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बीमा क्लेम पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बीमा पॉलिसी सिर्फ बीमा लेने वाले और कंपनी के बीच का कॉन्ट्रैक्ट, तीसरा पक्ष नहीं कर सकता बीमा रकम पर दावा

Supreme Court Clarifies Insurance Contracts Bind Only Insurer And Policyholder

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बीमा क्लेम से जुड़े एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि बीमा पॉलिसी सिर्फ बीमा लेने वाले और बीमा कंपनी के बीच का एक निजी कॉन्ट्रैक्ट होती है।

अगर किसी तीसरे व्यक्ति का बीमा कंपनी से सीधा कानूनी संबंध नहीं है, तो वह उस पॉलिसी के आधार पर बीमा रकम पर दावा नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि किसी व्यक्ति का उस संपत्ति या वाहन से आर्थिक संबंध था।

जब तक बीमा कंपनी के साथ उसका सीधा कानूनी रिश्ता नहीं होगा, तब तक वह बीमा क्लेम का हकदार नहीं माना जाएगा। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने एक फाइनेंसर की अपील खारिज कर दी।

यह फैसला जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने सुनाया।

कोर्ट ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसले को सही माना और कहा कि इस मामले में बीमा कंपनी को फाइनेंसर को क्लेम देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

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एक वाहन चोरी से शुरू हुआ पूरा विवाद

मामला एक वाहन से जुड़ा था। इस मामले में के. प्रकाशचंद एक फाइनेंसर थे।

उन्होंने सोमशेखर नाम के व्यक्ति को वाहन खरीदने के लिए कर्ज दिया था। जिस वाहन के लिए कर्ज दिया गया, उसका बीमा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से कराया गया था।

कुछ समय बाद सोमशेखर आर्थिक परेशानी में आ गया और वह कर्ज की किस्तें नहीं चुका सका।

फाइनेंसर के. प्रकाशचंद का कहना था कि इसके बाद सोमशेखर ने वाहन उनके पास छोड़ दिया। इसी दौरान वाहन चोरी हो गया। पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई, लेकिन काफी तलाश के बाद भी वाहन नहीं मिला।

इसके बाद फाइनेंसर के. प्रकाशचंद ने बीमा कंपनी से क्लेम मांगा। उनका कहना था कि वाहन उनके कब्जे में था और उसमें उनका आर्थिक हित भी जुड़ा था, इसलिए बीमा रकम उन्हें मिलनी चाहिए।

उसने यह भी कहा कि अगर बाद में बीमा लेने वाला व्यक्ति कोई दावा करेगा, तो वह जरूरी दस्तावेज देने को तैयार है।

लेकिन बीमा कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम देने से इनकार कर दिया कि उसका के. प्रकाशचंद के साथ कोई सीधा कॉन्ट्रैक्ट नहीं है।

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पहले दो जगह मिली राहत, फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

फाइनेंसर ने बीमा कंपनी के फैसले को चुनौती देते हुए जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

सबसे पहले जिला उपभोक्ता फोरम ने के. प्रकाशचंद के पक्ष में फैसला दिया। फोरम ने माना कि यह मामला हाइपोथिकेशन का है, न कि हायर-पर्चेज का।

फोरम ने माना कि वाहन कर्ज के बदले सुरक्षा के तौर पर रखा गया था। इसलिए फाइनेंसर के. प्रकाशचंद का भी उस वाहन में आर्थिक हित था।

इसी आधार पर फोरम ने बीमा कंपनी को करीब 5.28 लाख रुपये का क्लेम देने का आदेश दिया। बाद में राज्य उपभोक्ता आयोग ने भी यही फैसला बरकरार रखा।

लेकिन राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने दोनों फैसले पलट दिए। आयोग ने कहा कि फाइनेंसर और वाहन मालिक के बीच जो समझौता हुआ था, उसका हिस्सा बीमा कंपनी नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि फाइनेंसर और वाहन मालिक के बीच हुए समझौते का कोई दस्तावेज भी रिकॉर्ड में पेश नहीं किया गया। ऐसे में बीमा कंपनी को उस समझौते का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

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फाइनेंसर ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी ?

फाइनेंसर के. प्रकाशचंद ने कहा कि यह सिर्फ सामान्य कर्ज का मामला नहीं था। वाहन उसके हित में गिरवी रखा गया था। इसलिए अगर वाहन चोरी हो गया तो बीमा रकम पर उसका भी अधिकार बनता है।

उसने यह भी कहा कि बीमा पॉलिसी में हाइपोथिकेशन का जिक्र था। इसलिए बीमा कंपनी बाद में यह नहीं कह सकती कि उसका फाइनेंसर से कोई संबंध नहीं है।

फाइनेंसर ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि जब तक पूरा कर्ज नहीं चुकाया जाता, तब तक वास्तविक अधिकार फाइनेंसर का माना जाना चाहिए।

बीमा कंपनी ने क्या कहा ?

वहीं बीमा कंपनी ने कोर्ट में कहा कि फाइनेंसर के. प्रकाशचंद वाहन का पंजीकृत मालिक नहीं था।

केवल वाहन अपने पास आ जाने से वह मालिक नहीं बन जाता।

कंपनी ने यह भी कहा कि बीमा पॉलिसी उसके और बीमा लेने वाले व्यक्ति के बीच का कॉन्ट्रैक्ट है। फाइनेंसर उस कॉन्ट्रैक्ट का हिस्सा नहीं था। इसलिए वह बीमा क्लेम नहीं मांग सकता।

कंपनी ने यह भी बताया कि फाइनेंसर और वाहन मालिक के बीच जो समझौता हुआ था, उसकी जानकारी उसे कभी नहीं दी गई और न ही उसकी कोई कॉपी उपलब्ध कराई गई जिसमें तीसरे पक्ष का दावा स्वीकार्य नहीं होता।

इसलिए उस समझौते के आधार पर कंपनी पर कोई जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने नहीं माना क्लेम, बीमा कंपनी के पक्ष में फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय आयोग की बात से सहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि फाइनेंसर और बीमा कंपनी के बीच कोई सीधा कानूनी संबंध नहीं था। दोनों के बीच कोई ऐसा कॉन्ट्रैक्ट भी नहीं था, जिसके आधार पर फाइनेंसर बीमा रकम मांग सके।

कोर्ट ने कहा कि फाइनेंसर और वाहन मालिक के बीच हुआ समझौता सिर्फ उन दोनों के बीच था। बीमा कंपनी उसका हिस्सा नहीं थी। यही नहीं, उस समझौते की जानकारी भी बीमा कंपनी को नहीं दी गई थी।

ऐसे में कंपनी को नुकसान की भरपाई करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी देखा कि फाइनेंसर यह साबित नहीं कर सका कि वाहन वास्तव में उसके पास वापस सौंपा गया था। रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं था जो इस बात की पुष्टि करता हो।

इसके अलावा चोरी कब हुई, कहां हुई और किन परिस्थितियों में हुई, इसकी भी पूरी जानकारी रिकॉर्ड पर नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि इन कमियों की वजह से फाइनेंसर का दावा और कमजोर हो जाता है।

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पुराने फैसले का फायदा क्यों नहीं मिला ?

सुनवाई के दौरान फाइनेंसर ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला दिया, जिसमें हायर परचेज व्यवस्था पर चर्चा की गई थी।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उस फैसले का फायदा तभी मिल सकता था, जब यह साफ होता कि इस मामले में दोनों पक्षों के बीच किस तरह का समझौता हुआ था।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट ही नहीं था कि यह हायर परचेज का मामला था, हाइपोथिकेशन का था या किसी दूसरी व्यवस्था का।

जब समझौते की प्रकृति ही साफ नहीं है, तब पुराने फैसले को इस मामले में लागू नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अंत में कहा कि राष्ट्रीय आयोग का निर्णय पूरी तरह सही था और उसमें हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने के. प्रकाशचंद की अपील खारिज कर दी और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फैसले को सही माना। कोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनी और फाइनेंसर के बीच कोई सीधा कानूनी संबंध नहीं था।

इसलिए फाइनेंसर बीमा रकम पर दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि बीमा पॉलिसी सिर्फ बीमा लेने वाले और बीमा कंपनी के बीच का निजी कॉन्ट्रैक्ट होती है। ऐसे में तीसरा पक्ष उसके आधार पर क्लेम नहीं कर सकता।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील संख्या 20846/2017 को खारिज कर दिया और सभी लंबित आवेदन भी निस्तारित कर दिए।

‘पर्सनल कॉन्ट्रैक्ट’ का मतलब सुप्रीम कोर्ट ने समझाया

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि बीमा अनुबंध एक “पर्सनल कॉन्ट्रैक्ट” होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि:

‘बीमा अनुबंध केवल बीमित और बीमा कंपनी के बीच होता है, और कोई तीसरा पक्ष उस पर दावा नहीं कर सकता।’

कोर्ट ने कहा कि कानून का सीधा नियम है कि किसी समझौते का फायदा या उसके आधार पर दावा वही व्यक्ति कर सकता है, जो उस समझौते का हिस्सा हो। अगर कोई व्यक्ति उस समझौते में शामिल ही नहीं है, तो वह उसके आधार पर कोई अधिकार नहीं जता सकता।

फैसले का असर

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन सभी लोगों और फाइनेंस कंपनियों के लिए अहम है, जो यह मानते हैं कि किसी संपत्ति या वाहन में आर्थिक हित होने भर से बीमा क्लेम मिल जाएगा।

कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बीमा क्लेम का अधिकार सिर्फ इस आधार पर तय नहीं होगा कि किसी व्यक्ति का वाहन या संपत्ति से आर्थिक संबंध था। सबसे पहले यह देखा जाएगा कि उसका बीमा कंपनी के साथ सीधा कानूनी संबंध है या नहीं।

इस फैसले से यह भी साफ हो गया है कि अगर कोई फाइनेंसर, बैंक या कोई अन्य व्यक्ति बीमा पॉलिसी के आधार पर दावा करना चाहता है, तो उसे यह दिखाना होगा कि बीमा कंपनी के साथ उसका कानूनी संबंध भी है।

केवल निजी समझौते के आधार पर बीमा कंपनी को भुगतान करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

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