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जेल सुधार की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: जेलों की निगरानी के लिए बने ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 5 मांगी रिपोर्ट

Supreme Court Orders States to Constitute Board of Visitors for Every District Jail

नई दिल्ली: देश की जेलों में पारदर्शिता बढ़ाने और कैदियों के साथ होने वाले भेदभाव पर प्रभावी निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि हर जिले की जेल के लिए ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ (BoVs) का गठन किया जाए।

इस बोर्ड की अध्यक्षता संबंधित जिले के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश करेंगे, ताकि जेलों का नियमित और स्वतंत्र निरीक्षण हो सके।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मॉडल प्रिजन मैनुअल में यह व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन अब तक किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने जिला स्तर पर ऐसे बोर्ड का गठन नहीं किया है।

सुप्री कोर्ट ने सभी सरकारों को 5 सप्ताह के अंदर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश देते हुए कहा कि जेलों की निगरानी की यह व्यवस्था जल्द लागू की जानी चाहिए।

यह आदेश जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जेलों में जाति, लिंग, दिव्यांगता और अन्य आधारों पर भेदभाव से जुड़े स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई के दौरान दिया।

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किस मामले में आया आदेश?

यह आदेश उस स्वत: संज्ञान मामले में आया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट देशभर की जेलों में जाति, लिंग, दिव्यांगता और अन्य आधारों पर होने वाले भेदभाव से जुड़े अपने पहले के फैसले के पालन की निगरानी कर रहा है।

इस मामले में कोर्ट पहले भी जेल रिकॉर्ड से जाति का कॉलम हटाने, भेदभाव खत्म करने और जेल सुधार से जुड़े कई निर्देश दे चुका है।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि जेल सुधार केवल नए नियम बनाने से नहीं होगा, बल्कि उनकी स्वतंत्र निगरानी भी जरूरी है।

इसी सोच के तहत सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को हर जिले में ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ गठित करने का निर्देश दिया है।

अब सभी सरकारों को 3 सितंबर 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, जबकि मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होगी।

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सुप्रीम कोर्ट क्यों हुआ सख्त?

यह मामला पहले आए ऐतिहासिक सुकन्या शांथा फैसले के बाद शुरू हुआ था, जिसमें जेल सुधारों को लेकर कई अहम दिशानिर्देश दिए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर को अमीकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त किया है, जो इन निर्देशों के अनुपालन की निगरानी कर रहे हैं।

सुनवाई के दौरान कोर्ट के एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने एक स्टेटस रिपोर्ट पेश की।

इसमें बताया गया कि मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 के तहत हर जिला और उप-जेल में ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ का गठन किया जाना चाहिए।

यह जेलों की बाहरी और स्वतंत्र निगरानी का सबसे महत्वपूर्ण तंत्र माना गया है। इसके बावजूद अब तक किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने जिला स्तर पर ऐसे बोर्ड का गठन नहीं किया है।

रिपोर्ट में कहा गया कि यदि ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ सक्रिय होंगे, तो वे जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के साथ मिलकर नियमित रूप से जेलों का निरीक्षण कर सकेंगे।

इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि जेलों के अंदर कहीं जाति आधारित भेदभाव या किसी अन्य तरह का भेदभाव तो नहीं हो रहा है।

स्टेटस रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अब तक कई महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध नहीं कराई हैं।

इनमें जेल रिकॉर्ड और फॉर्म से जाति का कॉलम हटाने की स्थिति, सफाई कार्य की व्यवस्था, नए जेल कानूनों और नियमों में किए जा रहे बदलाव तथा ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ के गठन से जुड़ी जानकारी शामिल है।

निगरानी तंत्र क्यों है जरूरी?

बोर्ड ऑफ विजिटर्स का उद्देश्य जेलों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। यह बोर्ड बाहरी निरीक्षण करता है, कैदियों की शिकायतों को सुनता है और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली की समीक्षा करता है।

इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि-

  • कैदियों के साथ किसी प्रकार का भेदभाव न हो।
  • जेलों में मानवाधिकारों का उल्लंघन न हो।
  • स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुरक्षा मानकों का पालन हो।
  • सुधार कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बिना ऐसे स्वतंत्र निगरानी तंत्र के जेल सुधार संभव नहीं है।

क्या होगा ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ का काम?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर जिले में गठित होने वाला ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ जेलों की बाहरी निगरानी करेगा।

इसकी अध्यक्षता संबंधित जिले के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट के पहले दिए गए आदेश के मुताबिक, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ संयुक्त रूप से समय-समय पर जेलों का निरीक्षण करेंगे।

उनका मकसद यह पता लगाना होगा कि जेलों के भीतर जाति आधारित भेदभाव या किसी अन्य प्रकार का भेदभाव तो नहीं हो रहा है।

निरीक्षण के बाद संयुक्त रिपोर्ट पहले राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को भेजी जाएगी।

वहां से सभी जिलों की रिपोर्ट तैयार कर राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण को भेजी जाएगी, जो सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी रिपोर्ट पेश करेगा।

कुछ राज्यों ने शुरू की पहल, बाकी पीछे

अमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने कोर्ट को बताया कि असम, मध्य प्रदेश, मेघालय और चंडीगढ़ जैसे कुछ राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने जेलों में जाति डेटा संग्रह की एक प्रक्रिया विकसित की है।

उन्होंने सुझाव दिया कि अन्य राज्य भी इसी मॉडल को अपनाएं।

हालांकि, बोर्ड ऑफ विजिटर्स के गठन के मामले में कोई भी राज्य आगे नहीं आया है, जिसे कोर्ट ने गंभीर चिंता का विषय माना।

राज्यों को दिए ये निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे हर जिले में जल्द से जल्द ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ का गठन करें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बोर्ड की अध्यक्षता संबंधित जिले के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश करेंगे, ताकि जेलों की स्वतंत्र और नियमित निगरानी सुनिश्चित हो सके।

सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से भी कहा कि वे सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों की जानकारी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक जल्द पहुंचाना सुनिश्चित करें।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जेल कानूनों, नियमों और मैनुअल में जिन प्रावधानों में संशोधन प्रस्तावित हैं या किए गए हैं, उनकी मौजूदा स्थिति की रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।

साथ ही केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लंबित जानकारियां जल्द जुटाए।

इन जानकारियों में जेल रिकॉर्ड और फॉर्म से जाति का कॉलम हटाने, नए जेल कानूनों और नियमों में संशोधन, सफाई व्यवस्था तथा ‘बोर्ड ऑफ विजिटर्स’ के गठन की स्थिति शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश यह रिपोर्ट 3 सितंबर 2026 तक दाखिल करें।

मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होगी।

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