजर्स” यानी किराया न देने वाले यात्रियों का जोखिम भी कवर किया गया था। पॉलिसी के अनुसार छह व्यक्तियों तक के लिए बीमा सुरक्षा उपलब्ध थी।

चूंकि दुर्घटना से संबंधित दावे केवल दो मृतकों के आश्रितों ने किए थे, इसलिए बीमा कंपनी पर मुआवजा भुगतान की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से बनती है।

हाईकोर्ट का बीमा कंपनी पर फैसला

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और बीमा पॉलिसी की शर्तों का विश्लेषण करते हुए पाया कि वाहन के मालिक ने यात्रियों के जोखिम को कवर करने के लिए अतिरिक्त प्रीमियम जमा किया था। इसलिए अदालत ने कहा कि बीमा कंपनी मुआवजा भुगतान से बच नहीं सकती।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि बीमा कंपनी अतिरिक्त प्रीमियम लेकर जोखिम स्वीकार करती है, तो बाद में तकनीकी आधार पर जिम्मेदारी से मुकरना न्यायसंगत नहीं है। परिणामस्वरूप, बीमा कंपनी की अपीलों को खारिज कर दिया गया।

पुनर्विवाह का प्रश्न और कानूनी सिद्धांत

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मृतक की पत्नी के पुनर्विवाह से जुड़ा था।

ट्रिब्यूनल ने पहले कुल मुआवजे का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पत्नी को दिया था, जबकि बेटी और मां को कम हिस्सेदारी 15–15 प्रतिशत मिली थी। बाद में यह तथ्य सामने आया कि पत्नी ने पुनर्विवाह कर लिया और नाबालिग बेटी अपने दादा-दादी के साथ रहने लगी।

इस पर दावेदारों ने अदालत से मांग की कि मुआवजे का बड़ा हिस्सा नाबालिग बेटी को दिया जाए, क्योंकि उसके पालन-पोषण और भविष्य की जिम्मेदारी अब दादा-दादी पर है।

हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर विस्तार से विचार करते हुए कहा कि विधवा का पुनर्विवाह उसके मुआवजा अधिकार को समाप्त नहीं करता।

कोर्ट ने कहा कि पति की मृत्यु से जो आर्थिक और मानसिक क्षति हुई, उसका अधिकार उसी समय स्थापित हो जाता है और बाद में विवाह करने से वह अधिकार खत्म नहीं होता।

हाईकोर्ट ने कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पुनर्विवाह को मुआवजा अधिकार समाप्त करने का आधार बनाना सार्वजनिक नीति के खिलाफ होगा।

नाबालिग बेटी का बढ़ाया हिस्सा

हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पुनर्विवाह के बाद पत्नी मृतक के परिवार पर निर्भर नहीं रही और नाबालिग बच्चे की जिम्मेदारी अन्य आश्रितों पर आ गई हो, तो अदालत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मुआवजा वितरण में बदलाव कर सकती है।

इस मामले में अदालत ने पाया कि नाबालिग बेटी अपने दादा-दादी के साथ रह रही है और उसकी शिक्षा, पालन-पोषण तथा भविष्य की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। इसलिए बेटी के हितों की रक्षा के लिए मुआवजा वितरण में संशोधन आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश में संशोधन करते हुए पुनर्विवाह कर चुकी पत्नी के हिस्से को 70 से कम कर 40 प्रतिशत हिस्सा देने का आदेश दिया है।

वहीं नाबालिग बेटी को 45 प्रतिशत और मृतक की मां (दादी) को 15 प्रतिशत देने का आदेश दिया है।

अदालत ने कहा कि नाबालिग बेटी की शिक्षा, भविष्य और विवाह जैसी जरूरतों को देखते हुए उसके हिस्से में वृद्धि करना न्यायसंगत है।

मुआवजा राशि में भी बढ़ोतरी

हाईकोर्ट ने मृतक की आय का पुनर्मूल्यांकन करते हुए यह माना कि मजदूर की मासिक आय की गणना 26 दिनों के बजाय 30 दिनों के आधार पर होनी चाहिए।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट के प्रकरणों के अनुसार प्रत्येक आश्रित को अलग-अलग “लॉस ऑफ कंसोर्टियम” राशि देने का निर्देश दिया।

इन आधारों पर कुल मुआवजा बढ़ाकर लगभग 9.83 लाख रुपये किया गया और पहले दिए गए मुआवजे से अतिरिक्त राशि भी प्रदान करने का आदेश दिया गया।

अन्य अपीलों पर भी आदेश

दूसरे मृतक से संबंधित मामले में भी अदालत ने इसी सिद्धांत के आधार पर मुआवजा बढ़ाया और आश्रितों को अतिरिक्त भुगतान देने का आदेश दिया।

साथ ही बीमा कंपनी को निर्देश दिया गया कि बढ़ी हुई राशि चार सप्ताह के भीतर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित जमा कराए।

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