नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने माइनिंग लीज (खनन पट्टों) को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि लीज एग्रीमेंट में रॉयल्टी या डेड रेंट बढ़ाने की शर्त नहीं है, तो भी राज्य सरकार कानून के तहत इनकी दरें बढ़ा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि :
‘माइनिंग लीज की शर्तें सरकार को रॉयल्टी और डेड रेंट की दरें बढ़ाने से नहीं रोक सकतीं। यह अधिकार सरकार को सीधे कानून से मिला है। सरकार कानून से मिले अधिकार को किसी अनुबंध के कारण नहीं खो सकती। इसलिए समय-समय पर रॉयल्टी और डेड रेंट की दरें बढ़ाना पूरी तरह वैध है।‘
कोर्ट ने कहा कि माइनिंग लीज कोई सामान्य अनुबंध नहीं है। यह कानून के तहत होने वाला वैधानिक अनुबंध (स्टैच्यूटरी कॉन्ट्रैक्ट) है। इसलिए इसके नियम सिर्फ लीज डीड से तय नहीं होंगे, बल्कि खान एवं खनिज कानून और उससे जुड़े नियम भी इस पर लागू होंगे।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह फैसला हरियाणा सरकार की अपील पर सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि माइनिंग लीज में स्पष्ट प्रावधान नहीं होने पर सरकार बाद में रॉयल्टी और डेड रेंट नहीं बढ़ा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खनिज देश की महत्वपूर्ण प्राकृतिक संपत्ति हैं। इनके उपयोग और संरक्षण की जिम्मेदारी सरकार पर है। इसलिए सरकार समय-समय पर परिस्थितियों के अनुसार रॉयल्टी और डेड रेंट की दरों में बदलाव कर सकती है। ऐसा करना न तो अनुबंध का उल्लंघन है और न ही कानून के खिलाफ।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि खनिज देश की सार्वजनिक संपत्ति हैं और राज्य सरकार उनकी ट्रस्टी है। इसलिए सरकार की जिम्मेदारी है कि इन संसाधनों के इस्तेमाल से जनता को उचित राजस्व मिले। अगर सिर्फ लीज डीड में प्रावधान नहीं होने के आधार पर सरकार को रॉयल्टी बढ़ाने से रोक दिया जाए, तो यह कानून की मंशा और जनहित दोनों के खिलाफ होगा।
कहां से शुरू हुआ पूरा विवाद?
यह विवाद हरियाणा सरकार और फरीदाबाद-गुरुग्राम मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड के बीच माइनिंग लीज से जुड़ा था। कंपनी को राज्य सरकार ने पत्थर और अन्य खनिजों के खनन के लिए लीज दी थी।
लीज मिलने के बाद केंद्र सरकार ने खनिजों पर रॉयल्टी की दरों में संशोधन किया। इसके बाद हरियाणा सरकार ने भी नई दरों के अनुसार कंपनी से बढ़ी हुई रॉयल्टी और डेड रेंट जमा करने को कहा।
कंपनी ने इसका विरोध करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया। उसका कहना था कि लीज एग्रीमेंट में कहीं भी यह शर्त नहीं है कि सरकार बाद में रॉयल्टी या डेड रेंट बढ़ा सकती है। इसलिए नई दरें उससे वसूल नहीं की जा सकतीं।
हाईकोर्ट ने कंपनी की दलील स्वीकार कर ली और कहा कि अनुबंध में ऐसा प्रावधान नहीं होने के कारण सरकार अतिरिक्त राशि नहीं मांग सकती।
इसी फैसले को हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या दलील दी ?
हरियाणा सरकार की ओर से कहा गया कि माइनिंग लीज पूरी तरह कानून के तहत दी जाती है। खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम और संबंधित नियम सरकार को रॉयल्टी तथा डेड रेंट की दरें तय करने और उनमें समय-समय पर बदलाव करने का अधिकार देते हैं।
सरकार ने कहा कि यह अधिकार किसी अनुबंध से नहीं बल्कि सीधे कानून से मिलता है। इसलिए अगर लीज एग्रीमेंट में इस बारे में अलग से कोई शर्त नहीं भी लिखी गई हो, तब भी सरकार कानून के अनुसार संशोधित दरें लागू कर सकती है।
राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि अगर कंपनियों की बात मान ली जाए, तो सरकार भविष्य में कभी भी रॉयल्टी की दरों में बदलाव नहीं कर पाएगी। इससे सार्वजनिक राजस्व पर गंभीर असर पड़ेगा और कानून का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
‘कानून से मिले अधिकार नहीं छीन सकता अनुबंध’
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की दलील से सहमति जताते हुए कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि किसी अनुबंध में शर्त न होने के कारण सरकार अपने वैधानिक अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकती।
कोर्ट ने माना कि जब कोई लीज कानून के तहत दी जाती है, तो उसे उसी कानून के साथ पढ़ा जाएगा। कानून में यदि सरकार को रॉयल्टी और डेड रेंट संशोधित करने का अधिकार दिया गया है, तो अनुबंध उस अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उनके इस्तेमाल की जिम्मेदारी सरकार की है। इसलिए ऐसे मामलों में सरकार परिस्थितियों के अनुसार जरूरी फैसले ले सकती है। सरकार का यह अधिकार सार्वजनिक हित से जुड़ा है और इसे केवल अनुबंध की किसी शर्त के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने ‘स्टैच्यूटरी कॉन्ट्रैक्ट’ का मतलब समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि माइनिंग लीज एक स्टैच्यूटरी कॉन्ट्रैक्ट यानी कानून के तहत होने वाला अनुबंध है। ऐसे अनुबंधों में दोनों पक्षों के अधिकार और जिम्मेदारियां केवल लिखित समझौते से नहीं, बल्कि संबंधित कानून और नियमों से भी तय होती हैं।
कोर्ट ने कहा कि जब किसी कानून में सरकार को रॉयल्टी और डेड रेंट की दरें तय करने या उनमें बदलाव करने की शक्ति दी गई है, तो उस शक्ति को अनुबंध के जरिए सीमित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार जब सार्वजनिक संसाधनों का प्रबंधन करती है, तब वह केवल एक सामान्य पक्षकार की तरह काम नहीं करती। वह सार्वजनिक हित की जिम्मेदारी भी निभाती है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से जुड़े मामलों में सरकार के वैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जाएगी।
‘रॉयल्टी बढ़ाना सरकार का वैधानिक अधिकार’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खनिज देश की बहुमूल्य प्राकृतिक संपत्ति हैं। इनके दोहन, संरक्षण और उचित उपयोग की जिम्मेदारी सरकार की है। इसलिए सरकार को समय-समय पर बदलती परिस्थितियों के अनुसार नीतिगत फैसले लेने और रॉयल्टी जैसी दरों में संशोधन करने का अधिकार होना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि यदि यह मान लिया जाए कि एक बार लीज देने के बाद सरकार कभी रॉयल्टी नहीं बढ़ा सकती, तो इससे कानून का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। बदलती आर्थिक परिस्थितियों, बाजार कीमतों और सार्वजनिक हित को देखते हुए सरकार को जरूरी बदलाव करने की अधिकार रहना चाहिए। यह अधिकार किसी कंपनी के खिलाफ नहीं, बल्कि सार्वजनिक राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए है।
हाईकोर्ट का फैसला क्यों पलटा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कानून की सही व्याख्या नहीं की।
हाईकोर्ट ने केवल माइनिंग लीज की शर्तों को आधार बनाया, जबकि उसे उन वैधानिक प्रावधानों पर भी ध्यान देना चाहिए था जिनके तहत सरकार को रॉयल्टी और डेड रेंट तय करने और समय-समय पर उनमें बदलाव करने का अधिकार मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माइनिंग लीज को केवल एक निजी अनुबंध की तरह नहीं देखा जा सकता। यह ऐसा समझौता है, जो कानून के तहत किया जाता है और उसी कानून के अधीन चलता है। इसलिए यदि कानून सरकार को किसी दर में संशोधन करने का अधिकार देता है, तो उस अधिकार को अनुबंध की किसी शर्त के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने इस अहम कानूनी सिद्धांत पर ध्यान नहीं दिया। यही वजह है कि उसका फैसला सही नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार की अपील स्वीकार करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा संशोधित दरों के अनुसार रॉयल्टी और डेड रेंट की मांग पूरी तरह वैध है। इसलिए केवल इस आधार पर कि माइनिंग लीज में ऐसा प्रावधान अलग से नहीं लिखा गया, सरकार की कार्रवाई को गैरकानूनी नहीं ठहराया जा सकता।
इसके साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि माइनिंग लीज से जुड़े मामलों में सरकार अपने वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करती रहेगी और ऐसे अधिकार किसी अनुबंध के कारण समाप्त नहीं होंगे।
राज्यों और माइनिंग सेक्टर के लिए अहम फैसला
यह फैसला देशभर में माइनिंग लीज, रॉयल्टी और डेड रेंट से जुड़े विवादों के लिए अहम है।
इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम कानूनी सिद्धांत स्पष्ट कर दिए हैं :
- माइनिंग लीज में अलग से शर्त नहीं होने पर भी सरकार कानून के तहत रॉयल्टी और डेड रेंट की दरें बढ़ा सकती है।
- स्टैच्यूटरी कॉन्ट्रैक्ट में कानून का प्रावधान अनुबंध की शर्तों से ऊपर रहेगा।
- सरकार सार्वजनिक हित और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े अपने वैधानिक अधिकार किसी अनुबंध के कारण नहीं खो सकती।
- खनन कंपनियां केवल लीज की शर्तों का हवाला देकर संशोधित रॉयल्टी देने से इनकार नहीं कर सकतीं।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि जहां सरकार को किसी कानून के तहत स्पष्ट अधिकार दिए गए हैं, वहां उन अधिकारों को केवल अनुबंध की शर्तों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। खासकर प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक राजस्व से जुड़े मामलों में सरकार की वैधानिक शक्तियों को प्राथमिकता मिलेगी।
