जयपुर: आर्बिट्रेशन मामलों में अंतरिम आदेशों को चुनौती देने के अधिकार को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन एवं सुलह अधिनियम की धारा 36(3) के तहत कमर्शियल कोर्ट की ओर से पारित अंतरिम आदेश के खिलाफ सीधे अपील नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कानून किसी आदेश के खिलाफ अपील का अधिकार नहीं देता, तो केवल इस आधार पर अपील स्वीकार नहीं की जा सकती कि आदेश से किसी पक्ष को नुकसान हो रहा है। अपील का अधिकार केवल वही होगा, जिसकी अनुमति कानून स्पष्ट रूप से देता है।
इसी आधार पर डिवीजन बेंच ने राजस्थान स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड की अपील खारिज कर दी। कॉरपोरेशन ने कमर्शियल कोर्ट के उस अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें आर्बिट्रेशन अवार्ड पर रोक देने के लिए पूरी अवार्ड राशि जमा कराने की शर्त रखी गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस आदेश के खिलाफ धारा 37 के तहत अपील सुनवाई योग्य ही नहीं है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि आर्बिट्रेशन कानून में जिन आदेशों के खिलाफ अपील का अधिकार दिया गया है, अपील केवल उन्हीं मामलों में हो सकती है। कानून में जिस आदेश के लिए अपील का प्रावधान नहीं है, उसके खिलाफ हाईकोर्ट भी अपील नहीं सुन सकता।
हाईकोर्ट के इस फैसले से साफ हो गया है कि आर्बिट्रेशन मामलों में धारा 36(3) के तहत पारित अंतरिम आदेश के खिलाफ सीधे अपील नहीं की जा सकती। अगर किसी पक्ष को ऐसे आदेश पर आपत्ति है, तो उसे कानून में उपलब्ध दूसरे कानूनी उपाय अपनाने होंगे।
क्या है पूरा मामला?
मामला राजस्थान स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड और एक निजी कंपनी के बीच हुए आर्बिट्रेशन विवाद से जुड़ा है। आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल ने निजी कंपनी के पक्ष में अवार्ड पारित किया था।
इस अवार्ड को चुनौती देते हुए कॉरपोरेशन ने कमर्शियल कोर्ट में धारा 34 के तहत याचिका दायर की। साथ ही अवार्ड के अमल पर रोक लगाने की भी मांग की।
कमर्शियल कोर्ट ने 18 अप्रैल 2026 को अंतरिम आदेश पारित करते हुए कहा कि यदि कॉरपोरेशन अवार्ड पर रोक चाहता है, तो उसे पूरी अवार्ड राशि कोर्ट में जमा करनी होगी। इसी शर्त को चुनौती देते हुए कॉरपोरेशन ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।
कॉरपोरेशन ने क्या दलील दी?
कॉरपोरेशन की ओर से कहा गया कि कमर्शियल कोर्ट ने पूरी अवार्ड राशि जमा कराने की शर्त लगाकर गलत आदेश पारित किया है। इसलिए इस आदेश के खिलाफ कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 की धारा 13 के तहत अपील सुनवाई योग्य है।
कॉरपोरेशन का कहना था कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 13 के तहत अपील का अधिकार मिलता है। इसलिए धारा 36(3) के तहत पारित अंतरिम आदेश के खिलाफ भी हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है।
कॉरपोरेशन ने यह भी दलील दी कि अगर ऐसे आदेशों के खिलाफ अपील का अधिकार नहीं माना गया, तो प्रभावित पक्ष को अपनी बात रखने का प्रभावी मौका नहीं मिलेगा और उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कॉरपोरेशन की दलीलें स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एवं सुलह अधिनियम की धारा 37 में साफ बताया गया है कि किन आदेशों के खिलाफ अपील की जा सकती है। इसमें धारा 36(3) के तहत पारित अंतरिम आदेश शामिल नहीं हैं। इसलिए ऐसे आदेश के खिलाफ सीधे अपील नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने अपने फैसले के तीन प्रमुख आधार बताए–
- धारा 13(1ए): हाईकोर्ट ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 13(1ए) को उसके प्रावधान (प्रोवाइजो) से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। यह प्रावधान साफ करता है कि अपील केवल उन्हीं आदेशों के खिलाफ होगी, जिनका उल्लेख सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 43 या आर्बिट्रेशन एवं सुलह अधिनियम की धारा 37 में किया गया है।
- धारा 13(2): हाईकोर्ट ने कहा कि यह धारा अपील का नया या अतिरिक्त अधिकार नहीं देती, बल्कि अपील के अधिकार को सीमित करती है। इसलिए केवल धारा 13 का हवाला देकर वहां अपील नहीं की जा सकती, जहां कानून में उसका प्रावधान ही नहीं है।
- धारा 37: हाईकोर्ट ने कहा कि अपील का अधिकार केवल कानून से मिलता है। आर्बिट्रेशन एवं सुलह अधिनियम अपने आप में एक संपूर्ण कानून है। इसलिए धारा 37 में जिन आदेशों के खिलाफ अपील का प्रावधान नहीं है, उनके लिए दूसरे कानून का सहारा लेकर अपील का अधिकार नहीं बनाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का लिया सहारा
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कांडला एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम ओसीआई कॉरपोरेशन फैसले का भी हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि आर्बिट्रेशन कानून में जिन आदेशों के खिलाफ अपील का प्रावधान है, अपील केवल उन्हीं मामलों में की जा सकती है। यदि किसी आदेश के खिलाफ आर्बिट्रेशन कानून में अपील का प्रावधान नहीं है, तो केवल कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट का सहारा लेकर अपील का नया अधिकार नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर धारा 36(3) के तहत पारित हर अंतरिम आदेश के खिलाफ अपील की अनुमति दे दी जाए, तो आर्बिट्रेशन मामलों का जल्दी निपटारा करने का उद्देश्य प्रभावित होगा।
इससे मुकदमेबाजी बढ़ेगी और आर्बिट्रेशन अवार्ड को लागू करने में भी अनावश्यक देरी होगी।
कोर्ट ने दूसरा रास्ता भी बताया
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 36(3) के आदेश के खिलाफ सीधे अपील का प्रावधान नहीं होने का मतलब यह नहीं है कि प्रभावित पक्ष के पास कोई कानूनी रास्ता नहीं बचता।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी पक्ष को ऐसे अंतरिम आदेश पर आपत्ति है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का रुख कर सकता है।
इसके अलावा, धारा 34 की याचिका पर अंतिम फैसला आने के बाद उस आदेश के खिलाफ दायर अपील में भी अंतरिम आदेश को चुनौती दी जा सकती है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून ने ऐसे मामलों में दूसरे कानूनी उपाय जरूर दिए हैं, लेकिन धारा 36(3) के अंतरिम आदेश के खिलाफ अलग से सीधे अपील करने का अधिकार नहीं दिया है।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान स्टेट वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड की अपील खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एवं सुलह अधिनियम की धारा 37 में धारा 36(3) के तहत पारित अंतरिम आदेश के खिलाफ अपील का प्रावधान नहीं है। इसलिए इस अपील पर सुनवाई नहीं की जा सकती।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने कमर्शियल कोर्ट की ओर से पूरी अवार्ड राशि जमा कराने की शर्त सही है या गलत, इस पर कोई राय नहीं दी है।
अपील केवल इस आधार पर खारिज की गई है कि वह कानून के तहत सुनवाई योग्य नहीं थी। अगर कॉरपोरेशन के पास कानून के तहत कोई दूसरा उपाय उपलब्ध है, तो वह उसका सहारा ले सकता है।