नई दिल्ली: यौन उत्पीड़न के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे आसाराम को जहां एक तरफ राजस्थान हाईकोर्ट से 20 दिन की पहली पैरोल मिल गई है, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में मेडिकल बेल की उसकी मांग पर फैसला अभी बाकी है।
एम्स, जोधपुर की मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त के लिए तय की है।
आसाराम को एक दिन पहले ही राजस्थान हाईकोर्ट से 20 दिन की पहली पैरोल मिली है। लेकिन इससे उसकी कानूनी लड़ाई खत्म नहीं हुई है।
अब उसकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है, जहां मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत (मेडिकल बेल) की मांग पर अहम सुनवाई होगी।
सुप्रीम कोर्ट के सामने इस बार सवाल पैरोल का नहीं, बल्कि मेडिकल बेल का है। कोर्ट को यह तय करना है कि आसाराम की मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत देने लायक है या नहीं।
इसी उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने एम्स, जोधपुर के मेडिकल बोर्ड से उसकी स्वास्थ्य संबंधी रिपोर्ट मंगाई थी।
रिपोर्ट अब रिकॉर्ड पर आ चुकी है और इसी पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त को होगी।
जस्टिस एम.एम. सुन्दरेश और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने एम्स की मेडिकल रिपोर्ट पर दोनों पक्षों को सुना। लेकिन मेडिकल बेल पर कोई फैसला देने के बजाय कोर्ट ने विस्तृत सुनवाई के लिए मामले की अगली तारीख 6 अगस्त तय कर दी।
एम्स की रिपोर्ट में क्या सामने आया?
सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि एम्स, जोधपुर की मेडिकल रिपोर्ट मिल चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल आसाराम को अस्पताल में भर्ती रखने की जरूरत नहीं है।
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उसकी स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उसे लगातार चिकित्सकीय निगरानी और देखभाल की जरूरत रहेगी।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एम्स की मेडिकल रिपोर्ट में दो अलग-अलग बातें सामने आई हैं।
एक तरफ रिपोर्ट में आसाराम को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं बताई गई है, वहीं दूसरी ओर उसे चौबीसों घंटे डॉक्टरों की निगरानी की जरूरत भी बताई गई है।
इसी वजह से कोर्ट ने माना कि रिपोर्ट पर दोनों पक्षों की विस्तार से दलीलें सुनना जरूरी है और मामले की अगली तय कर दी।
रिपोर्ट पर दोनों पक्षों की अलग-अलग दलीलें
राजस्थान सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि एम्स की मेडिकल रिपोर्ट साफ तौर पर कहती है कि आसाराम को अस्पताल में भर्ती रखने की जरूरत नहीं है।
सरकार ने इसी आधार पर मेडिकल बेल की मांग का विरोध किया।
वहीं, आसाराम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने कहा कि रिपोर्ट की सिर्फ पहली लाइन पढ़कर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
उनका कहना था कि पूरी रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि आसाराम को चौबीसों घंटे मेडिकल देखभाल और निगरानी की जरूरत है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट के सभी पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई जरूरी है और इसके बाद ही मेडिकल बेल की मांग पर फैसला लिया जाएगा।
इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बेल पर तत्काल कोई फैसला नहीं दिया और मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त के लिए तय कर दी।
पहले एम्स से रिपोर्ट क्यों मांगी गई थी?
इससे पहले हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मेडिकल बेल जैसे मामले में केवल दावों के आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता।
इसके बाद कोर्ट ने एम्स, जोधपुर के निदेशक को विशेषज्ञ डॉक्टरों का मेडिकल बोर्ड गठित कर आसाराम की स्वास्थ्य स्थिति की विस्तृत जांच कराने का निर्देश दिया था।
आसाराम ने अपनी याचिका में दावा किया है कि वह गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है और हाल ही में उसे आंतरिक रक्तस्राव (इंटरनल ब्लीडिंग) की समस्या हुई थी, जिसके बाद इलाज के लिए एम्स में भर्ती कराया गया।
इससे पहले हुई सुनवाई में राजस्थान सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मेडिकल बेल का विरोध किया था।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कुछ समय पहले स्वास्थ्य आधार पर राहत मिलने के बाद आसाराम काशी विश्वनाथ और अयोध्या जैसे धार्मिक स्थलों की यात्रा करता दिखाई दिया था।
ऐसे में केवल मेडिकल दावों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती और उसकी स्वास्थ्य स्थिति का स्वतंत्र मेडिकल परीक्षण जरूरी है।
पैरोल मिली, फिर मेडिकल बेल की जरूरत क्यों?
राजस्थान हाईकोर्ट ने आसाराम को 20 दिन की पहली पैरोल दी है।
यह राहत राजस्थान के जेल नियमों के तहत मिली है और इसका आधार उसकी जेल में बिताई गई अवधि, पहले अंतरिम जमानत के दौरान उसका आचरण और पैरोल समिति की ओर से जताई गई आशंकाओं का ठोस आधार न होना रहा।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट में चल रहा मामला पूरी तरह अलग है। यहां आसाराम ने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हवाला देते हुए मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत मांगी है।
यानी दोनों मामलों का कानूनी आधार अलग-अलग है। एक मामला पैरोल का है, जबकि दूसरा मेडिकल बेल का।
अगर सुप्रीम कोर्ट मेडिकल बेल पर कोई राहत देता है, तो वह अपने आदेश में उसकी अवधि, शर्तें और अन्य नियम तय करेगा।
यह राहत राजस्थान हाईकोर्ट से मिली पैरोल से अलग कानूनी आधार पर होगी। इसलिए पैरोल मिलने के बावजूद मेडिकल बेल की याचिका पर सुनवाई जारी है।
इसी वजह से हाईकोर्ट से पैरोल मिलने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में मेडिकल बेल की सुनवाई जारी है।
मेडिकल बेल और पैरोल में क्या अंतर है?
इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पैरोल और मेडिकल बेल में क्या अंतर होता है।
- पैरोल जेल-नियमों के तहत दी जाने वाली अस्थायी राहत है। इसमें कैदी को तय अवधि के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति मिलती है और अवधि पूरी होने के बाद उसे वापस जेल लौटना होता है। यह राहत आमतौर पर जेल में बिताए गए समय, आचरण और संबंधित नियमों के आधार पर दी जाती है।
- मेडिकल बेल– कोर्ट की ओर से स्वास्थ्य कारणों के आधार पर दी जाने वाली अंतरिम राहत होती है। इसमें कोर्ट मेडिकल रिपोर्ट, बीमारी की गंभीरता और इलाज की जरूरत को देखते हुए फैसला करता है। इसकी अवधि पहले से तय नहीं होती और यह पूरी तरह कोर्ट के आदेश पर निर्भर करती है।
यही कारण है कि आसाराम को हाईकोर्ट से पैरोल मिलने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में मेडिकल बेल की सुनवाई अलग से चल रही है।
6 अगस्त को ‘सुप्रीम’ सुनवाई
अब सुप्रीम कोर्ट 6 अगस्त को एम्स, जोधपुर की मेडिकल रिपोर्ट, राजस्थान सरकार की दलीलों और आसाराम के पक्ष की आपत्तियों पर विस्तार से सुनवाई करेगा।
इसके बाद कोर्ट यह तय करेगा कि क्या मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत देने के लिए पर्याप्त है या नहीं।