हाईकोर्ट ने कहा अदालतों के हस्तक्षेप का दायरा सीमित, लेकिन टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होने पर न्यायिक समीक्षा आवश्यक।
जोधपुर। प्रदेश के एकमात्र हिल स्टेशन और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल माउंट आबू की नक्की झील पर बोटिंग संचालित करने के बहुचर्चित टेंडर विवाद के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए वर्ष 2025–2028 के लिए जारी विवादित निविदा—टेंडर (NIT) को रद्द कर दिया है।
जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकलपीठ ने Ujjain Dreams की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए आबूरोड़ नगर निकाय को आदेश दिया है कि वह राजस्थान पारदर्शिता सार्वजनिक खरीद अधिनियम, 2012 तथा नियम, 2013 के प्रावधानों का पालन करते हुए दो माह के भीतर नई टेंडर प्रक्रिया पूरी करे।
अदालतों के सीमित अधिकार, लेकिन ….
एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए कानूनी बिंदु तय करते हुए स्पष्ट किया कि —
टेंडर प्रक्रियाएं प्रशासनिक और तकनीकी प्रकृति की होती हैं, इसलिए सामान्यतः अदालतें इन मामलों में सीमित हस्तक्षेप करती हैं। हालांकि, यदि प्रक्रिया में मनमानी, पक्षपात, अवैधता या नियमों का उल्लंघन दिखाई दे तो न्यायिक समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी बोलीदाता को अनुबंध मिलने का स्वतः अधिकार नहीं होता; निविदा केवल एक प्रस्ताव होती है, जिसे स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार निविदा जारी करने वाली संस्था के पास होता है।
यह है मामला
इस पूरे विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब नगर निकाय द्वारा नक्की लेक में बोटिंग सेवा संचालन के लिए वर्ष 2025 से 2028 तक के लिए निविदा आमंत्रित की गई।
इस निविदा प्रक्रिया में विभिन्न कंपनियों ने भाग लिया, जिनमें याचिकाकर्ता फर्म Ujjain Dreams भी शामिल थी।
तकनीकी मूल्यांकन के बाद याचिकाकर्ता की बोली को “नॉन-रिस्पॉन्सिव” घोषित कर दिया गया, जबकि दूसरी कंपनी को पात्र मानते हुए अनुबंध दे दिया गया।
याचिकाकर्ता ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की और आरोप लगाया कि निविदा प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएँ हुई हैं, नियमों का पालन नहीं किया गया तथा टेंडर शर्तों में ऐसे बदलाव किए गए जिनसे प्रतिस्पर्धा प्रभावित हुई।
याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने दलील देते हुए दावा किया कि उसके पास आवश्यक अनुभव और पात्रता मौजूद थी, फिर भी तकनीकी समिति ने बिना उचित कारण उसकी बोली को अयोग्य घोषित कर दिया।
अधिवक्ता ने दलील दी कि प्री-बिड बैठक के बाद कुछ शर्तों में बदलाव किया गया, जिससे कुछ विशेष बोलीदाताओं को लाभ मिला।
अधिवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि निविदा की निर्धारित आधार कीमत से काफी कम बोली स्वीकार करना सार्वजनिक खरीद नियमों और राजस्व हितों के विरुद्ध है।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि तकनीकी मूल्यांकन के बाद केवल एक ही बोलीदाता योग्य बचा, ऐसे में संबंधित नियमों के अनुसार प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, जो नहीं अपनाई गई।
याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि सफल बोलीदाता के पास आवश्यक अनुभव और वित्तीय प्रमाणपत्र पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं थे।
सरकार-प्रतिवादियों का पक्ष
राज्य सरकार, आबूरोड़ नगर निकाय और सफल बोलीदाता ने याचिका का विरोध करते हुए अदालत में कहा कि पूरी निविदा प्रक्रिया कानून और नियमों के अनुसार हुई है।
सरकार के अधिवक्ताओं ने कहा कि निविदा शर्तों के अनुसार तीन वर्ष का आवश्यक अनुभव प्रमाणित करना जरूरी था, जो याचिकाकर्ता साबित नहीं कर पाया।
सरकार ने यह भी दावा किया कि चयनित कंपनी ने सभी आवश्यक अनुभव, सॉल्वेंसी और अन्य प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए, इसलिए उसे योग्य घोषित किया गया।
सरकार ने बताया कि आवश्यक प्रक्रिया अपनाकर बातचीत (Negotiation) के बाद बोली दर संशोधित की गई और प्रशासनिक दृष्टि से यह निर्णय उचित पाया गया।
सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अदालत को केवल निर्णय-प्रक्रिया की वैधता देखनी चाहिए, व्यावसायिक निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि तकनीकी मूल्यांकन के बाद केवल एक ही बोलीदाता योग्य पाया गया था। ऐसी स्थिति में नियमों के अनुसार प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए गए थे और प्राप्त बोली का मूल्य उचित है।
हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक खरीद प्रणाली का मूल उद्देश्य पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने कहा कि यदि प्रतिस्पर्धा सीमित हो जाती है तो प्राधिकरण को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए और अपने निर्णय के कारण रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज करने चाहिए।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि संबंधित निविदा प्रक्रिया में कई ऐसे पहलू थे जिनके कारण प्रक्रिया की वैधता पर प्रश्न उठते हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और जवाबदेही सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है और इन सिद्धांतों से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि टेंडर प्रक्रिया में प्रशासनिक निर्णयों को अदालत द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता, लेकिन यदि निर्णय-प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं हो तो हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।
टेंडर निरस्त करने का आदेश
हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों और दलीलों के आधार पर नक्की लेक बोटिंग सेवाओं के संचालन के लिए जारी विवादित निविदा सूचना (NIT)-टेंडर को रद्द करने का फैसला दिया।
साथ ही आबूरोड़ नगर निकाय को आदेश दिया कि वह विधि के अनुरूप नई निविदा जारी करे और पूरी प्रक्रिया दो माह के भीतर पूरी करे।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नई निविदा जारी करते समय प्राधिकरण अपनी तकनीकी और प्रशासनिक विशेषज्ञता का प्रयोग करते हुए निविदा की शर्तें, पात्रता मानदंड और प्रतिस्पर्धात्मक आधार दर पूरी तरह कानून के अनुरूप निर्धारित करे।