जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के सर्विस रिकॉर्ड में जन्मतिथि बदलने से जुड़े मामलों पर अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि रिकॉर्ड से पहली नजर में ही दस्तावेजों में हेराफेरी दिखाई देती है, तो कोर्ट ऐसे मामले में राहत नहीं दे सकती।
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ बाद में दावा करने से जन्मतिथि नहीं बदली जा सकती। अगर सर्विस रिकॉर्ड और मूल दस्तावेज कुछ और बताते हैं, तो उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस मामले में पाया कि कर्मचारी ने दावा किया था कि विभाग ने उसकी जन्मतिथि गलत दर्ज कर दी, लेकिन जब कोर्ट ने मेन सर्विस रिकॉर्ड मंगाकर देखा तो उसमें कर्मचारी ने खुद अपनी जन्मतिथि 5 जून 1966 लिखी हुई थी। इतना ही नहीं, कोर्ट को मेन ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) में भी जन्मतिथि और उम्र के कॉलम में साफ हेराफेरी दिखाई दी।
जस्टिस रेखा बोराना की एकल पीठ ने इन तथ्यों के आधार पर कर्मचारी रूपनारायण मीणा की याचिका खारिज कर दी और कहा कि रिकॉर्ड में साफ दिखाई दे रही हेराफेरी के बाद इस याचिका पर विचार करने का कोई आधार नहीं बचता।
सेवा रिकॉर्ड में बदलाव को लेकर विवाद
यह मामला राजस्थान स्टेट गंगानगर शुगर मिल्स लिमिटेड में कार्यरत कर्मचारी रूपनारायण मीणा से जुड़ा था। उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की कि उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि 5 जून 1966 की जगह 5 जून 1967 की जाए।
कर्मचारी का कहना था कि विभाग ने नियुक्ति के समय गलती से गलत जन्मतिथि दर्ज कर दी थी। इसी वजह से उन्हें 30 जून 2026 को समय से पहले रिटायर किया जा रहा है। उन्होंने कोर्ट से जन्मतिथि में सुधार करने और उसी आधार पर रिटायरमेंट रोकने की मांग की।
याचिकाकर्ता कर्मचारी ने क्या दलील दी?
कर्मचारी की ओर से कहा गया कि नौकरी के समय विभाग को जो दस्तावेज दिए गए थे, उनमें उनकी जन्मतिथि 5 जून 1967 दर्ज थी।
उन्होंने दावा किया कि स्कूल सर्टिफिकेट और जन्मतिथि प्रमाणपत्र, दोनों में यही तारीख दर्ज थी, लेकिन विभाग ने गलती से सर्विस रिकॉर्ड में 5 जून 1966 लिख दिया। सुनवाई के दौरान कर्मचारी के वकील ने यह भी कहा कि इसी गलती की वजह से विभाग उन्हें 30 जून 2026 को रिटायर करने जा रहा है।
इसी वजह से कर्मचारी ने कोर्ट से कहा कि उसकी सही जन्मतिथि सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज की जाए और रिटायरमेंट की प्रक्रिया रोका जाए।
कोर्ट ने मांगा मूल रिकॉर्ड, सामने आई सच्चाई
कर्मचारी की दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विभाग से कर्मचारी का मूल सर्विस रिकॉर्ड मंगवाया और अगले ही दिन मामले की फिर सुनवाई की। अगले दिन सुनवाई के दौरान विभाग ने कर्मचारी का मूल सर्विस रिकॉर्ड कोर्ट के सामने रखा।
कोर्ट ने जब रिकॉर्ड देखा तो पाया कि सर्विस रिकॉर्ड में जन्मतिथि वाला कॉलम खुद कर्मचारी ने भरा था और उसमें उसने अपनी जन्मतिथि 5 जून 1966 लिखी थी।
यानी कर्मचारी का अपना सर्विस रिकॉर्ड ही उसके दावे से मेल नहीं खा रहा था। यहीं पर कर्मचारी की दलील कमजोर पड़ गई, क्योंकि उसके अपने सर्विस रिकॉर्ड में अलग जन्मतिथि दर्ज थी।
कोर्ट ने ट्रांसफर सर्टिफिकेट में हेरफेरी पाई
हाईकोर्ट ने इसके बाद कर्मचारी का मूल ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) भी देखा। कोर्ट ने कहा कि टीसी में जन्मतिथि के साथ-साथ उम्र वाले कॉलम में भी साफ हेराफेरी दिखाई दे रही है।
कोर्ट ने कहा कि दस्तावेज में की गई हेराफेरी इतनी साफ थी कि उसे बिना किसी जांच के भी समझा जा सकता था। यानी रिकॉर्ड देखकर ही यह साफ हो रहा था कि दस्तावेज में बदलाव किया गया है।
इसी वजह से कोर्ट ने कर्मचारी की इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि विभाग ने गलती से गलत जन्मतिथि दर्ज की थी।
अंतिम फैसला: याचिका खारिज, कोई राहत नहीं
इन सभी तथ्यों को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिका स्वीकार करने का कोई आधार नहीं बनता।
कोर्ट ने माना कि जब मूल सर्विस रिकॉर्ड में कर्मचारी ने खुद अपनी जन्मतिथि 5 जून 1966 लिखी है और ट्रांसफर सर्टिफिकेट में भी साफ हेराफेरी दिखाई दे रही है, तब जन्मतिथि बदलने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने रूपनारायण मीणा की याचिका खारिज कर दी।
यानी कर्मचारी की जन्मतिथि बदलने की मांग कोर्ट ने नहीं मानी। इसके साथ ही रिटायरमेंट पर रोक लगाने से भी इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद कर्मचारी की जन्मतिथि पहले की तरह ही रहेगी और उसका रिटायरमेंट भी तय तारीख पर होगा।
सरकारी कर्मचारियों के लिए स्पष्ट संदेश
राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के सर्विस रिकॉर्ड से जुड़े मामलों के लिए अहम है।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि नौकरी के आखिरी समय में केवल यह कह देने से कि जन्मतिथि गलत दर्ज हो गई थी, रिकॉर्ड में बदलाव नहीं किया जा सकता। यदि कर्मचारी खुद सर्विस रिकॉर्ड में कोई जानकारी भर चुका है, तो बाद में उसे बदलने के लिए मजबूत और भरोसेमंद सबूत पेश करने होंगे।
यह फैसला यह भी बताता है कि ऐसे मामलों में कोर्ट केवल दलीलों के आधार पर फैसला नहीं करती। जरूरत पड़ने पर मूल सर्विस रिकॉर्ड और मूल दस्तावेज मंगाकर उनकी जांच भी करती है।
साथ ही यह आदेश यह संदेश भी देता है कि यदि रिकॉर्ड में हेराफेरी या दस्तावेजों में बदलाव के संकेत मिलते हैं, तो कोर्ट ऐसे दावों को स्वीकार करने के बजाय रिकॉर्ड की विश्वसनीयता को प्राथमिकता देगी।
यानी आगे यदि कोई कर्मचारी नौकरी के अंतिम दौर में जन्मतिथि बदलने की मांग करता है, तो उसे यह साबित करना होगा कि रिकॉर्ड में वास्तव में विभाग की गलती हुई थी। यदि मूल रिकॉर्ड उसके दावे का समर्थन नहीं करता या दस्तावेजों में हेराफेरी दिखाई देती है, तो कोर्ट से राहत मिलना आसान नहीं होगा.
