जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में आपराधिक मामलों की जांच में हो रही देरी पर गंभीर चिंता जताई है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब एक ही पुलिस अधिकारी को अपराध की जांच और कानून-व्यवस्था, दोनों की जिम्मेदारी दी जाती है, तो कई मामलों की जांच समय पर पूरी नहीं हो पाती।
इसी को देखते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच शाखा और कानून-व्यवस्था संभालने वाली शाखा को अलग करने की दिशा में चल रही प्रक्रिया की प्रगति रिपोर्ट मांगी है।
हाईकोर्ट ने वित्त विभाग से भी पूछा है कि इस व्यवस्था के लिए प्रस्तावित नए पदों के सृजन पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से इस दिशा में उठाए गए शुरुआती कदमों की सराहना भी की। साथ ही कहा कि निष्पक्ष और तेज जांच के लिए अलग जांच शाखा का प्रभावी ढंग से काम करना जरूरी है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने वित्त विभाग के प्रधान सचिव को मामले में पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त 2026 को होगी।
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जांच में देरी पर कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि कई मामलों में एक ही पुलिस अधिकारी को अपराध की जांच और अपने इलाके की कानून-व्यवस्था, दोनों की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। इसकी वजह से कई मामलों की जांच समय पर पूरी नहीं हो पाती।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर जांच और कानून-व्यवस्था के लिए अलग-अलग शाखाएं होंगी, तो जांच अधिकारी पूरा समय केवल जांच पर दे सकेंगे। इससे मामलों की जांच तेज होगी और उसकी गुणवत्ता भी बेहतर होगी।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि भारत के विधि आयोग ने अपनी 154वीं रिपोर्ट में ऐसी ही व्यवस्था की सिफारिश की थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि दोनों जिम्मेदारियां अलग होने से जांच में तेजी आएगी, विशेषज्ञता बढ़ेगी और आम लोगों का पुलिस पर भरोसा भी मजबूत होगा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के ‘प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ’ मामले का भी जिक्र किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस फैसले में केंद्र और राज्य सरकारों को पुलिस सुधार लागू करने और जांच व्यवस्था को मजबूत बनाने के निर्देश दिए गए थे।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया था कि जब तक नया पुलिस कानून नहीं बनता, तब तक उसके जारी दिशा-निर्देश लागू रहेंगे।
इन्हीं दिशा-निर्देशों के तहत राज्यों को जांच और कानून-व्यवस्था के लिए अलग व्यवस्था विकसित करने की दिशा में काम करना है।
मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की सराहना की। साथ ही कहा कि नई व्यवस्था को लागू करने के लिए जरूरी प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रिया समय पर पूरी होनी चाहिए।
इसी कारण हाईकोर्ट ने वित्त विभाग से अब तक हुई कार्रवाई की रिपोर्ट तलब की है।
मामला कैसे शुरू हुआ?
मौजूदा मामला राजस्थान हाईकोर्ट के ‘जितेंद्र मीणा बनाम राजस्थान सरकार’ मामले से जुड़ा है।
16 मार्च 2026 को दिए गए अपने आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार, गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय को पुलिस की जांच शाखा और कानून-व्यवस्था संभालने वाली शाखा को अलग करने की दिशा में नीति तैयार करने के निर्देश दिए थे।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि जब तक नया पुलिस कानून नहीं बनता, तब तक सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले में जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप व्यवस्था विकसित की जाए।
मौजूदा सुनवाई में हाईकोर्ट उन्हीं निर्देशों के पालन में अब तक हुई कार्रवाई की समीक्षा कर रहा है।
सरकार ने कोर्ट को क्या बताया?
सुनवाई के दौरान पुलिस मुख्यालय ने बताया कि हाईकोर्ट के पहले के आदेशों के पालन में इस विषय पर एक समिति गठित की गई थी।
समिति ने केरल, पंजाब, दिल्ली और बिहार की व्यवस्था का अध्ययन करने के बाद राजस्थान के लिए विस्तृत प्रस्ताव तैयार किया।
समिति की सिफारिशों के आधार पर गृह विभाग ने पुलिस व्यवस्था को तीन अलग-अलग शाखाओं में बांटने के प्रस्ताव पर सहमति दी है।
इस योजना को लागू करने के लिए पुलिस इंस्पेक्टर, उप निरीक्षक, सहायक उप निरीक्षक, हेड कांस्टेबल और कांस्टेबल समेत 828 नए पद बनाने होंगे।
पुलिस मुख्यालय ने यह भी बताया कि नए पदों के सृजन के लिए गृह विभाग ने प्रस्ताव वित्त विभाग को भेज दिया है। फिलहाल इस पर वित्त विभाग की मंजूरी मिलनी बाकी है।
इसी कारण हाईकोर्ट ने वित्त विभाग से अब तक हुई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।
पायलट प्रोजेक्ट के तहत 3 हिस्सों में बंटेगी पुलिस
हाईकोर्ट को बताया गया कि नई व्यवस्था को पहले चरण में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जाएगा। इसके लिए राज्य के 16 जिलों के 20 पुलिस थानों का चयन किया गया है।
इस योजना के तहत हर पुलिस थाने में तीन अलग-अलग यूनिट बनाई जाएंगी-
- कानून-व्यवस्था यूनिट
- जांच यूनिट
- प्रशासनिक यूनिट
इस व्यवस्था का मकसद जांच अधिकारियों को कानून-व्यवस्था की ड्यूटी से अलग करना है, ताकि वे केवल अपराधों की जांच पर पूरा ध्यान दे सकें।
वहीं कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक कामकाज के लिए अलग-अलग यूनिट जिम्मेदारी संभालेंगी।
फोरेंसिक लैब की कमी पर भी चिंता
हाईकोर्ट ने कहा कि अपराधों की जांच को प्रभावी बनाने के लिए केवल अलग जांच शाखा बनाना ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ आधुनिक फोरेंसिक लैब, वैज्ञानिक जांच सुविधाएं और प्रशिक्षित स्टाफ भी जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य में आधुनिक फोरेंसिक लैब और वैज्ञानिक जांच सुविधाओं की कमी है।
कई मामलों में जांच एजेंसियों को रिपोर्ट के लिए दूसरे राज्यों की प्रयोगशालाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे जांच पूरी होने में देरी होती है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बढ़ते अपराधों को देखते हुए जांच अधिकारियों की संख्या बढ़ाने, फोरेंसिक सुविधाओं को मजबूत करने और आधुनिक तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल करने की जरूरत है।
इससे मामलों की जांच समय पर पूरी करने में मदद मिलेगी।
वित्त विभाग से मांगी प्रगति रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से उठाए गए कदमों की सराहना करते हुए कहा कि पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग ने इस दिशा में सकारात्मक पहल की है। हालांकि, नई व्यवस्था लागू करने के लिए प्रस्तावित नए पदों पर वित्त विभाग की मंजूरी अभी मिलनी बाकी है।
इसी वजह से कोर्ट ने वित्त विभाग के प्रधान सचिव को मामले में पक्षकार बनाया है। साथ ही पूछा है कि पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग की ओर से भेजे गए प्रस्ताव पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है।
हाईकोर्ट ने वित्त विभाग को इस संबंध में विस्तृत प्रगति रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही राज्य के महाधिवक्ता से भी मामले में जरूरी सहयोग देने को कहा है।
मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त 2026 को होगी। उस दिन वित्त विभाग की ओर से पेश की जाने वाली प्रगति रिपोर्ट और अन्य पक्षों के जवाब पर हाईकोर्ट आगे विचार करेगा।
