जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के लिए अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल ‘सेंसर’ की सजा मिलने के आधार पर किसी कर्मचारी को एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन (ACP) योजना का लाभ नहीं रोका जा सकता।
हाईकोर्ट ने बारां में तैनात एक पुलिस कांस्टेबल की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि उसे कानून के अनुसार एसीपी योजना का लाभ दिया जाए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि वर्ष 2010 में दी गई ‘सेंसर’ की सजा को रद्द नहीं किया जाएगा।
राहत केवल एसीपी के लाभ तक सीमित रहेगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर पहले ही कानून स्पष्ट हो चुका है और उसी के आधार पर याचिकाकर्ता को राहत दी जा रही है।
यह आदेश राजस्थान हाईकोर्ट की जस्टिस रेखा बोराना की एकल पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने माना कि मौजूदा विवाद पर पहले ही हाई कोर्ट फैसला दे चुका है। इसलिए उसी कानूनी सिद्धांत को लागू करते हुए याचिका का आंशिक रूप से निस्तारण किया गया।
‘सेंसर’ की सजा से क्यों रुका एसीपी?
यह याचिका बारां में तैनात पुलिस कांस्टेबल (ड्राइवर) विजयपाल भैरा ने दायर की थी। उनका कहना था कि वर्ष 2010 में उन्हें ‘सेंसर’ की सजा मिली थी।
बाद में जब एसीपी का लाभ मिलने का समय आया, तो विभाग ने इसी सजा का हवाला देकर उन्हें इसका फायदा देने से मना कर दिया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि केवल ‘सेंसर’ की सजा के आधार पर एसीपी जैसी वित्तीय सुविधा रोकना कानून के अनुरूप नहीं है। इसलिए उन्होंने हाई कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि इस मुद्दे पर हाईकोर्ट पहले ही अपना फैसला दे चुका है।
इसके लिए रघुवीर सिंह बनाम राजस्थान राज्य मामले का हवाला दिया गया, जिसमें कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल ‘सेंसर’ की सजा के कारण किसी कर्मचारी को वित्तीय उन्नयन या पदोन्नति से वंचित नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता ने कहा कि उनका मामला भी उसी फैसले से पूरी तरह मेल खाता है। इसलिए उन्हें भी एसीपी योजना का लाभ दिया जाना चाहिए।
सरकार की दलील नहीं टिक सकी
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश वकील यह नहीं बता सके कि यह मामला पहले दिए गए फैसले से अलग कैसे है।
सरकार की ओर से ऐसा कोई तर्क भी नहीं दिया गया, जिससे यह साबित हो सके कि इस मामले में अलग कानूनी स्थिति बनती है। इसके बाद कोर्ट ने माना कि जब इस मुद्दे पर पहले ही स्पष्ट फैसला दिया जा चुका है, तो उसी के अनुसार याचिकाकर्ता को भी राहत मिलनी चाहिए।
कोर्ट ने क्यों माना कि एसीपी नहीं रोका जा सकता?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस विवाद पर पहले ही कानून स्पष्ट हो चुका है। कोर्ट ने वर्ष 2024 में दिए गए रघुवीर सिंह मामले के फैसले का हवाला दिया, जिसमें 4 जून 2008 के उस सरकारी परिपत्र को रद्द कर दिया गया था, जिसके आधार पर ‘सेंसर’ की सजा पाने वाले कर्मचारियों को पदोन्नति और वित्तीय लाभ से वंचित किया जा रहा था।
कोर्ट ने माना कि जब पहले ही यह तय हो चुका है कि केवल ‘सेंसर’ की सजा किसी कर्मचारी को एसीपी के लाभ से वंचित करने का आधार नहीं बन सकती, तो मौजूदा मामले में भी उसी कानूनी सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए।
इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार एसीपी योजना का लाभ दिया जाए।
‘सेंसर’ की सजा रहेगी, लेकिन एसीपी भी मिलेगा
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि याचिकाकर्ता को दी गई ‘सेंसर’ की सजा को रद्द नहीं किया जा रहा है।
कोर्ट ने साफ किया कि वर्ष 2010 में दी गई ‘सेंसर’ की सजा बनी रहेगी। लेकिन सिर्फ इसी सजा के आधार पर कर्मचारी को एसीपी योजना का लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
यानी सजा अपनी जगह रहेगी, लेकिन एसीपी का लाभ कानून के मुताबिक दिया जाएगा।
यानी कोर्ट ने साफ कर दिया कि ‘सेंसर’ की सजा अपनी जगह रहेगी, लेकिन सिर्फ उसी वजह से कर्मचारी का एसीपी का हक नहीं छीना जा सकता।
राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस विभाग को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को नियमों के मुताबिक एसीपी योजना का लाभ दिया जाए। हालांकि, ‘सेंसर’ की सजा में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि विभाग नियमों के अनुसार यह तय करेगा कि याचिकाकर्ता किस सीमा तक इस लाभ का पात्र है। साथ ही, इस संबंध में जरूरी आदेश दो महीने के भीतर जारी किए जाएं।
कोर्ट ने साफ किया कि वर्ष 2010 में दी गई ‘सेंसर’ की सजा बनी रहेगी और उसमें कोई बदलाव नहीं होगा। इसके साथ ही इस मामले से जुड़े बाकी सभी लंबित आवेदन भी खत्म कर दिए गए।
सरकारी कर्मचारियों के लिए अहम फैसला
यह फैसला उन सरकारी कर्मचारियों के लिए अहम है, जिन्हें ‘सेंसर’ की सजा मिलने के बाद एसीपी या दूसरे वित्तीय लाभ नहीं दिए गए।
हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि केवल ‘सेंसर’ की सजा अपने आप किसी कर्मचारी को एसीपी से वंचित करने का आधार नहीं बन सकती। अगर मामला पहले से तय कानूनी सिद्धांतों के दायरे में आता है, तो संबंधित विभाग को कर्मचारी के मामले पर उसी आधार पर फैसला करना होगा।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि ‘सेंसर’ की सजा खत्म हो जाएगी। विभागीय सजा अपने स्थान पर बनी रहेगी, लेकिन उसका इस्तेमाल हर मामले में वित्तीय उन्नयन रोकने के आधार के रूप में नहीं किया जा सकता।
इस फैसले के बाद ऐसे मामलों में सरकारी विभाग सिर्फ ‘सेंसर’ की सजा का हवाला देकर एसीपी का लाभ नहीं रोक सकेंगे। इससे ऐसे कर्मचारियों को राहत मिल सकती है, जिनका एसीपी इसी वजह से रोका गया था।