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हाईकोर्ट की रिट सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: कहा- रिट सुनते समय अपील वाली भूमिका नहीं निभा सकता हाईकोर्ट, रिट अधिकार की सीमाएं स्पष्ट

Supreme Court Grants Relief on Promotion Benefits After Punishment Is Reduced in Departmental Proceedings

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि रिट याचिका सुनते समय हाईकोर्ट अपील वाली भूमिका नहीं निभा सकता।

अगर किसी निचली कोर्ट ने सबूतों के आधार पर तथ्य तय कर दिए हैं, तो हाईकोर्ट रिट सुनते समय उनकी दोबारा जांच या नए सिरे से मूल्यांकन नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस आदेश से किसी व्यक्ति के अधिकार प्रभावित होने वाले हों, उसके खिलाफ फैसला सुनाने से पहले उस व्यक्ति को सुनना जरूरी है। उसे अपनी बात रखने का मौका दिए बिना आदेश देना न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने यह फैसला कर्नाटक हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए सुनाया। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने रिट की सीमाओं से आगे बढ़कर पहले अपीलीय कोर्ट के तथ्यात्मक निष्कर्षों में दखल दिया और जिन लोगों के अधिकार सीधे प्रभावित हो रहे थे, उन्हें सुने बिना ही आदेश पारित कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए पहले अपीलीय कोर्ट का आदेश फिर से बहाल कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि रिट का उद्देश्य हर मामले की दोबारा सुनवाई करना नहीं है। यह अधिकार सिर्फ तब इस्तेमाल किया जा सकता है, जब अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गलती, कानून का स्पष्ट उल्लंघन या न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ हो।

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आखिर पूरा विवाद क्या था?

यह मामला एक ही परिवार की पैतृक जमीन को लेकर शुरू हुआ। परिवार के मुखिया बसैया के एक बेटा बसलिंगैया और दो बेटियां वीरबसम्मा व मलकाजम्मा थीं।

बसैया की मौत के बाद जमीन बेटे बसलिंगैया के नाम दर्ज हो गई। कुछ साल बाद 1983 में बसलिंगैया की भी मौत हो गई। उनके बाद उनकी इकलौती बेटी बसम्मा जमीन की मालिक बन गई।

बसम्मा ने बाद में जमीन के कुछ हिस्से अलग-अलग लोगों को बेच दिए। इसके बाद बसैया की दोनों बेटियों यानी बसम्मा की दो बुआओं वीरबसम्मा और मलकाजम्मा ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका कहना था कि यह पैतृक संपत्ति है और बेटियां होने के नाते उनका भी इसमें हिस्सा बनता है। इसलिए बसम्मा अकेले इसे नहीं बेच सकती थीं।

उनका दावा था कि उन्हें भी इस जमीन में दो-तिहाई हिस्सा मिलना चाहिए। इसी मांग को लेकर उन्होंने वर्ष 1999 में बंटवारे और अलग कब्जे के लिए सिविल मुकदमा दायर कर दिया।

मुकदमा दायर होने के बाद भी जमीन के कुछ हिस्सों की बिक्री को लेकर विवाद बना रहा। इससे जमीन खरीदने वाले लोग भी इस मुकदमे का हिस्सा बन गए।

अब विवाद सिर्फ बंटवारे तक सीमित नहीं रहा। एक बड़ा सवाल यह भी खड़ा हो गया कि अगर यह सचमुच पैतृक संपत्ति थी, तो क्या बसम्मा को अकेले जमीन बेचने का अधिकार था और खरीदारों के पक्ष में की गई बिक्री कानूनी रूप से वैध मानी जा सकती है? यही सवाल आगे चलकर पूरे मुकदमे का सबसे अहम मुद्दा बन गया।

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मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?

ट्रायल कोर्ट ने दोनों महिलाओं का दावा खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वे यह साबित नहीं कर सकीं कि विवादित जमीन पैतृक संपत्ति है। इसलिए बसम्मा को जमीन बेचने का अधिकार था और खरीदारों की बिक्री भी वैध मानी गई।

इसके बाद मामला पहले अपीलीय कोर्ट पहुंचा। यहां भी दोनों महिलाओं की अपील खारिज हो गई। हालांकि, कोर्ट ने अपने फैसले में कुछ बिक्री दस्तावेजों पर टिप्पणी कर दी, जिससे जमीन खरीदने वाले लोगों के अधिकार प्रभावित होने लगे।

इसी टिप्पणी के खिलाफ एक खरीदार हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने वह टिप्पणी हटा दी, लेकिन ऐसा करते समय बसम्मा और उनके बेटे (जो बाद में खरीदार भी थे) को सुना ही नहीं।

साथ ही हाईकोर्ट ने उन तथ्यों में भी दखल दिया, जिन्हें निचली कोर्ट्स रिकॉर्ड और सबूतों के आधार पर पहले ही तय कर चुकी थीं। इसके बाद बसम्मा और उनके बेटे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

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हाईकोर्ट के फैसेल पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट ने रिट अधिकार का इस्तेमाल तय सीमा से बाहर जाकर किया।

पहले अपीलीय कोर्ट ने अपने निष्कर्ष रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों, बिक्री पत्रों, म्यूटेशन रिकॉर्ड और दूसरे सबूतों की जांच के बाद दिए थे। ऐसे में हाईकोर्ट को रिट की सुनवाई के दौरान उन निष्कर्षों की दोबारा जांच नहीं करनी चाहिए थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी निचली कोर्ट ने सबूतों के आधार पर तथ्य तय किए हैं, तो सिर्फ इस वजह से कि हाईकोर्ट की राय अलग है, उन निष्कर्षों को रद्द नहीं किया जा सकता। रिट सुनवाई अपील का विकल्प नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हाईकोर्ट केवल यह देख सकता है कि कहीं निचली कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसला तो नहीं दिया, कानून का साफ उल्लंघन तो नहीं हुआ या न्याय के सिद्धांतों का पालन हुआ या नहीं। लेकिन वह पूरे मामले की दोबारा सुनवाई करके अपने निष्कर्ष नहीं दे सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले अपीलीय कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का मूल्यांकन करने के बाद अपने निष्कर्ष दिए थे। इसलिए हाईकोर्ट के पास उन तथ्यों में दखल देने का कोई कानूनी आधार नहीं था।

हाईकोर्ट रिट में कितना कर सकता है दखल?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को रिट याचिका सुनने का अधिकार जरूर है, लेकिन यह अधिकार सीमित है। इसका मतलब यह नहीं है कि हाईकोर्ट हर मामले में अपील वाली कोर्ट की तरह सबूतों की दोबारा जांच करने लगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिट याचिका की सुनवाई करते समय हाईकोर्ट को अपनी तय सीमाओं के भीतर ही काम करना होगा। कोर्ट ने इस बारे में कुछ अहम बातें भी साफ कीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिट सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट अपील वाली कोर्ट की तरह सबूतों और रिकॉर्ड की दोबारा जांच नहीं कर सकता।

रिट सुनवाई का मकसद सिर्फ यह देखना है कि कहीं निचली कोर्ट्स ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसला तो नहीं दिया, कानून का साफ उल्लंघन तो नहीं हुआ या प्राकृतिक न्याय के नियमों का पालन हुआ या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय कोर्ट रिकॉर्ड व सबूतों के आधार पर तथ्य तय कर चुके हैं, तो सिर्फ अलग राय होने के कारण हाईकोर्ट उनमें दखल नहीं दे सकता। हाईकोर्ट सिर्फ इसलिए उनमें दखल नहीं दे सकता कि उसे कोई दूसरा निष्कर्ष ज्यादा सही लगता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिट अधिकार निगरानी (सुपरवाइजरी) का अधिकार है, अपील का नहीं। इसलिए हाईकोर्ट को निचली कोर्ट के फैसले की दोबारा सुनवाई करने या सबूतों का फिर से मूल्यांकन करने से बचना चाहिए।

बिना सुने आदेश देने पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं की यह शिकायत सही थी कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने उन्हें सुने बिना ही ऐसा आदेश पारित कर दिया, जिससे उनके अधिकार सीधे प्रभावित हुए।

बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने जिस खरीदार की रिट याचिका पर सुनवाई की, उसमें पहले अपीलीय कोर्ट की उस टिप्पणी को हटा दिया, जिसका सीधा असर बसम्मा, उनके बेटे और दूसरे संबंधित पक्षों के अधिकारों पर पड़ता था। ऐसे में उन्हें अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए था।

कोर्ट ने यह भी माना कि हाईकोर्ट ने रिट याचिका की सुनवाई के दौरान उन तथ्यात्मक निष्कर्षों में भी दखल दिया, जिन्हें ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय कोर्ट रिकॉर्ड और सबूतों के आधार पर पहले ही तय कर चुके थे। जबकि रिट की सुनवाई में ऐसा नहीं किया जा सकता।

बेंच ने कहा कि अगर किसी आदेश का असर किसी व्यक्ति की संपत्ति, अधिकार या हितों पर पड़ता है, तो फैसला सुनाने से पहले उसे अपनी बात रखने का अवसर देना जरूरी है। किसी व्यक्ति को सुने बिना उसके खिलाफ आदेश देना प्राकृतिक न्याय के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मामले में हाईकोर्ट ने इस बुनियादी नियम का पालन नहीं किया। इसलिए उसका आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकता।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट का 22 फरवरी 2023 का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही पहले अपीलीय कोर्ट का फैसला पूरी तरह बहाल कर दिया। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने संपत्ति विवाद के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी पक्ष के पास कानून के तहत कोई दूसरा वैधानिक उपाय उपलब्ध है, तो वह उसका इस्तेमाल कर सकता है। इसके लिए कोर्ट ने तीन महीने का समय भी दिया और कहा कि ऐसे मामलों में केवल समय बीत जाने के आधार पर राहत से इनकार नहीं किया जाना चाहिए।

इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और लंबित सभी आवेदन भी निपटा दिए। कोर्ट ने दोहराया कि रिट अधिकार का इस्तेमाल कानून की तय सीमाओं के भीतर ही होना चाहिए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हर हाल में पालन किया जाना चाहिए।

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