पॉलिसी में छूट की शर्त होने पर ब्याज की पूरी जिम्मेदारी नियोक्ता पर; आयुक्त के आदेश में संशोधन, बीमा कंपनी को आंशिक राहत
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति के मामले में बीमा कंपनी हर स्थिति में ब्याज देने के लिए बाध्य नहीं होगी।
अगर बीमा पॉलिसी में साफ लिखा है कि ब्याज की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की नहीं है, तो उस स्थिति में ब्याज का भुगतान केवल नियोक्ता (कंपनी/मालिक) को ही करना होगा।
जस्टिस उमाशंकर व्यास की एकलपीठ ने यह आदेश Future General India Insurance Company की ओर से दायर अपील पर दिया हैं.
क्या है मामला
यह मामला फ्यूचर जनरल इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की ओर से दायर अपील से जुड़ा है।
कोटा की K.S. Oil Ltd. के मृतक कर्मचारी मुकेश की मौत के बाद उसकी पत्नी और नाबालिग बेटे ने कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत दावा किया था।
कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त, कोटा ने 5 फरवरी 2021 को आदेश देते हुए 5,92,184 रुपये की क्षतिपूर्ति राशि के साथ 18 फरवरी 2015 से 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और 20 प्रतिशत पेनल्टी देने का आदेश दिया।
आयुक्त ने यह पूरा भुगतान बीमा कंपनी और नियोक्ता दोनों पर डाल दिया था। इसी आदेश को बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
बीमा कंपनी की ओर से कहा गया कि जिस बीमा पॉलिसी के तहत नियोक्ता ने बीमा कराया था, उसमें स्पष्ट शर्त थी कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत देय राशि पर लगने वाले ब्याज की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की नहीं होगी।
विवाद का मूल मुद्दा
इस पूरे मामले का मुख्य सवाल यह था कि क्या बीमा कंपनी को कर्मचारी क्षतिपूर्ति की राशि पर लगने वाला ब्याज भी देना होगा, यदि पॉलिसी में उससे छूट दी गई हो?
इसी कानूनी प्रश्न पर दोनों पक्षों की ओर से अपनी दलीलें दी गईं।
बीमा कंपनी का पक्ष
फ्यूचर जनरल इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की ओर से अधिवक्ता Chanderdeep Singh Jodha हाईकोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त ने कानून और बीमा पॉलिसी की शर्तों की अनदेखी करते हुए ब्याज की राशि भी बीमा कंपनी पर डाल दी, जो पूरी तरह गलत है।
कंपनी ने कहा कि नियोक्ता और बीमा कंपनी के बीच हुई पॉलिसी में साफ लिखा है कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923 के तहत देय राशि पर लगने वाले ब्याज की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की नहीं होगी।
यानी मूल मुआवजा (Compensation) की राशि का भुगतान बीमा कंपनी कर सकती है, लेकिन ब्याज (Interest) देना उसकी जिम्मेदारी नहीं है।
आयुक्त ने बिना पॉलिसी की शर्तों पर ठीक से विचार किए बीमा कंपनी पर 12% वार्षिक ब्याज की जिम्मेदारी डाल दी, जो अनुबंध के खिलाफ है।
बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि यदि बीमा अनुबंध में ब्याज से छूट दी गई है, तो बीमा कंपनी को ब्याज देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
कंपनी ने दलील दी कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत मूल दायित्व नियोक्ता का होता है। बीमा कंपनी केवल अनुबंध की सीमा तक जिम्मेदार होती है। इसलिए ब्याज की रकम केवल नियोक्ता से वसूल की जानी चाहिए।
बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट से मांग की कि आयुक्त के आदेश में संशोधन कर ब्याज की देनदारी उससे हटाई जाए।
कर्मचारी के परिजनों का पक्ष
दूसरी ओर मृत कर्मचारी की पत्नी और नाबालिग पुत्र की ओर से यह तर्क दिया गया कि बीमा कंपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
अधिवक्ता ने कहा कि जब नियोक्ता ने कर्मचारी की सुरक्षा के लिए बीमा कराया है, तो मुआवजा और उससे जुड़ी पूरी देनदारी — जिसमें ब्याज भी शामिल है — बीमा कंपनी को ही वहन करनी चाहिए।
दावेदारों ने कहा कि यदि समय पर भुगतान नहीं होता, तो ब्याज देना कानूनन अनिवार्य है। इसलिए ब्याज भी प्रतिकर (Compensation) का हिस्सा माना जाना चाहिए।
अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए बताया कि जहां बीमा पॉलिसी ली गई है, वहां बीमा कंपनी भी प्रतिकर की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती।
प्रतिवादियों ने कहा कि कर्मचारी क्षतिपूर्ति आयुक्त का आदेश तथ्यों और कानून के अनुरूप है और उसमें किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने बीमा पॉलिसी की शर्तों और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि जब अनुबंध (पॉलिसी) में साफ लिखा है कि ब्याज का भुगतान बीमा कंपनी नहीं करेगी, तो उस शर्त को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी और नियोक्ता के बीच हुआ अनुबंध कानूनी रूप से बाध्यकारी है और उसी के आधार पर जिम्मेदारी तय होगी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आयुक्त ने पॉलिसी की शर्तों पर ठीक से विचार किए बिना बीमा कंपनी पर ब्याज की जिम्मेदारी डाल दी, जो सही नहीं है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मूल क्षतिपूर्ति राशि का भुगतान बीमा कंपनी कर सकती है, लेकिन ब्याज की जिम्मेदारी पॉलिसी की शर्तों पर निर्भर करेगी।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए अपने आदेश में साफ कर दिया कि क्षतिपूर्ति राशि पर लगने वाला ब्याज बीमा कंपनी नहीं देगी। यह रकम केवल नियोक्ता से वसूली जाएगी।
साथ ही, अगर बीमा कंपनी ने पहले से कोई ब्याज राशि जमा कर दी है, तो उसे वह राशि वापस लेने का अधिकार होगा। हालांकि, मूल क्षतिपूर्ति राशि देने का आदेश बरकरार रखा गया है।