नई दिल्ली: किसी को गाली देना, अपशब्द कहना या भद्दी भाषा बोलना अपने आप में अश्लीलता का अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि कानून की नजर में गाली-गलौज और अश्लीलता दोनों अलग-अलग बातें हैं और सिर्फ गाली देने या भद्दी भाषा बोलने से किसी पर अश्लीलता का केस नहीं बन सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर अभद्र या अपमानजनक शब्द पर भारतीय दंड संहिता की धारा 294 नहीं लगाई जा सकती।
यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस और निचली कोर्ट्स सिर्फ गाली सुनकर किसी को धारा 294 का दोषी नहीं ठहरा सकतीं।
यह धारा तभी लागू होगी, जब बोले गए शब्द वास्तव में अश्लील हों और कानून में तय सभी शर्तें पूरी होती हों।
सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए मद्रास हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें एक आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 294 के तहत दोषी ठहराया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 294 तभी लागू होगी, जब बोले गए शब्द वास्तव में अश्लील हों, उनमें यौन या कामुक तत्व हो और उनसे सार्वजनिक जगह पर दूसरे लोगों को परेशानी हुई हो।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर धारा 294 और धारा 506 के तहत आरोपी की दोषसिद्धि रद्द कर दी, जबकि गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में धारा 326 के तहत सजा बरकरार रखी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कहा कि गाली-गलौज और अश्लीलता दोनों अलग-अलग बातें हैं।
कोई शब्द अपमानजनक या अभद्र हो सकता है, लेकिन सिर्फ इसी वजह से उसे कानून की नजर में अश्लील नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर में धारा 294 के तहत दर्ज होने वाले मामलों के लिए अहम है।
अब केवल गाली या अभद्र भाषा के आधार पर अश्लीलता का मामला दर्ज नहीं किया जा सकेगा। पुलिस और कोर्ट्स को पहले यह देखना होगा कि कानून में तय सभी शर्तें पूरी हो रही हैं या नहीं।
यानी अब हर गाली धारा 294 का मामला नहीं बनेगी। कानून तभी लागू होगा, जब शब्द वास्तव में अश्लील हों और उनसे सार्वजनिक स्थान पर मौजूद लोगों को परेशानी हुई हो।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला तमिलनाडु के इरोड जिले का है। अगस्त 2017 में जमीन के विवाद को लेकर आरोपी और शिकायतकर्ता के परिवार के बीच पहले कहासुनी हुई थी। दो दिन बाद दोनों पक्ष फिर आमने-सामने आ गए और विवाद बढ़ गया।
आरोप है कि आरोपी ने पहले शिकायतकर्ता के भतीजे से झगड़ा किया। जब शिकायतकर्ता बीच-बचाव करने आया, तो आरोपी ने उसे गालियां दीं, धमकी दी और जातिसूचक शब्द भी कहे।
इसके बाद वह घर से धारदार हथियार लेकर आया और शिकायतकर्ता पर हमला कर दिया।
इस हमले में उसके माथे, नाक और हाथ में गंभीर चोटें आईं। बाद में जांच में पता चला कि उसकी नाक की हड्डी भी टूट गई थी।
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ गाली-गलौज, गंभीर चोट पहुंचाने, आपराधिक धमकी और अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार कानून की धाराओं में मामला दर्ज किया। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल हुई और ट्रायल शुरू हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को सभी प्रमुख धाराओं में दोषी ठहराया। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार कानून की धाराओं से तो उसे बरी कर दिया, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 294, 326 और 506 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी।
आरोपी ने इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
गाली और अश्लीलता एक बात नहीं, सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून में अश्लील (ऑबसीन) और अभद्र या गाली-गलौज वाली भाषा (वुल्गर) को एक जैसा नहीं माना गया है।
कोई शब्द अपमानजनक, अशिष्ट या भद्दा हो सकता है, लेकिन इससे वह अपने आप अश्लील नहीं बन जाता।
कोर्ट ने कहा कि कई बार लोग गुस्से या झगड़े में अपशब्द बोल देते हैं। ऐसे शब्द सुनने में खराब लग सकते हैं, लेकिन हर बार उन्हें अश्लील नहीं कहा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का भी हवाला देते हुए कहा कि अश्लीलता का फैसला केवल शब्द देखकर नहीं किया जा सकता। यह भी देखना होगा कि वे किस संदर्भ में बोले गए और उनका असर क्या हुआ।
धारा 294 लगाने के लिए क्या साबित करना होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 294 तभी लागू होगी, जब कानून में तय जरूरी शर्तें पूरी हों।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि:
- सबसे पहले यह साबित होना चाहिए कि बोले गए शब्द वास्तव में अश्लील थे। केवल गुस्से में गाली देना या भद्दी भाषा बोलना पर्याप्त नहीं है।
- दूसरी शर्त यह है कि उन शब्दों में ऐसा यौन या कामुक तत्व हो, जिससे अश्लीलता साबित हो सके। अगर ऐसा नहीं है, तो धारा 294 नहीं लगेगी।
- इसके अलावा यह भी साबित करना होगा कि सार्वजनिक जगह पर मौजूद दूसरे लोगों को उन शब्दों से परेशानी हुई।
कोर्ट ने कहा कि अगर इन जरूरी शर्तों में से कोई भी साबित नहीं होती, तो धारा 294 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
इस मामले में धारा 294 क्यों नहीं लगी?
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद कहा कि आरोपी ने झगड़े के दौरान जो शब्द बोले, वे अधिक से अधिक गाली या अभद्र भाषा माने जा सकते हैं।
लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि वे शब्द कानून की नजर में अश्लील थे। इसी वजह से धारा 294 के तहत दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह जरूर साबित होता है कि आरोपी ने शिकायतकर्ता के साथ झगड़े के दौरान गाली-गलौज की थी। लेकिन केवल अपशब्द बोलने से यह नहीं माना जा सकता कि उसने कानून के मुताबिक अश्लील हरकत की है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में यह भी साबित नहीं हुआ कि सार्वजनिक जगह पर मौजूद दूसरे लोगों को उन शब्दों से परेशानी हुई थी। जबकि यह धारा 294 की सबसे जरूरी शर्तों में से एक है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी के बोले गए शब्द अश्लील थे या उनमें ऐसा यौन या कामुक तत्व था, जो धारा 294 के तहत अपराध बनाता हो। इसलिए इस धारा में दोषसिद्धि टिक नहीं सकती।
धमकी वाले आरोप पर भी सुप्रीम कोर्ट ने दी राहत
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के तहत दर्ज आपराधिक धमकी के आरोप को भी रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल गुस्से में धमकी जैसे शब्द बोल देना इस धारा के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल गुस्से में धमकी जैसे शब्द बोल देना पर्याप्त नहीं है। धारा 506 तभी लागू होगी, जब यह साबित हो कि आरोपी का मकसद सामने वाले व्यक्ति में डर पैदा करना था या उसे किसी काम को करने या न करने के लिए मजबूर करना था।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड पर नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी की धमकी का उद्देश्य शिकायतकर्ता में डर पैदा करना था या उसे किसी काम के लिए मजबूर करना था।
इसी वजह से कोर्ट ने माना कि धारा 506 के तहत दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती।
मारपीट के मामले में सजा क्यों बरकरार रही?
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने धारदार हथियार से गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में आरोपी को कोई राहत नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता और प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं।
मेडिकल रिकॉर्ड से भी साफ साबित होता है कि शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूट गई थी और उसे गंभीर चोट आई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नाक की हड्डी का टूटना कानून के मुताबिक गंभीर चोट की श्रेणी में आता है। रिकॉर्ड से यह भी साबित होता है कि यह चोट धारदार हथियार से लगी थी। इसलिए धारा 326 के तहत आरोपी की दोषसिद्धि में दखल देने की कोई वजह नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार कर ली। कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले में दखल दिया, जिसमें आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 294 और धारा 506 के तहत दोषी ठहराया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों धाराओं में आरोपी की दोषसिद्धि और सजा रद्द कर दी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने धारदार हथियार से गंभीर चोट पहुंचाने के मामले में धारा 326 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा कि इस आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त मौखिक और मेडिकल सबूत मौजूद हैं, इसलिए इसमें दखल देने की जरूरत नहीं है।
सजा के मामले में भी कोर्ट ने आरोपी को आंशिक राहत दी। उसकी उम्र करीब 70 वर्ष, स्वास्थ्य और जमीन के विवाद की परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने जेल की सजा घटाकर कोर्ट उठने तक कर दी। साथ ही दो महीने के भीतर 50 हजार रुपये जुर्माना जमा कराने का निर्देश दिया।