नई दिल्ली: अनुकंपा नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर किसी कर्मचारी ने तय समय सीमा के भीतर मेडिकल आधार पर सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर दिया है, तो विभाग या संस्थान अपनी देरी का फायदा उठाकर उसके परिवार को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं कर सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहां कि विभाग या संस्थान आवेदन को महीनों तक लंबित रखे और बाद में उसी देरी का हवाला देकर दावा खारिज कर दे, यह कानून के मुताबिक सही नहीं है।
विभाग को ऐसे मामलों में तय समय के भीतर निष्पक्ष फैसला लेना चाहिए। अपनी देरी का नुकसान वह आवेदक या उसके परिवार पर नहीं डाल सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का मकसद कर्मचारी या उसके परिवार को समय पर सहारा देना है। इसलिए इस योजना का फैसला बिना बेवजह देरी के किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि विभाग या संस्थान को ऐसे मामलों में निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से तय समय के भीतर फैसला लेना चाहिए।
अगर विभाग या संस्थान की वजह से देरी होती है, तो उसका नुकसान आवेदक या उसके परिवार को नहीं उठाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का फैसला रद्द कर दिया और न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी को कर्मचारी के बेटे को आठ सप्ताह के भीतर अनुकंपा नियुक्ति देने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अनुकंपा नियुक्ति जैसी लाभकारी योजनाओं को लागू करते समय सरकारी विभागों और सार्वजनिक संस्थानों को निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से काम करना होगा।
अगर कोई कर्मचारी समय रहते आवेदन देता है और जरूरी दस्तावेज जमा कर देता है, तो विभाग या कंपनी अपनी प्रशासनिक देरी का सहारा लेकर उसके परिवार का अधिकार नहीं छीन सकता।
कानून किसी भी संस्था को अपनी ही गलती का फायदा उठाने की अनुमति नहीं देता।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
यह मामला न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी के एक कर्मचारी से जुड़ा है। गंभीर बीमारी की वजह से वह आगे नौकरी करने की स्थिति में नहीं रह गया था। सरकारी अस्पताल के सिविल सर्जन ने भी उसे स्थायी रूप से सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया।
इसके अगले ही दिन कर्मचारी ने 55 साल की उम्र पूरी होने से पहले मेडिकल आधार पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर दिया। उसने आवेदन के साथ मेडिकल प्रमाणपत्र भी जमा कर दिया, ताकि उसके बेटे को अनुकंपा नियुक्ति योजना का लाभ मिल सके।
इसके बाद भी कई महीनों तक कंपनी ने आवेदन पर कोई फैसला नहीं लिया।
जब कई महीनों तक कोई फैसला नहीं हुआ, तो कर्मचारी ने दो बार लिखित याद दिलाई, लेकिन फिर भी कोई जवाब नहीं मिला और और न ही यह बताया कि किसी दूसरे मेडिकल बोर्ड का प्रमाणपत्र भी जरूरी है।
बाद में कर्मचारी की 55 साल की उम्र पूरी होने के बाद कंपनी ने पहली बार मेडिकल बोर्ड का प्रमाणपत्र मांगा।
कर्मचारी ने महज सात दिन के भीतर यह प्रमाणपत्र भी जमा कर दिया। इसके बावजूद कंपनी ने बेटे की अनुकंपा नियुक्ति का दावा यह कहकर खारिज कर दिया कि कर्मचारी की मेडिकल सेवानिवृत्ति 55 साल की उम्र पूरी होने के बाद हुई थी।
इसके खिलाफ कर्मचारी के परिवार ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में याचिका दायर की, लेकिन वहां भी राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया कि मेडिकल बोर्ड का प्रमाणपत्र 55 साल की उम्र पूरी होने के बाद जारी हुआ था, इसलिए कर्मचारी अनुकंपा नियुक्ति योजना की शर्त पूरी नहीं करता था।
हाईकोर्ट के इसी फैसले को कर्मचारी के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
अपनी देरी का फायदा नहीं उठा सकता विभाग: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले का सबसे अहम सवाल यह नहीं था कि मेडिकल बोर्ड का प्रमाणपत्र कब जमा हुआ, बल्कि यह था कि उसमें देरी किसकी वजह से हुई।
रिकॉर्ड से साफ है कि कर्मचारी ने समय रहते आवेदन दिया था और जरूरी दस्तावेज भी जमा कर दिए थे।
कंपनी ने कई महीनों तक आवेदन लंबित रखा और 55 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद पहली बार अतिरिक्त दस्तावेज मांगे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कंपनी को लगता था कि सिविल सर्जन का प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं है, तो उसे यह बात कर्मचारी को 55 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले बतानी चाहिए थी।
कंपनी ऐसा नहीं कर सकती कि पहले चुप बैठी रहे और बाद में अपनी ही देरी को आधार बनाकर दावा खारिज कर दे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून किसी भी विभाग या संस्थान को अपनी ही गलती या लापरवाही का फायदा उठाने की इजाजत नहीं देता।
इसलिए कंपनी अपनी देरी को आधार बनाकर कर्मचारी के परिवार का दावा खारिज नहीं कर सकती और अपनी देरी का सहारा लेकर कर्मचारी के परिवार को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं कर सकती।
‘योजना का मकसद राहत देना है, अधिकार छीनना नहीं’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति सामान्य भर्ती नहीं है। इसका मकसद कर्मचारी की मौत या गंभीर बीमारी की स्थिति में उसके परिवार को समय पर सहारा देना है। इसलिए इस योजना को उसी उद्देश्य के साथ लागू किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि योजना की शर्तों का पालन जरूरी है, लेकिन विभाग या कंपनी तकनीकी कारणों का सहारा लेकर जरूरतमंद परिवार का अधिकार नहीं छीन सकता। अगर कर्मचारी ने समय पर आवेदन कर दिया है और बाद में हुई देरी विभाग या कंपनी की है, तो उसका नुकसान कर्मचारी या उसके परिवार को नहीं उठाना चाहिए।
हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में सिर्फ यह देखा कि मेडिकल बोर्ड का प्रमाणपत्र कर्मचारी के 55 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद जारी हुआ। लेकिन यह नहीं देखा कि ऐसा आखिर हुआ क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि कर्मचारी ने समय रहते आवेदन दे दिया था। उसने सरकारी अस्पताल का मेडिकल प्रमाणपत्र भी जमा किया और कंपनी को दो बार याद दिलाया कि उसके आवेदन पर फैसला लिया जाए। इसके बावजूद कंपनी कई महीनों तक चुप रही।
कोर्ट ने कहा कि अगर कंपनी को मेडिकल बोर्ड का प्रमाणपत्र चाहिए था, तो उसे यह बात कर्मचारी को 55 वर्ष की उम्र पूरी होने से पहले बतानी चाहिए थी। लेकिन कंपनी ने ऐसा नहीं किया और बाद में उसी देरी को आधार बनाकर दावा खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने कंपनी की इस देरी को नजरअंदाज कर दिया। इसी वजह से उसका फैसला कानून के मुताबिक सही नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला और न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी का अनुकंपा नियुक्ति से इनकार करने वाला आदेश दोनों रद्द कर दिए।
कोर्ट ने कंपनी को निर्देश दिया कि कर्मचारी के बेटे को योजना के मुताबिक उपयुक्त पद पर आठ सप्ताह के भीतर अनुकंपा नियुक्ति दी जाए। अगर इस दौरान उसकी उम्र निर्धारित सीमा से अधिक हो गई है, तो उसे आयु सीमा में छूट भी दी जाएगी।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसे वेतन और दूसरे आर्थिक लाभ सिर्फ नौकरी जॉइन करने की तारीख से ही मिलेंगे। पिछली अवधि का वेतन नहीं दिया जाएगा। साथ ही, अगर कर्मचारी के कोई सेवा संबंधी बकाया भुगतान बाकी हैं, तो कंपनी उन्हें भी आठ सप्ताह के भीतर जारी करेगी।