टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

कस्टडी विवाद में हर बार बच्चे की मानसिक जांच जरूरी नहीं, चाइल्ड केस में ‘कम से कम हस्तक्षेप’ का सिद्धांत अपनाएं कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court Grants Relief To Employees, Says Recruitment Cannot Be Cancelled Due To Officials' Procedural Lapses
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन शोषण के आरोप वाले मामलों में बच्चे को बार-बार जांच प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बच्चे के जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप ही सामान्य नियम होना चाहिए।

नई दिल्ली: बच्चों की कस्टडी, मुलाकात के अधिकार (विजिटेशन राइट्स) और अभिभावकीय पहुंच (पेरेंटल एक्सेस) से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच केवल तभी कराई जानी चाहिए जब वह वास्तव में आवश्यक हो।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेष रूप से उन मामलों में, जहां बच्चा कथित यौन शोषण का पीड़ित हो, वहां उसे बार-बार जांच, मूल्यांकन और अन्य प्रक्रियाओं से नहीं गुजरना चाहिए क्योंकि इससे उसे अतिरिक्त मानसिक आघात पहुंच सकता है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने कहा कि:

कोर्ट को ऐसे मामलों में “न्यूनतम हस्तक्षेप” के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। Supreme Court ने यह भी कहा कि बच्चे की मानसिक स्थिति का मूल्यांकन करने से पहले माता-पिता की मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति को समझना अधिक जरूरी हो सकता है।

फैसला एक ऐसे मामले में आया है जिसमें एक नाबालिग बच्ची फिलहाल अपनी मां की अभिरक्षा में रह रही है, जबकि पिता के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत यौन शोषण का मामला लंबित है। इसी पृष्ठभूमि में यह विवाद उठा था कि बच्ची की मनोवैज्ञानिक जांच कराई जाए या नहीं।

यह भी पढ़ें: सरकारी नौकरी में पोस्टिंग पसंद से नहीं, प्रशासनिक जरूरत से तय होगी: राजस्थान हाईकोर्ट ने कर्मचारी को नहीं दी राहत, कहा-‘ट्रांसफर सर्विस का हिस्सा’

क्या था पूरा मामला?

मामला पति-पत्नी के बीच चल रहे कस्टडी विवाद से जुड़ा है। बच्ची वर्तमान में अपनी मां के साथ रह रही है। दूसरी ओर पिता अपनी बेटी से मुलाकात और अभिभावकीय अधिकारों की मांग कर रहे हैं।

इसी दौरान पिता के खिलाफ बच्ची के यौन शोषण के आरोप लगाए गए और पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज हुआ। यह मामला अभी विचाराधीन है और कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इन आरोपों की सत्यता पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है।

कस्टडी विवाद की सुनवाई के दौरान यह प्रश्न उठा कि बच्ची की वर्तमान मानसिक स्थिति क्या है, वह अपने पिता के प्रति क्या महसूस करती है और क्या उसके व्यवहार पर किसी प्रकार का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है।

इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट ने विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों का एक पैनल गठित कर बच्ची का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कराने का आदेश दिया था।

इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई चिंता?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी बच्चे, विशेष रूप से यौन शोषण के कथित पीड़ित बच्चे, को बार-बार जांच प्रक्रियाओं से गुजरने के लिए मजबूर करना उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

कोर्ट ने पॉक्सो अधिनियम, 2012 की मूल भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कानून इस सिद्धांत पर आधारित है कि यौन शोषण से पीड़ित बच्चे को ऐसी किसी भी प्रक्रिया से बचाया जाना चाहिए जिससे उसे दोबारा भावनात्मक कष्ट, मानसिक आघात या “सेकेंडरी विक्टिमाइजेशन” का सामना करना पड़े।

कोर्ट ने कहा कि कई बार न्यायिक प्रक्रिया स्वयं बच्चे के लिए तनाव का कारण बन जाती है। ऐसे में अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय पाने की प्रक्रिया बच्चे की मानसिक स्थिति को और अधिक प्रभावित न करे।

पीठ ने टिप्पणी की कि जब कोर्ट किसी बच्चे के संबंध में निर्णय ले रही होती है तो वह केवल एक न्यायिक संस्था नहीं रहती, बल्कि बच्चे की संरक्षक यानी पैरेंस पेट्रिए की भूमिका भी निभाती है। इसलिए उसे अतिरिक्त संवेदनशीलता और सावधानी बरतनी होती है।

यह भी पढ़ें: महेश जोशी की गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट में कल निर्णायक सुनवाई, सरकार का दावा-‘दो मंचों पर एक ही राहत नहीं मांग सकते’; याचिका खारिज करने की मांग

NIMHANS की रिपोर्टों ने क्या बताया?

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं स्नायु विज्ञान संस्थान (NIMHANS) के विशेषज्ञों द्वारा तैयार रिपोर्टों का भी अध्ययन किया।

इन रिपोर्टों में बताया गया कि कस्टडी विवाद केवल बच्चों को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि माता-पिता की मानसिक स्थिति भी बच्चों के व्यवहार और भावनात्मक विकास पर गहरा असर डालती है।

रिपोर्टों में माता-पिता और बच्चों के रिश्ते, पारिवारिक तनाव, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां, बच्चों की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं, स्कूल से जुड़े प्रभाव और जीवन में होने वाले बदलावों को विस्तार से रेखांकित किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों की कस्टडी और मुलाकात संबंधी मामलों को केवल बच्चे के दृष्टिकोण से नहीं देखा जा सकता। ऐसे मामलों में माता-पिता की मानसिक स्थिति, उनके व्यवहार और उनके आपसी संबंधों का भी महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

कोर्ट ने माना कि कई बार बच्चे की परेशानी का कारण स्वयं माता-पिता के बीच चल रहा विवाद होता है। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरे पारिवारिक माहौल को समझना आवश्यक है।

हाईकोर्ट के आदेश में बदलाव

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश में अहम बदलाव करते हुए कहा कि फिलहाल बच्ची का सीधा मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन कराना उचित नहीं होगा।

इसके बजाय कोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह पहले एक मनोवैज्ञानिक नियुक्त करे जो दोनों माता-पिता की मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति का आकलन करे। अदालत ने विशेष रूप से मां की मानसिक स्थिति का भी मूल्यांकन करने को कहा क्योंकि बच्ची फिलहाल उसकी अभिरक्षा में रह रही है।

नियुक्त मनोवैज्ञानिक को यह भी निर्देश दिया गया कि वह उस विशेषज्ञ से बातचीत करे जो पहले से बच्ची का इलाज या परामर्श कर रहा है। इसके बाद वह अपनी रिपोर्ट फैमिली कोर्ट को सौंपे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट इस रिपोर्ट के आधार पर तय करेगा कि बच्ची की अलग से मनोवैज्ञानिक जांच वास्तव में आवश्यक है या नहीं। यदि रिपोर्ट से यह संकेत मिले कि ऐसी जांच जरूरी नहीं है, तो बच्ची को किसी अतिरिक्त प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहिए।

यह भी पढ़ें: आबकारी विभाग के पुनर्गठन पर राजस्थान हाईकोर्ट की रोक, सरकार के 1 जून के आदेशों की क्रियान्विति स्थगित

जांच जरूरी हो तो भी ‘न्यूनतम हस्तक्षेप’ का पालन हो

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी स्थिति में बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच जरूरी हो जाती है, तो उसे बेहद सावधानी और सीमित दायरे में किया जाना चाहिए।

कोर्ट के निर्देशों के अनुसार:

  • जांच किसी इंडिपेंडेंट चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट द्वारा की जाए।
  • यह प्रक्रिया बच्चे का इलाज कर रहे मनोवैज्ञानिक के साथ समन्वय में हो।
  • बच्चे के साथ न्यूनतम बातचीत हो, ताकि उसकी मानसिक स्थिति पर असर न पड़े।

इसके साथ ही अदालत ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह समय-समय पर इस बात की समीक्षा करता रहे कि बच्चे की मनोवैज्ञानिक जांच की आवश्यकता बनी हुई है या नहीं, क्योंकि बच्चों की मानसिक और भावनात्मक जरूरतें समय के साथ बदल सकती हैं।

कोर्ट ने पक्षकारों को यह स्वतंत्रता भी दी कि परिस्थितियों में बदलाव होने पर वे कस्टडी और मुलाकात अधिकारों से जुड़े आदेशों में संशोधन की मांग कर सकते हैं।

पैरेंटल एलियनेशन’ और ‘फॉल्स मेमोरी’ पर भी कोर्ट की नजर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एक और महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रकाश डाला। कोर्ट ने कहा कि कस्टडी विवादों में कई बार ‘पेरेंटल एलिएनेशन सिंड्रोम’ और ‘फॉल्स मेमोरी क्रिएशन’ जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं।

‘पेरेंटल एलिएनेशन सिंड्रोम’ ऐसी स्थिति को कहा जाता है जब एक अभिभावक बच्चे को दूसरे अभिभावक के खिलाफ प्रभावित करने की कोशिश करता है। इसके परिणामस्वरूप बच्चा बिना किसी ठोस कारण के दूसरे अभिभावक के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण विकसित कर सकता है।

वहीं ‘फॉल्स मेमोरी क्रिएशन’ का अर्थ है बच्चे के मन में ऐसी यादें या धारणाएं विकसित हो जाना जो वास्तविक घटनाओं पर आधारित न हों।

कोर्ट ने कहा कि बच्ची फिलहाल अपनी मां की सुरक्षित अभिरक्षा में है, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उसके मन में किसी प्रकार का कृत्रिम पूर्वाग्रह विकसित न हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि इस पहलू की जानकारी बच्चे का इलाज कर रहे मनोवैज्ञानिक की रिपोर्ट से प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए हर बार बच्चे से सीधे बातचीत करना जरूरी नहीं है।

कोई एक फार्मूला सभी मामलों पर लागू नहीं होगा: SC

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियों को सभी मामलों पर लागू होने वाले कठोर दिशा-निर्देश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि बच्चों की मानसिक स्थिति, भावनात्मक प्रतिक्रियाएं और कल्याण से जुड़े मामलों में कोई एक समान फार्मूला नहीं हो सकता। प्रत्येक बच्चा अलग होता है और हर मामले की परिस्थितियां भी अलग होती हैं।

पीठ ने कहा कि एक ही बच्चा अलग-अलग समय पर अलग तरह की प्रतिक्रिया दे सकता है। इसलिए अदालतों को हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेना होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों से जुड़े मामलों में लचीला दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है ताकि उनके सर्वोत्तम हितों की रक्षा की जा सके।

यह भी पढ़ें: ‘अप्रूवर की गवाही पर भी हो सकती है सजा’, भरोसेमंद हो तो सहयोगी आरोपी का बयान भी बन सकता है सजा का आधार: सुप्रीम कोर्ट

फैमिली कोर्ट करेगा नए सिरे से विचार

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनः विचार के लिए फैमिली कोर्ट को भेज दिया है, ताकि वह सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए नया निर्णय ले सके और कहा कि वह शीर्ष अदालत की टिप्पणियों तथा निर्देशों के आधार पर नए सिरे से विचार करे।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पिता के खिलाफ लंबित पॉक्सो मामले की प्रगति से फैमिली कोर्ट को लगातार अवगत कराया जाए क्योंकि उस मामले का असर कस्टडी और मुलाकात अधिकारों से जुड़े निर्णयों पर पड़ सकता है।

इस फैसले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि बच्चों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता सर्वोपरि है। कोर्ट्स को यह सुनिश्चित करना होगा कि न्यायिक प्रक्रिया स्वयं बच्चे के लिए एक नया मानसिक बोझ न बन जाए और उसकी भलाई हमेशा केंद्र में बनी रहे।

अंत में कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके ये निर्देश किसी कठोर नियम की तरह लागू नहीं होंगे। हर केस की परिस्थितियां अलग होती हैं, और बच्चों की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं भी समय के साथ बदलती रहती हैं।

सबसे अधिक लोकप्रिय